Anil Agarwal First Office: वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल आज देश के जाने-माने उद्योगपतियों में शामिल हैं। माइनिंग और मेटल सेक्टर में कारोबार करने वाले वेदांता ग्रुप का बिजनेस कई देशों तक फैला हुआ है। हालांकि, यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा। बिहार से मुंबई पहुंचे अनिल अग्रवाल ने बेहद छोटे स्तर से अपना कारोबार शुरू किया था।
अग्रवाल ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पहले ऑफिस की तस्वीर साझा की और अपने संघर्ष के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि मुंबई के कालबादेवी इलाके में महज 8 फीट x 9 फीट के कमरे से उनके कारोबारी सफर की शुरुआत हुई थी। इसी छोटे से ऑफिस में उन्होंने बिजनेस की कई ऐसी बातें सीखीं, जो शायद किसी मैनेजमेंट की किताब में नहीं मिल सकती थीं।
19 साल की उम्र में बिहार से पहुंचे मुंबई
आज Vedanta Group के कई बड़े offices दुनिया के कई देशों में हैं।
मगर सच कहूँ, आज भी अगर आँखें बंद करूँ, तो Mumbai के Kalbadevi वाले मेरे पहले office की तस्वीर साफ़-साफ़ नज़र आती है।
19 साल की उम्र में जब Bihar से Mumbai आया, जेब में पैसे कम थे, मगर मन में एक ज़िद थी कि कुछ बड़ा… pic.twitter.com/D3cRpxD3aC
— Anil Agarwal (@AnilAgarwal_Ved) August 19, 2026 अनिल अग्रवाल ने अपने पोस्ट में बताया कि जब वह 19 साल की उम्र में बिहार से मुंबई पहुंचे थे, तब जेब में ज्यादा पैसे नहीं थे। हालांकि, उनके मन में कुछ बड़ा करने की इच्छा थी। इसी जुनून ने उन्हें मुंबई के कालबादेवी इलाके तक पहुंचाया।
उन्होंने बताया कि उस समय वह कई दिनों तक अपने लिए एक छोटे ऑफिस की तलाश करते रहे। इसी दौरान उनकी मुलाकात रसिकभाई नाम के एक व्यक्ति से हुई, जिन्होंने उनकी मेहनत और कुछ बड़ा करने की जिद को पहचाना।
रसिकभाई ने उन्हें एक पुरानी इमारत की चौथी मंजिल पर छोटा-सा कमरा दिखाया। यह कमरा सिर्फ 8 फीट x 9 फीट का था। यही जगह आगे चलकर उनके शुरुआती कारोबारी सफर की अहम याद बन गई।
एक फोन और तीन लोगों से शुरू हुआ सफर
अग्रवाल के मुताबिक, उस छोटे से ऑफिस में सिर्फ तीन लोग काम करते थे और एक साझा टेलीफोन था। यह करीब 1975-76 का दौर था, जब हर कारोबारी के लिए अपना टेलीफोन कनेक्शन होना आसान नहीं था।
उन्होंने बताया कि उनके फोन अक्सर पास में रहने वाले राजकुमार जी के फोन पर आते थे। फोन की दो घंटियां बजतीं और फिर कॉल कट जाती। इसके बाद वह तुरंत सीढ़ियां उतरकर फोन उठाने के लिए दौड़ पड़ते थे।
अनिल अग्रवाल ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि आज पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि वे दो घंटियां सिर्फ फोन की घंटियां नहीं थीं, बल्कि उनके सपनों की दस्तक थीं।
छोटे ऑफिस में सीखे कारोबार के बड़े सबक
अनिल अग्रवाल ने बताया कि इसी छोटे से ऑफिस में बैठकर वह केबल कंपनियों के साथ डील करते, कारोबारियों और ट्रेडर्स से मुलाकात करते और रोजाना बिजनेस की नई बारीकियां सीखते थे।
उनके लिए यह ऑफिस सिर्फ काम करने की जगह नहीं था। यहीं उन्होंने बातचीत, सौदेबाजी, बाजार को समझने और मुश्किल परिस्थितियों में आगे बढ़ने जैसे कई जरूरी सबक सीखे।
उन्होंने बताया कि ऑफिस छोटा था और रहने की जगह उससे भी छोटी। कालबादेवी के कॉटन एक्सचेंज के पास वह ₹21 महीने के किराए वाले साझा कमरे में सात लोगों के साथ रहते थे।
हर दिन नई चुनौती, लेकिन हौसला कायम रहा
अनिल अग्रवाल ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उस सफर में कुछ दिन कामयाबी लेकर आए तो कुछ शामें नाकामी से भरी रहीं। उन्होंने शुरुआत में अलग-अलग कारोबार में हाथ भी आजमाया।
हालांकि, मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि उन्होंने हर सुबह उसी उत्साह और गर्व के साथ अपने पहले ऑफिस का ताला खोला।
आज जब उनका कारोबार बड़े ऑफिस और कई देशों तक पहुंच चुका है, तब भी वह 8 x 9 फीट का छोटा-सा कमरा उनके लिए खास मायने रखता है।
‘सोच बड़ी, मेहनत कड़ी’ का दिया संदेश
अनिल अग्रवाल की इस कहानी में सबसे बड़ा संदेश यही है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन लक्ष्य छोटा होना जरूरी नहीं है। सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार मेहनत और बड़ा सोचने की क्षमता किसी भी इंसान को आगे बढ़ने की ताकत दे सकती है।
उन्होंने अपनी पोस्ट के अंत में लिखा कि उस 8 फीट x 9 फीट के कमरे ने उन्हें सिखाया—’सोच बड़ी। मेहनत कड़ी।’
अनिल अग्रवाल का यह किस्सा बताता है कि आज की बड़ी सफलता के पीछे अक्सर ऐसे दौर छिपे होते हैं, जब संसाधन बहुत कम होते हैं लेकिन सपने बहुत बड़े होते हैं। उनके लिए वह छोटा-सा ऑफिस भले ही आकार में बेहद छोटा था, लेकिन वहीं से एक बड़े कारोबारी साम्राज्य की नींव मजबूत हुई।


