Safeguard Tariff: अमेरिका ने भारतीय निर्यातकों को एक और झटका दिया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स पर 15 अगस्त 2026 से 25% से 55% तक का नया सेफगार्ड टैरिफ लागू किया है। भारत ने इस फैसले के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) का रुख किया है। भारत का कहना है कि इस मामले में उसके व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं और वह अमेरिकी फैसले पर बातचीत करना चाहता है।
भारत ने WTO में मांगा परामर्श
भारत ने 14 अगस्त को WTO के सेफगार्ड्स समझौते के तहत अमेरिका के साथ परामर्श की मांग की। भारत ने कहा है कि क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स पर लगाए गए नए व्यापारिक उपाय में उसका पर्याप्त हित है।
भारत ने अमेरिका की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी तक पहुंच, सेफगार्ड कार्रवाई पर चर्चा का अवसर और WTO नियमों के तहत अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग की है। दोनों देशों के बीच बातचीत वर्चुअल माध्यम से आयोजित किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि अभी इसकी तारीख तय नहीं हुई है।
यह कदम फिलहाल औपचारिक WTO विवाद की शुरुआत नहीं माना जा रहा है। बातचीत के दौरान भारत अमेरिकी जांच में आयात बढ़ने, घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान और दोनों के बीच कारण-प्रभाव संबंध से जुड़े निष्कर्षों पर सवाल उठा सकता है।
अमेरिका भारतीय क्वार्ट्ज के लिए कितना बड़ा बाजार?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 72.5% थी।
इस अवधि में भारत ने अमेरिका को लगभग 23.33 करोड़ डॉलर के एग्लोमरेटेड क्वार्ट्ज स्लैब और कुछ क्वार्ट्ज एवं ग्लास सरफेस प्रोडक्ट्स का निर्यात किया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय क्वार्ट्ज इंडस्ट्री अमेरिकी बाजार पर कितनी निर्भर है।
नए टैरिफ के कारण इस सेक्टर की भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पादों को प्रतिस्पर्धी कीमत पर बेच पाना मुश्किल हो सकता है।
क्या होते हैं Quartz Surface Products?
क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स इंजीनियर्ड स्टोन से बने उत्पाद होते हैं। इन्हें आमतौर पर कुचले हुए क्वार्ट्ज या सिलिका को रेजिन, पिगमेंट और दूसरी सामग्रियों के साथ मिलाकर तैयार किया जाता है।
इस मिश्रण को दबाकर और पॉलिश करके मजबूत एवं नॉन-पोरस स्लैब बनाया जाता है। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से:
- किचन काउंटरटॉप
- बाथरूम वैनिटी
- फर्श
- दीवारों की क्लैडिंग
- होम रेनोवेशन प्रोजेक्ट्स
में किया जाता है।
भारत में इनका उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और तेलंगाना में होता है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी इस क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मौजूद है।
कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां करती हैं एक्सपोर्ट?
GTRI के अनुसार, भारत से क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स का निर्यात करने वाली प्रमुख कंपनियों में पोकरना इंजीनियर्ड स्टोन, मारुधर क्वार्ट्ज सरफेसेस, कलिंगास्टोन से जुड़ी कंपनियां, ARO ग्रेनाइट इंडस्ट्रीज, पैसिफिक क्वार्ट्ज सरफेसेस, कैमरोला क्वार्ट्ज, एस्प्रिट स्टोन्स, माही ग्रेनाइट्स, केरोस स्टोन और क्वार्ट्जक्राफ्ट शामिल हैं।
GTRI के मुताबिक, भारतीय निर्माताओं ने अमेरिकी बाजार की जरूरतों के अनुसार अपने स्लैब के आकार, डिजाइन, पैटर्न, सर्टिफिकेशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को विकसित किया है। ऐसे में अचानक दूसरे देशों के बाजारों में शिफ्ट करना कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा।
चार साल तक लागू रहेगा नया सेफगार्ड टैरिफ
अमेरिका का यह सेफगार्ड उपाय 15 अगस्त 2026 से 14 अगस्त 2030 तक लागू रहेगा। यानी इसकी अवधि चार साल होगी।
पहले साल में कुल 13.006 मिलियन वर्ग मीटर का ग्लोबल कोटा निर्धारित किया गया है। इस मात्रा को चार तिमाही हिस्सों में बांटा जाएगा। भारत के लिए अलग से कोई विशेष कोटा तय नहीं किया गया है।
कोटे के भीतर आने वाले आयात पर अतिरिक्त 25% ड्यूटी लगेगी, जबकि कोटे से अधिक आयात पर 50% टैरिफ लागू होगा।
इसका मतलब है कि जिन क्वार्ट्ज काउंटरटॉप स्लैब पर पहले अमेरिका में अतिरिक्त सेफगार्ड ड्यूटी नहीं थी, उन पर अब 25% से 50% तक अतिरिक्त शुल्क का असर पड़ सकता है।
वहीं, जिन ग्लास प्रोडक्ट्स पर पहले से करीब 5% टैरिफ लगता था, उन पर कुल ड्यूटी का बोझ 30% से 55% तक पहुंच सकता है। इसके अलावा कुछ मामलों में एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी भी लागू हो सकती हैं।
भारत और चीन पर लागू, कई देशों को छूट
अमेरिका ने कुछ देशों और अपने कई फ्री-ट्रेड पार्टनर्स को इस सेफगार्ड उपाय से बाहर रखा है। इनमें कनाडा, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश शामिल हैं।
इसके विपरीत भारत और चीन इस उपाय के दायरे में बने हुए हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में उन देशों के सप्लायर्स से भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी जिन्हें सेफगार्ड से छूट मिली है।
पहले से लगी ड्यूटी के ऊपर नया बोझ
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका में भारतीय क्वार्ट्ज उत्पादों के एक बड़े हिस्से पर पहले से ही एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लागू है।
GTRI के मुताबिक, पोकरना, मरुधर और समीक्षा के दायरे में आई 44 अन्य भारतीय कंपनियों पर मौजूदा एंटी-डंपिंग रेट शून्य है। वहीं जिन सप्लायर्स की समीक्षा नहीं हुई है, उनके लिए सामान्य दर करीब 1.02% बताई गई है। काउंटरवेलिंग ड्यूटी अलग-अलग मामलों में 1.57% से 2.34% के बीच है, जबकि अन्य कंपनियों के लिए यह करीब 2.17% हो सकती है।
ऐसे में नया सेफगार्ड टैरिफ भारतीय कंपनियों पर पहले से मौजूद व्यापारिक शुल्कों के अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
भारत के सामने क्या विकल्प हैं?
भारत WTO में होने वाली बातचीत के दौरान अमेरिका से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांग सकता है। इनमें यह सवाल प्रमुख होगा कि क्या अमेरिका ने आयात में बढ़ोतरी, घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान और दोनों के बीच स्पष्ट कारण-प्रभाव संबंध को WTO नियमों के मुताबिक साबित किया है।
इसके अलावा भारत:
- सेफगार्ड उपाय की अवधि की समीक्षा की मांग कर सकता है।
- ग्लोबल कोटा के आकार पर सवाल उठा सकता है।
- भारत के लिए अलग या देश-विशिष्ट कोटा की मांग कर सकता है।
- कोटा के प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग कर सकता है।
- कुछ उत्पादों या कंपनियों के लिए छूट की मांग कर सकता है।
- कुल टैरिफ बोझ कम करने के लिए बातचीत कर सकता है।
फिलहाल भारत का तत्काल लक्ष्य बातचीत के जरिए भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए राहत हासिल करना नजर आ रहा है। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकलता है, तो भारत WTO के तहत आगे उपलब्ध विकल्पों पर भी विचार कर सकता है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए क्यों अहम है यह मामला?
अमेरिका भारतीय क्वार्ट्ज सरफेस इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा बाजार है। इसलिए 25% से 55% तक के टैरिफ का असर केवल निर्यात की लागत तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कंपनियों की कीमत, मार्जिन और अमेरिकी ग्राहकों के साथ उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
भारतीय कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी कैसे बनाए रखें। वहीं भारत की WTO पहल से यह उम्मीद है कि बातचीत के जरिए टैरिफ, कोटा या देश-विशिष्ट व्यवस्था में कुछ राहत हासिल की जा सके।


