Dhirubhai Ambani and L&T Story: धीरूभाई अंबानी की कारोबारी कहानी सिर्फ रिलायंस को खड़ा करने की कहानी नहीं है। उनकी नजर देश की कई बड़ी कंपनियों पर रही, लेकिन लार्सन एंड टुब्रो यानी L&T के साथ उनका रिश्ता सबसे ज्यादा दिलचस्प और विवादित रहा। एक समय ऐसा आया जब अंबानी परिवार L&T के बोर्ड में प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गया और खुद धीरूभाई अंबानी कंपनी के चेयरमैन बन गए।
लेकिन कुछ ही समय बाद शेयरहोल्डिंग, बोर्डरूम की राजनीति, सरकारी दखल और अदालतों तक पहुंचा विवाद इतना बढ़ गया कि जिस कंपनी पर अंबानी परिवार का प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा था, आखिरकार उसका नियंत्रण उनके हाथ में नहीं रह सका।
यह कहानी करीब 1988 से 1994 के बीच तेजी से बदलते भारतीय कॉरपोरेट और राजनीतिक माहौल की भी कहानी है।
L&T पर धीरूभाई अंबानी की नजर क्यों पड़ी?
1980 के दशक के आखिर में Larsen & Toubro यानी L&T देश की सबसे महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में शामिल थी। कंपनी की जड़ें विदेशी संस्थापकों से जुड़ी थीं, लेकिन समय के साथ उसका शेयरहोल्डिंग पैटर्न काफी बिखर चुका था।
L&T के शुरुआती प्रमोटरों में एस. टुब्रो और हेनिंग होल्क-लार्सन शामिल थे। दोनों के भारत से बाहर जाने के बाद कंपनी पर किसी एक प्रमोटर का सीधा नियंत्रण नहीं रहा। यही स्थिति बाद में कंपनी को कॉरपोरेट टेकओवर की नजर से आकर्षक बनाती गई।
उस समय L&T का कारोबार रिलायंस के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो सकता था। इंजीनियरिंग, निर्माण, पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट और बड़े औद्योगिक प्लांट खड़े करने की क्षमता वाली L&T का रिलायंस के तेजी से बढ़ते औद्योगिक कारोबार के साथ बड़ा तालमेल बन सकता था।
1988 में L&T की बिक्री करीब 500 करोड़ रुपये के आसपास थी, जो आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ी। ऐसे में धीरूभाई के लिए यह सिर्फ एक कंपनी में निवेश का मामला नहीं था, बल्कि एक बड़े औद्योगिक साम्राज्य को और मजबूत करने का अवसर भी माना गया।
1988 में हुई अंबानी परिवार की एंट्री
1988 आते-आते L&T के अंदर नेतृत्व और प्रबंधन को लेकर कई विवाद सामने आ रहे थे। कंपनी के कामकाज, कुछ कारोबारी फैसलों और प्रबंधन को लेकर सवाल उठ रहे थे। इसी दौर में अंबानी परिवार ने L&T में अपनी हिस्सेदारी और प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी ने कंपनी के बोर्ड में प्रवेश किया। सितंबर 1988 की बोर्ड बैठक में मुकेश अंबानी और एमएल भक्ता को निदेशक बनाने का प्रस्ताव सामने आया। दोनों ने निदेशक बनने के लिए जरूरी शेयर खरीदे और बोर्ड का हिस्सा बन गए।
इसके बाद 30 दिसंबर 1988 को अनिल अंबानी भी L&T के निदेशक बने।
अंबानी परिवार की स्थिति लगातार मजबूत होती गई। कुछ महीनों बाद L&T के तत्कालीन चेयरमैन एनएम निक्की देसाई के इस्तीफे के बाद 28 अप्रैल 1989 को धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बन गए।
यहीं से यह कहानी भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे चर्चित बोर्डरूम संघर्षों में बदल गई।
निक्की देसाई और अंबानियों के रिश्ते क्यों बिगड़े?
शुरुआत में माना जाता था कि धीरूभाई अंबानी का ध्यान रणनीतिक दिशा पर रहेगा और कंपनी का रोजमर्रा का कामकाज मौजूदा प्रबंधन संभालेगा। लेकिन धीरे-धीरे दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ने लगे।
देसाई के खिलाफ कंपनी के कामकाज से जुड़े कई सवाल भी उठे। इनमें कंपनी के फ्लैट से जुड़े लेनदेन, कुछ संस्थाओं को चंदा देने और कारोबारी फैसलों से जुड़े आरोप शामिल थे। वित्त मंत्रालय और कंपनी लॉ बोर्ड की ओर से भी उनसे जुड़े सवाल उठाए गए।
देसाई ने इन आरोपों का सामना किया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने उनके और अंबानी परिवार के बीच संबंधों को और तनावपूर्ण बना दिया।
दूसरी ओर, अंबानी परिवार का मानना था कि L&T की मौजूदा प्रबंधन शैली उसकी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर रही थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1982 से 1989 के बीच कंपनी की रेवेन्यू ग्रोथ और रिटर्न ऑन नेटवर्थ जैसे संकेतकों में कमजोरी आई थी।
अंबानी परिवार के लिए यह सवाल अहम था कि क्या L&T को पुराने तरीके से चलाकर उसकी पूरी क्षमता हासिल की जा सकती है।
शेयर खरीद को लेकर उठा सबसे बड़ा विवाद
L&T में अंबानी परिवार के बढ़ते प्रभाव के साथ ही सवाल भी उठने लगे कि आखिर इन शेयरों को खरीदने की पूरी प्रक्रिया कैसे हुई।
1988 में अंबानी परिवार से जुड़ी कुछ निवेश कंपनियों के जरिए बड़ी रकम निवेश की गई। इसके बाद BoB Fiscal जैसी संस्थाओं के माध्यम से L&T के शेयरों की खरीद और ट्रांसफर का सिलसिला सामने आया।
बाद में इन लेनदेन को लेकर सवाल उठाए गए। इंडियन एक्सप्रेस में एस. गुरुमूर्ति ने L&T में अंबानी परिवार की बढ़ती हिस्सेदारी और शेयर खरीद के तरीके पर लगातार रिपोर्टिंग की।
आरोपों का एक हिस्सा यह भी था कि वित्तीय संस्थानों के जरिए L&T के शेयर हासिल करने की व्यवस्था का इस्तेमाल अंबानी परिवार के प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया गया।
यही विवाद आगे चलकर अदालत तक पहुंचा।
बॉम्बे हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
सितंबर 1989 में L&T के शेयर इश्यू और अंबानी परिवार की भूमिका को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। इसमें BoB Fiscal और उससे जुड़े लेनदेन पर सवाल उठाए गए थे।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन विवाद वहीं समाप्त नहीं हुआ। मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
इस दौरान अंबानी परिवार ने कुछ शेयरों को वापस बेचने का रास्ता भी अपनाया। शुरुआत में यह व्यवस्था लगभग नो-प्रॉफिट, नो-लॉस आधार पर करने की कोशिश बताई गई, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदलीं और अंबानी परिवार को नुकसान स्वीकार करते हुए सौदा वापस करना पड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया था कि L&T में लड़ाई अब केवल हिस्सेदारी की नहीं थी। असली सवाल था—कंपनी का नियंत्रण आखिर किसके हाथ में रहेगा?
L&T द्वारा Reliance के शेयर खरीदने पर भी सवाल
विवाद का एक और पहलू L&T और रिलायंस से जुड़े लेनदेन को लेकर सामने आया।
आरोप लगाया गया कि L&T के संसाधनों का इस्तेमाल रिलायंस से जुड़े शेयरों में निवेश के लिए किया गया। लगभग 75 करोड़ रुपये के इस निवेश पर भी सवाल उठे और आलोचकों ने इसे कंपनी के स्वतंत्र हितों के नजरिए से देखने की मांग की।
यहीं से शेयरधारकों, सरकार और कंपनी प्रबंधन के बीच तनाव और बढ़ गया।
प्रसिद्ध वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम जेठमलानी ने भी इस मुद्दे को उठाया और सवाल किया कि क्या अंबानी परिवार को L&T के बोर्ड में बने रहना चाहिए।
1990 में सरकार ने अंबानी परिवार को हटाने की तैयारी की
1989 के आम चुनाव के बाद केंद्र में राजनीतिक समीकरण बदल गए। राजीव गांधी की सरकार की जगह वीपी सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी।
1990 में सरकार ने L&T में अंबानी परिवार के प्रभाव को कम करने की दिशा में कदम उठाया। LIC से L&T के चार निदेशकों को हटाने के लिए असाधारण आम बैठक यानी EGM बुलाने को कहा गया।
जिन नामों पर कार्रवाई की तैयारी थी, उनमें धीरूभाई अंबानी, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और एमएल भक्ता शामिल थे।
अंबानी परिवार ने इसका विरोध किया और सरकार के कदम को गैर-लोकतांत्रिक बताया।
लेकिन अंततः धीरूभाई अंबानी ने अप्रैल 1990 में L&T के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद डी.एन. घोष ने चेयरमैन की जिम्मेदारी संभाली।
धीरूभाई के लिए यह एक बड़ा झटका था। कुछ समय पहले तक वह देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी के चेयरमैन थे, लेकिन अब कंपनी पर उनका सीधा नियंत्रण खत्म हो चुका था।
1991 में बदला देश, लेकिन L&T की लड़ाई जारी रही
1991 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक साल था। देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था और इसी दौर में नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने और भारतीय अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका तेजी से बढ़ने लगी।
इसी बदलते आर्थिक माहौल में अंबानी परिवार ने L&T में दोबारा प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की।
कंपनी के भीतर नेतृत्व भी बदल रहा था। एनएम राव के चेयरमैन बनने के बाद कुछ समय तक अंबानी परिवार को उम्मीद रही कि परिस्थितियां उनके पक्ष में आ सकती हैं। लेकिन जल्द ही कंपनी के स्वतंत्र प्रबंधन और अंबानी परिवार के बीच फिर दूरी बढ़ गई।
L&T के भीतर एक विचार मजबूत होने लगा था कि कंपनी को किसी बाहरी औद्योगिक समूह के नियंत्रण में जाने के बजाय पेशेवर तरीके से स्वतंत्र रूप से चलाया जाना चाहिए।
1994 में अंबानी गुट फिर मजबूत हुआ
1994 तक कहानी ने एक बार फिर नया मोड़ लिया।
L&T के बोर्ड में कई बदलाव हुए और कुछ ऐसे लोग रिटायर हुए जो अंबानी परिवार के प्रभाव के विरोधी माने जाते थे। इससे बोर्ड का समीकरण बदलने लगा।
19 सदस्यों वाले बोर्ड में मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और एमएल भक्ता पहले से मौजूद थे। कुछ अन्य निदेशकों के समर्थन के कारण अंबानी गुट की स्थिति मजबूत होती दिखाई देने लगी।
ऐसा लगने लगा कि अगर राजनीतिक और सरकारी स्तर पर हरी झंडी मिल जाए तो अंबानी परिवार L&T पर दोबारा मजबूत पकड़ बना सकता है।
लेकिन यहां सबसे बड़ी अड़चन थी वित्त मंत्रालय की मंजूरी।
मनमोहन सिंह ने इस मामले में जल्दबाजी नहीं की और अंबानी परिवार की L&T पर पकड़ मजबूत होने की कोशिश को आगे बढ़ने से रोक दिया।
यानी अंबानी परिवार के पास बोर्डरूम में पर्याप्त ताकत दिखाई दे रही थी, लेकिन अंतिम राजनीतिक और संस्थागत समर्थन नहीं मिल सका।
आखिर क्यों हाथ से निकल गई L&T?
L&T की कहानी को सिर्फ इस नजरिए से देखना सही नहीं होगा कि अंबानी परिवार ने कंपनी खरीदी और सरकार ने उसे छीन लिया। असल कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल थी।
एक तरफ बिखरी हुई शेयरहोल्डिंग ने अंबानी परिवार को कंपनी में प्रभाव बढ़ाने का मौका दिया। दूसरी तरफ शेयर खरीद की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने विवाद पैदा किया।
फिर कंपनी के पुराने प्रबंधन, अंबानी परिवार, वित्तीय संस्थानों, सरकार और शेयरधारकों के हित एक-दूसरे से टकराने लगे।
राजनीतिक सत्ता बदलने के साथ L&T को लेकर सरकार का रुख भी बदलता गया। कोर्ट में मामला पहुंचा और कंपनी के बोर्ड में भी लगातार शक्ति संतुलन बदलता रहा।
यही कारण रहा कि धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बनने के बावजूद कंपनी को रिलायंस समूह की स्थायी संपत्ति नहीं बना सके।
धीरूभाई अंबानी के लिए क्यों थी L&T इतनी खास?
धीरूभाई अंबानी की कारोबारी रणनीति का सबसे बड़ा गुण था—वर्टिकल इंटीग्रेशन, यानी कारोबार की अलग-अलग कड़ियों को अपने नियंत्रण में लाना।
रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स, पॉलिएस्टर और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार कर रहा था। ऐसे में L&T जैसी विशाल इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट निर्माण कंपनी रिलायंस के औद्योगिक विस्तार को जबरदस्त ताकत दे सकती थी।
अगर L&T पर अंबानी परिवार का स्थायी नियंत्रण हो जाता, तो रिलायंस के औद्योगिक प्रोजेक्ट्स से लेकर बड़े इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर कामों तक एक बड़ा कारोबारी इकोसिस्टम तैयार हो सकता था।
इसीलिए L&T को लेकर अंबानी परिवार की दिलचस्पी को केवल निवेश के रूप में देखना अधूरा होगा।
एक सपना जो पूरा नहीं हो सका
L&T का संघर्ष भारतीय कॉरपोरेट इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें शेयर बाजार, बोर्डरूम, सरकार और अदालत—चारों एक साथ दिखाई देते हैं।
धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन की कुर्सी तक पहुंचे। मुकेश और अनिल अंबानी बोर्ड में शामिल हुए। अंबानी गुट ने कई बार कंपनी में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की। 1994 तक बोर्ड का समीकरण भी उनके पक्ष में झुकता दिखाई दिया।
फिर भी L&T रिलायंस का हिस्सा नहीं बन सकी।
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट है। जिस दौर में धीरूभाई अंबानी अपने कारोबारी साम्राज्य को तेजी से विस्तार दे रहे थे, उसी दौर में L&T जैसी बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी पर उनकी पकड़ बनने के बावजूद स्थायी नियंत्रण उनके हाथ से निकल गया।
आज L&T एक स्वतंत्र और विशाल इंजीनियरिंग एवं इंफ्रास्ट्रक्चर समूह के रूप में अपनी अलग पहचान रखती है। वहीं रिलायंस ने भी बाद के दशकों में पेट्रोकेमिकल्स से लेकर टेलीकॉम, रिटेल और डिजिटल कारोबार तक अपनी अलग राह बनाई।
L&T की यह कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें धीरूभाई अंबानी की कारोबारी महत्वाकांक्षा भी दिखती है और भारतीय कॉरपोरेट व्यवस्था की वह ताकत भी, जिसने एक समय बेहद प्रभावशाली अंबानी गुट को भी कंपनी पर स्थायी नियंत्रण हासिल नहीं करने दिया।


