Ankur Warikoo Parenting Tips: उद्यमी और कंटेंट क्रिएटर अंकुर वारिकू ने बच्चों की परवरिश को लेकर अपने तीन खास नियम साझा किए हैं। उनके मुताबिक बच्चों को सिर्फ पढ़ाई और करियर की तैयारी कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पैसों की समझ, आत्मनिर्भरता और रिश्तों में सम्मान की अहमियत भी बचपन से सिखानी चाहिए। वारिकू दो बच्चों के पिता हैं और उन्होंने बताया कि वह और उनकी पत्नी रुचि किस तरह बच्चों के साथ इन मूल्यों को व्यवहार में उतारते हैं।
आज के दौर में बच्चों पर विज्ञापनों, सोशल मीडिया और दोस्तों के प्रभाव के कारण कम उम्र में ही नई चीजों की चाह बढ़ रही है। ऐसे में माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि बच्चों की हर इच्छा पूरी करने और उन्हें सही वित्तीय आदतें सिखाने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अंकुर वारिकू के बताए तीन नियम इसी दिशा में एक व्यावहारिक नजरिया पेश करते हैं।
पहला नियम: बच्चों से पैसों को लेकर झूठ नहीं बोलते
अंकुर वारिकू के मुताबिक, वह और उनकी पत्नी बच्चों से पैसों से जुड़ी बातों को छिपाने या झूठ बोलने के बजाय उन्हें सही नजरिया देने की कोशिश करते हैं। हालांकि, उनके घर में किसी चीज को खरीदने से मना करने के लिए यह नहीं कहा जाता कि ‘हम इसे अफोर्ड नहीं कर सकते।’
इसके बजाय बच्चों से कहा जाता है कि ‘हमें इसकी जरूरत नहीं है।’
इन दोनों वाक्यों में काफी अंतर है। ‘हम इसे अफोर्ड नहीं कर सकते’ कहने से बच्चे के मन में यह धारणा बन सकती है कि अगर परिवार के पास पर्याप्त पैसा होता तो वह चीज जरूर खरीद ली जाती। वहीं, ‘हमें इसकी जरूरत नहीं है’ बच्चे को यह समझने में मदद करता है कि हर खरीदी जाने वाली चीज जरूरी नहीं होती।
जरूरत और इच्छा का फर्क समझना जरूरी
बच्चों को बचपन से ही Need और Want के बीच का अंतर समझाना वित्तीय शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। उदाहरण के लिए, स्कूल की किताबें, जरूरी कपड़े या पढ़ाई से जुड़ी चीजें जरूरत हो सकती हैं, जबकि किसी दोस्त के पास नया गैजेट देखकर वही चीज खरीदने की इच्छा अलग श्रेणी में आती है।
वारिकू का नजरिया यही बताता है कि बच्चे सिर्फ इसलिए किसी वस्तु की मांग न करें क्योंकि वह उनके दोस्तों या दूसरे बच्चों के पास है।
इससे बच्चों में तुलना के बजाय जरूरत के आधार पर फैसला लेने की आदत विकसित हो सकती है।
बच्चों को हर इच्छा पूरी करना जरूरी नहीं
माता-पिता अक्सर बच्चों की खुशी के लिए उनकी मांगें पूरी कर देते हैं। लेकिन हर मांग पूरी होना जरूरी नहीं है। अगर बच्चा किसी महंगी चीज की मांग करता है, तो माता-पिता उसके साथ यह चर्चा कर सकते हैं कि वह चीज क्यों चाहिए, उसका इस्तेमाल कितना होगा और क्या उसके बिना काम चल सकता है।
इस तरह बच्चा धीरे-धीरे समझ सकता है कि पैसा सीमित संसाधन है और उसे सोच-समझकर खर्च करना चाहिए।
दूसरा नियम: बच्चों को हर परेशानी से नहीं बचाते
अंकुर वारिकू का दूसरा नियम बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने से जुड़ा है। उनका कहना है कि जब बच्चे किसी समस्या में फंसते हैं या बोर होते हैं, तो माता-पिता को हर बार तुरंत हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।
कई माता-पिता बच्चों की छोटी से छोटी परेशानी भी खुद हल कर देते हैं। बच्चा बोर हुआ तो मनोरंजन का इंतजाम कर दिया, कोई छोटी समस्या आई तो माता-पिता ने समाधान बता दिया या किसी गलती के बाद तुरंत स्थिति संभाल ली।
लेकिन वारिकू का मानना है कि बच्चों को कुछ समस्याओं का सामना खुद करने का अवसर मिलना चाहिए।
हर समस्या का समाधान माता-पिता नहीं देंगे
बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनके सामने पढ़ाई, करियर, पैसे, रिश्ते और व्यक्तिगत फैसलों से जुड़ी कई चुनौतियां आती हैं। उस समय माता-पिता हर जगह मौजूद नहीं रह सकते।
इसलिए बचपन में ही उन्हें छोटे-छोटे फैसले खुद लेने देना उपयोगी हो सकता है।
मसलन, बच्चा किसी गतिविधि को लेकर परेशान है तो माता-पिता तुरंत फैसला लेने के बजाय उससे पूछ सकते हैं कि वह समस्या को कैसे हल करना चाहता है। इससे बच्चे को सोचने, विकल्प तलाशने और अपने फैसले की जिम्मेदारी लेने का अनुभव मिलता है।
बोरियत भी सीखने का मौका है
वारिकू के नजरिए में बच्चों का हर समय मनोरंजन करना भी जरूरी नहीं है। आज स्मार्टफोन, गेम्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के कारण बच्चों के पास मनोरंजन के बहुत साधन हैं। ऐसे में थोड़ी बोरियत उन्हें खुद कुछ नया करने, पढ़ने, खेलने या किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर जाने के लिए प्रेरित कर सकती है।
आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं कि माता-पिता बच्चों को अकेला छोड़ दें। इसका अर्थ है कि जहां बच्चे खुद कोशिश कर सकते हैं, वहां उन्हें कोशिश करने का मौका दिया जाए।
माता-पिता जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शन दे सकते हैं, लेकिन हर समस्या का पूरा समाधान खुद करना जरूरी नहीं है।
तीसरा नियम: असहमति हो सकती है, लेकिन अनादर नहीं
अंकुर वारिकू का तीसरा नियम परिवार के रिश्तों और घर के माहौल से जुड़ा है। उनके मुताबिक बच्चे अपने माता-पिता को आपस में असहमत होते हुए देख सकते हैं। दोनों के बीच बहस या अलग राय होना भी स्वाभाविक है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—असहमति के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान बना रहना चाहिए।
यह बच्चों के लिए बेहद महत्वपूर्ण सीख हो सकती है, क्योंकि वे अपने माता-पिता के व्यवहार को देखकर रिश्तों के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं।
बच्चों को यह समझना चाहिए कि मतभेद सामान्य हैं
अच्छे रिश्ते का मतलब यह नहीं है कि दो लोगों की हर बात पर सहमति हो। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चे या दोस्तों के बीच अलग-अलग विचार होना सामान्य है।
महत्वपूर्ण यह है कि अपनी बात रखते समय सामने वाले का अपमान न किया जाए।
अगर बच्चे घर में देखते हैं कि माता-पिता किसी मुद्दे पर अलग राय रखने के बावजूद एक-दूसरे की बात सुनते हैं और सम्मान बनाए रखते हैं, तो वे भी भविष्य में असहमति को बेहतर तरीके से संभालना सीख सकते हैं।
बहस और अनादर में अंतर समझाना जरूरी
बच्चों को यह अंतर समझाना जरूरी है कि अपनी बात पर कायम रहना और किसी व्यक्ति का अपमान करना एक ही बात नहीं है।
कोई बच्चा माता-पिता की राय से असहमत हो सकता है। वह अपनी पसंद या विचार खुलकर बता सकता है। लेकिन बात रखने का तरीका सम्मानजनक होना चाहिए।
इसी तरह माता-पिता को भी बच्चों की असहमति को केवल ‘बदतमीजी’ मानने के बजाय उनकी बात सुनने की कोशिश करनी चाहिए।
अंकुर वारिकू की सीख का बड़ा मतलब क्या है?
अंकुर वारिकू के ये तीन नियम सिर्फ बच्चों की परवरिश से जुड़े नियम नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे वित्तीय समझ और जीवन कौशल की बड़ी सीख छिपी है।
पहला नियम बच्चों को बताता है कि पैसा खर्च करने से पहले जरूरत और इच्छा में अंतर करना चाहिए।
दूसरा नियम उन्हें सिखाता है कि हर समस्या का समाधान कोई दूसरा व्यक्ति नहीं करेगा और खुद फैसले लेना सीखना जरूरी है।
तीसरा नियम बताता है कि रिश्तों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए।
इन तीनों बातों का असर बच्चे के भविष्य पर पड़ सकता है। पैसे की समझ उसे जिम्मेदार उपभोक्ता और बेहतर वित्तीय निर्णय लेने वाला व्यक्ति बनाने में मदद कर सकती है। आत्मनिर्भरता उसे मुश्किल परिस्थितियों में खुद रास्ता तलाशने का आत्मविश्वास दे सकती है। वहीं, सम्मान के साथ असहमति जताने की आदत उसके व्यक्तिगत और पेशेवर रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
बच्चों को Financial Literacy कब सिखानी चाहिए?
वित्तीय शिक्षा के लिए किसी खास उम्र का इंतजार करना जरूरी नहीं है। बच्चों को उनकी उम्र और समझ के अनुसार धीरे-धीरे पैसे से जुड़े फैसलों में शामिल किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए:
- छोटे बच्चों को जरूरत और इच्छा का अंतर समझाया जा सकता है।
- पॉकेट मनी मिलने पर उन्हें खर्च और बचत के बारे में बताया जा सकता है।
- बड़े बच्चों के साथ बजट बनाने और लक्ष्य के लिए बचत करने पर चर्चा की जा सकती है।
- किशोर बच्चों को डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन शॉपिंग और क्रेडिट जैसी चीजों के बारे में जिम्मेदारी से समझाया जा सकता है।
- किसी महंगी चीज की मांग पर सीधे ‘हां’ या ‘नहीं’ कहने के बजाय उसके फायदे, जरूरत और खर्च पर चर्चा की जा सकती है।
इस तरह Financial Literacy किसी एक पाठ या लेक्चर का विषय नहीं रहती, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है।
निष्कर्ष
अंकुर वारिकू के तीन Parenting Rules का मूल संदेश काफी सरल है—बच्चों को हर सुविधा देने से ज्यादा जरूरी है उन्हें सही फैसले लेना सिखाना। पैसे के मामले में उन्हें यह समझना चाहिए कि हर इच्छा जरूरी नहीं होती। समस्याओं के मामले में उन्हें खुद कोशिश करने का अवसर मिलना चाहिए और रिश्तों में यह सीख जरूरी है कि असहमति के बावजूद सम्मान कायम रखा जा सकता है।
बच्चों को आर्थिक रूप से समझदार, आत्मनिर्भर और रिश्तों के प्रति संवेदनशील बनाने की शुरुआत किसी बड़े वित्तीय पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि घर में होने वाली छोटी-छोटी बातचीत और रोजमर्रा के फैसलों से की जा सकती है।


