Northern Sea Route: भारत और रूस समुद्री कारोबार को नई दिशा देने की तैयारी में हैं। भारत उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route-NSR) के जरिए यूरोप तक अपना पहला कार्गो भेजने की तैयारी कर रहा है। इस नए आर्कटिक रूट के जरिए भारत और यूरोप के बीच माल ढुलाई में लगने वाला समय पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में करीब 40 फीसदी तक कम हो सकता है।
Highlights
- भारत 2027 में उत्तरी समुद्री मार्ग से पहला कार्गो भेजने की तैयारी कर रहा है।
- मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग तक यात्रा का समय करीब 35-40 दिन से घटकर लगभग 24 दिन हो सकता है।
- भारत-रूस सहयोग से लॉजिस्टिक्स, पोर्ट और शिपबिल्डिंग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
- आर्कटिक क्षेत्र के LNG, निकल, तांबा और रेयर अर्थ मटेरियल पर भी भारत की नजर है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच रिश्तों में अब समुद्री सहयोग का एक नया अध्याय जुड़ सकता है। भारत यूरोप तक अपने कंटेनर पहुंचाने के लिए रूस के आर्कटिक क्षेत्र से गुजरने वाले नॉर्दर्न सी रूट (NSR) का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। इस रास्ते से भारत को यूरोप के साथ व्यापार के लिए एक वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर मिल सकता है।
भारत के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक समुद्री मार्ग में भारतीय बंदरगाहों से यूरोप तक माल पहुंचने में काफी समय लगता है। वहीं, आर्कटिक रूट छोटा होने के कारण यात्रा की दूरी और समय दोनों में कमी आने की संभावना है।
40 नहीं, करीब 24 दिन में पहुंच सकता है माल
नॉर्दर्न सी रूट रूस के आर्कटिक तट के साथ गुजरने वाला समुद्री मार्ग है। इसकी लंबाई करीब 5,600 किलोमीटर बताई जाती है। यह मार्ग एशिया और यूरोप के बीच एक वैकल्पिक समुद्री संपर्क उपलब्ध कराता है।
भारत के पश्चिमी तट से रूस के सेंट पीटर्सबर्ग तक पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग से माल पहुंचाने में करीब 35 से 40 दिन लग सकते हैं। मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग की समुद्री दूरी करीब 8,675 नॉटिकल मील बताई जाती है।
इसके मुकाबले नॉर्दर्न सी रूट से दूरी कम होने के कारण यात्रा समय में करीब 40 फीसदी तक की बचत संभव है। इसी आधार पर कुछ परिस्थितियों में यह सफर लगभग 24 दिन में पूरा हो सकता है। हालांकि, आर्कटिक क्षेत्र में मौसम, बर्फ की स्थिति और जहाज की क्षमता जैसे कारकों के कारण वास्तविक समय अलग हो सकता है।
2027 में पहला भारतीय कार्गो भेजने की तैयारी
भारत नॉर्दर्न सी रूट को सिर्फ एक वैकल्पिक रास्ते के तौर पर नहीं देख रहा, बल्कि इसे भविष्य के व्यापारिक और रणनीतिक समुद्री कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की संभावनाएं तलाश रहा है।
भारत सरकार के पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के स्तर पर इस मार्ग को लेकर रूस के साथ बातचीत और सहयोग आगे बढ़ा है। दोनों देशों के बीच नॉर्दर्न सी रूट से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त कार्य समूह की बैठक भी हो चुकी है।
भारत 2027 में पहली बार इस रूट के जरिए अपना कार्गो जहाज भेजने की तैयारी कर रहा है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में इस मार्ग पर नियमित माल ढुलाई की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
रूस के आर्कटिक बंदरगाह बन सकते हैं लॉजिस्टिक्स हब
नॉर्दर्न सी रूट का महत्व केवल समुद्री दूरी कम करने तक सीमित नहीं है। रूस का आर्खांगेल्स्क क्षेत्र भारत के लिए भविष्य में एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स और ट्रांसशिपमेंट हब बन सकता है।
यहां के बंदरगाहों और परिवहन ढांचे का इस्तेमाल रूस तथा यूरोप के दूसरे हिस्सों तक माल पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, पोर्ट सर्विसेज और समुद्री परिवहन के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा भारत की शिपबिल्डिंग और जहाज मरम्मत कंपनियों के लिए भी रूस के साथ सहयोग का रास्ता खुल सकता है।
भारत-रूस समुद्री कारोबार को मिलेगा नया रास्ता
भारत और रूस के बीच पहले से ही ऊर्जा, रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं। नॉर्दर्न सी रूट इन संबंधों को समुद्री और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में भी नई मजबूती दे सकता है।
इस रूट के जरिए भारत को यूरोपीय बाजारों तक पहुंच के लिए एक अतिरिक्त विकल्प मिलेगा। खासतौर पर अगर स्वेज नहर या अन्य पारंपरिक समुद्री मार्गों पर किसी कारण से लागत, दूरी या जोखिम बढ़ता है, तो वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर भारत के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी साबित हो सकता है।
रेयर अर्थ और खनिजों पर भी भारत की नजर
आर्कटिक क्षेत्र सिर्फ समुद्री रास्ते के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। यहां प्राकृतिक संसाधनों की भी बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
रूस के आर्कटिक क्षेत्र में LNG, निकल, तांबा, प्लैटिनम, पैलेडियम और रेयर अर्थ मटेरियल जैसे संसाधनों से जुड़ी गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। भारत अपनी बढ़ती औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के नए स्रोत तलाश रहा है।
ऐसे में नॉर्दर्न सी रूट भविष्य में केवल कंटेनर और सामान्य माल ढुलाई का रास्ता नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा, खनिज और औद्योगिक कच्चे माल के कारोबार के लिए भी अहम बन सकता है।
भारत के लिए क्यों खास है NSR?
भारत के लिए नॉर्दर्न सी रूट के कई रणनीतिक फायदे हो सकते हैं:
- यूरोप तक माल पहुंचाने में समय की बचत
- पारंपरिक समुद्री मार्गों का वैकल्पिक विकल्प
- भारत-रूस लॉजिस्टिक्स सहयोग को बढ़ावा
- आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय कारोबारी मौजूदगी मजबूत होना
- शिपबिल्डिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में नए अवसर
- महत्वपूर्ण खनिज और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच की संभावनाएं
हालांकि, आर्कटिक समुद्री मार्ग में बर्फ, मौसम, नेविगेशन, इंश्योरेंस और विशेष जहाजों की जरूरत जैसी चुनौतियां भी हैं। इसलिए इस रूट का व्यावसायिक इस्तेमाल बढ़ाने के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और नियमित समुद्री संचालन जरूरी होगा।
निष्कर्ष
नॉर्दर्न सी रूट भारत के यूरोप के साथ व्यापार के लिए आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। अगर भारत का पहला कार्गो मिशन सफल रहता है और नियमित शिपिंग शुरू होती है, तो 35-40 दिन लगने वाली समुद्री यात्रा को करीब 24 दिन तक लाने की संभावना व्यापार की लागत और सप्लाई चेन दोनों के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।
भारत-रूस की यह समुद्री साझेदारी सिर्फ दोनों देशों के व्यापार को नहीं, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में भारत की आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत कर सकती है।


