Iran-US War News Update: ईरान को दबाव में लाने की अमेरिका की कोशिशें लंबी खिंचती जा रही हैं और इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट भी गहराता जा रहा है। दुनिया के सबसे अहम तेल शिपिंग रूट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से वैश्विक तेल बाजार पर दबाव बढ़ा है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए अमेरिकियों को तेल की ऊंची कीमत का सामना करना पड़ सकता है।
ईरान की शर्तों से अटका होर्मुज संकट
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट को सामान्य रूप से खोलने के मुद्दे पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। ट्रंप का कहना है कि ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती और उसे रोकने के लिए कुछ आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत फिलहाल आगे नहीं बढ़ पा रही है। जून में सामने आए शुरुआती समझौते की दिशा में दोनों देशों के लौटने की संभावना भी अभी कमजोर नजर आ रही है।
इसका सीधा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई दे रहा है। सामान्य परिस्थितियों में बड़ी संख्या में तेल और मालवाहक जहाज इस समुद्री रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन मौजूदा संकट के कारण आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। कुछ जहाज जोखिम उठाते हुए अपने ट्रांसपोंडर बंद करके भी इस मार्ग से गुजरने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरान बोला- सिर्फ ट्वीट से नहीं खुलेगा होर्मुज
रॉयटर्स के अनुसार, ईरान ने अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। ईरानी उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना या बंद करना ईरान के अधिकार क्षेत्र में आता है।
उन्होंने अमेरिका पर जमीनी वास्तविकता को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए कहा कि महज ट्वीट, युद्धपोत, आदेश या चुनावी भाषण से होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला जा सकता।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी कहा है कि तेहरान ने अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर अभी कोई फैसला नहीं किया है। ईरान का रुख है कि यदि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना चाहता है तो उसे ईरान की शर्तों को स्वीकार करना होगा।
ट्रंप के बयान से बढ़ी तेल बाजार की चिंता
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है। यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने से तेल की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसे में ट्रंप का अमेरिकियों को ऊंची तेल कीमतों के लिए तैयार रहने का संकेत बाजार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका तर्क है कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान को रोकना रणनीतिक रूप से जरूरी है और इसके लिए अमेरिका को कुछ आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अगर संकट लंबा चलता है तो इसका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रह सकता। एशिया और यूरोप के उन देशों पर भी दबाव बढ़ सकता है जो मध्य पूर्व से तेल आयात करते हैं।
तीन ईरानी पायलटों के कतर में होने का दावा
इस बीच ईरान से जुड़ी एक और खबर सामने आई है। एएनआई ने फार्स न्यूज के हवाले से दावा किया है कि ईरान के तीन लड़ाकू विमान पायलट कतर के कब्जे में हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ये पायलट एसयू-24 विमानों में सवार थे और कतर स्थित अल उदैद अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हमले के दौरान कतर की कार्रवाई की चपेट में आए।
ईरानी सर्च कमेटी के कमांडर मोहम्मद बाघेरजादेह के मुताबिक, जावाद सलेही, अब्दोल-माजिद दश्तियान और इमरान बेहरूशियान पिछले छह महीने से कतर के कब्जे में हैं। ईरान का आरोप है कि इन पायलटों को इंटरनेशनल रेड क्रॉस के प्रतिनिधियों से मिलने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है।
ईरान ने इस स्थिति को जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन बताया है। इसके अलावा कतर से एक अन्य ईरानी पायलट का शव मिलने और डीएनए जांच के बाद उसकी पहचान माजिद काजेमी के रूप में होने का भी दावा किया गया है।
दक्षिणी लेबनान में इजरायली हमले, 9 लोगों की मौत
मध्य पूर्व में तनाव सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। इजरायल ने शनिवार को दक्षिणी लेबनान में भी हवाई हमले किए।
एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अंसार गांव में हुए हमले में नौ लोगों की मौत हुई है। मृतकों में तीन बच्चे भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 20 जून को इजरायल और हिजबुल्ला के बीच हुए युद्धविराम के बाद इसे क्षेत्र में हुए सबसे बड़े हमलों में से एक माना जा रहा है।
आगे क्या होगा?
होर्मुज जलडमरूमध्य पर जारी गतिरोध अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर से शुरू नहीं होती और समुद्री मार्ग पर सामान्य आवाजाही बहाल नहीं होती, तो तेल की कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान किसी समझौते तक पहुंच पाएंगे या होर्मुज संकट लंबे समय तक जारी रहेगा। इसका जवाब आने वाले दिनों में न केवल मध्य पूर्व की राजनीति, बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और तेल बाजार की दिशा भी तय कर सकता है।


