Corporate History India: भारत के कारोबारी इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ देश में कारोबार खड़ा नहीं किया, बल्कि भारतीय कंपनियों को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। ऐसी ही कहानी आदित्य बिड़ला की है। उन्होंने ऐसे समय में विदेश में कारोबार का विस्तार शुरू किया, जब भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी निवेश करना आज की तरह आसान नहीं था। विदेशी मुद्रा पर सख्त नियंत्रण, सीमित पूंजी और लंबी नौकरशाही प्रक्रिया बड़ी बाधाएं थीं।
इसके बावजूद आदित्य बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया को अपने अंतरराष्ट्रीय विस्तार का आधार बनाया। थाईलैंड में करीब 1 करोड़ रुपये की एक टेक्सटाइल मिल से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर कई महाद्वीपों तक पहुंचा। उनकी कारोबारी सफलता ऐसी रही कि बाद में दूसरे देशों के नेता और सरकारें भी बिड़ला समूह को अपने यहां निवेश के लिए आमंत्रित करने लगीं।
थाईलैंड से शुरू हुआ विदेश जाने का सफर
1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में थाईलैंड विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था। सरकार की ओर से निवेशकों को टैक्स में राहत और पूंजीगत उपकरणों के आयात पर सुविधाएं दी जा रही थीं।
आदित्य बिड़ला ने इस अवसर को पहचाना और थाईलैंड में टेक्सटाइल कारोबार से अपने अंतरराष्ट्रीय विस्तार की शुरुआत की। यह निवेश आकार में भले ही छोटा था, लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
शुरुआत के बाद उनकी कंपनी को थाई एयरवेज की एयर होस्टेस यूनिफॉर्म के लिए ऑर्डर मिला। इससे कारोबार को शुरुआती मजबूती मिली और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देशों में विस्तार का रास्ता खुला।
एक मिल से तीन देशों तक पहुंचा कारोबार
थाईलैंड की शुरुआती सफलता के बाद बिड़ला समूह ने इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी कारोबार का विस्तार किया। यानी जिस विदेशी सफर की शुरुआत एक छोटी टेक्सटाइल मिल से हुई थी, वह कुछ ही वर्षों में कई देशों में फैले कारोबारी नेटवर्क में बदलने लगा।
फिलीपींस के साथ आदित्य बिड़ला के संबंधों में उनके व्यक्तिगत संपर्कों की भी भूमिका रही। वह फिलीपींस के तत्कालीन राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस से मिले थे। बाद में उन्हें भारत में फिलीपींस का मानद कौंसल भी बनाया गया।
हालांकि, उनका उद्देश्य केवल कूटनीतिक संबंध बनाना नहीं था। वह विदेश में ऐसे कारोबार खड़े करना चाहते थे, जिन्हें लंबे समय तक चलाया जा सके।
10 कंपनियां और 10 करोड़ डॉलर की बिक्री
1970 से 1980 के बीच आदित्य बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया में करीब 10 कंपनियां खड़ी कर दीं। इन कंपनियों की कुल बिक्री करीब 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई थी।
1990 के दशक के मध्य तक बिड़ला समूह की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी काफी मजबूत हो चुकी थी। मलेशिया में पाम ऑयल कारोबार और थाईलैंड में बड़े निवेश ने समूह को दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख भारतीय निवेशकों में शामिल कर दिया।
यानी विदेश में शुरुआत करने वाला यह कारोबारी धीरे-धीरे उन बाजारों में अपनी जगह बना चुका था, जहां उस दौर में अमेरिकी, जापानी और यूरोपीय कंपनियों का दबदबा था।
फिलीपींस में लगा बड़ा झटका, लेकिन नहीं मानी हार
1986 में फिलीपींस की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। फर्डिनेंड मार्कोस के सत्ता से हटने के बाद बिड़ला समूह की एक नारियल तेल रिफाइनरी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। यह समूह के लिए बड़ा झटका था।
लेकिन आदित्य बिड़ला ने इससे फिलीपींस से कारोबार समेटने का फैसला नहीं किया। जैसे-जैसे वहां आर्थिक परिस्थितियां सुधरीं, समूह ने फिर निवेश बढ़ाया।
1987 में करीब 5.5 करोड़ डॉलर के एक प्रोजेक्ट का ऐलान किया गया, जिसमें हर साल 23,000 टन रेयॉन फाइबर उत्पादन की योजना थी। बाद में 1991 में फिलीपींस में एक और कंपनी शुरू की गई।
यह घटना बिड़ला की कारोबारी रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। किसी एक निवेश में झटका लगने के बावजूद उन्होंने पूरे बाजार को छोड़ने के बजाय लंबी अवधि की संभावना पर ध्यान दिया।
1990 तक 1,200 करोड़ रुपये का विदेशी साम्राज्य
1990 तक बिड़ला समूह की थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में करीब 12 कंपनियां थीं। इनका कुल कारोबारी साम्राज्य लगभग 1,200 करोड़ रुपये का बताया जाता है।
इसके सिर्फ पांच साल बाद, 1995 तक समूह की मौजूदगी 14 देशों में 17 कंपनियों तक पहुंच गई थी और कुल बिक्री करीब 5,200 करोड़ रुपये हो गई थी।
यह उस दौर में बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि भारत में विदेशी निवेश के लिए नियम काफी सख्त थे।
भारत में कम लोगों को पता था विदेशी कारोबार की ताकत
आदित्य बिड़ला समूह का विदेशी कारोबार लंबे समय तक भारत में अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा। इसकी एक वजह उस समय का कारोबारी और नियामकीय माहौल भी था।
MRTP Act और FERA जैसे कानूनों के दौर में भारतीय कंपनियों के लिए विदेश में कारोबार करना आज की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल था। बिड़ला समूह की कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां निजी नियंत्रण में थीं और उनकी पूरी तस्वीर भारतीय बाजार में आसानी से दिखाई नहीं देती थी।
1990 के दशक में समूह ने अपने विदेशी कारोबार को ज्यादा प्रमुखता से सामने रखना शुरू किया। तब तक कई विदेशी कंपनियां शानदार मुनाफा दे रही थीं और समूह ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी कारोबारी क्षमता साबित कर दी थी।
22 फीसदी रिटर्न से कम वाले कारोबार से दूरी
आदित्य बिड़ला की कारोबारी रणनीति में मुनाफे की अहम भूमिका थी। वह ऐसे कारोबार में आसानी से प्रवेश नहीं करते थे, जहां इक्विटी पर पर्याप्त रिटर्न मिलने की संभावना न हो।
उनका जोर ऐसे व्यवसायों पर था, जिन्हें वह भारत में पहले से अच्छी तरह समझते थे और जिनके बिजनेस मॉडल को दूसरे देशों में दोहराया जा सकता था।
यही वजह है कि विदेशी विस्तार किसी अचानक लिए गए फैसले जैसा नहीं था। भारत में विकसित विशेषज्ञता को दूसरे देशों के बाजारों में इस्तेमाल करना बिड़ला की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
कार्बन ब्लैक ने बनाया वैश्विक खिलाड़ी
बिड़ला समूह ने टेक्सटाइल के अलावा औद्योगिक कारोबार में भी तेजी से विस्तार किया। 1988 में इंडियन रेयॉन के कारोबार में कार्बन ब्लैक को जोड़ा गया।
भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बाद समूह ने थाईलैंड और मिस्र जैसे बाजारों में भी प्लांट लगाए। आगे चलकर कार्बन ब्लैक कारोबार ने बिड़ला समूह को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण निर्माता बना दिया।
समूह का फोकस सिर्फ कंज्यूमर ब्रांड्स पर नहीं था। विस्कोस, एक्रिलिक फाइबर, कार्बन ब्लैक, सिंथेटिक यार्न, पाम ऑयल, फैटी एसिड, डिटर्जेंट इंटरमीडिएट्स, एपॉक्सी रेजिन और हाइड्रोजन पेरोक्साइड जैसे औद्योगिक उत्पादों में भी विस्तार किया गया।
जब दूसरे देशों के नेता खुद निवेश के लिए बुलाने लगे
बिड़ला समूह की अंतरराष्ट्रीय सफलता का असर यह हुआ कि कई देशों की सरकारें समूह को अपने यहां निवेश के लिए आकर्षित करने लगीं।
1993 में भूटान के राजा भारत आए और वहां चूना पत्थर के संसाधनों पर आधारित सीमेंट प्लांट लगाने की संभावनाओं पर भारतीय उद्योगपतियों से संपर्क किया। संभावित निवेशकों में आदित्य बिड़ला का नाम भी शामिल था।
1994 में थाईलैंड के प्रधानमंत्री चुआन लीकपाई ने बिड़ला समूह के थाईलैंड में 25 साल पूरे होने के मौके पर समूह को बधाई दी। इसी दौरान थाईलैंड में नए निवेश की योजनाओं की चर्चा हुई।
रूस से भी समूह के सामने पल्प प्लांट में निवेश का अवसर आया। यानी बिड़ला की पहचान अब केवल भारतीय कारोबारी तक सीमित नहीं रह गई थी, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय निवेशक के रूप में स्थापित हो चुके थे।
थाईलैंड को बनाना चाहते थे दूसरा बड़ा मैन्युफैक्चरिंग बेस
दक्षिण-पूर्व एशिया में सफलता के बाद आदित्य बिड़ला की रणनीति और बड़ी हो गई। थाईलैंड को भारत के बाद समूह के प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग बेस के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई।
इसके साथ ही वियतनाम में टेक्सटाइल, मिस्र में कार्बन ब्लैक और मलेशिया, फिलीपींस तथा इंडोनेशिया में नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया गया।
इस तरह समूह ने सिर्फ एक देश में निवेश करने के बजाय अलग-अलग देशों की औद्योगिक जरूरतों और संसाधनों के हिसाब से अपना कारोबार फैलाया।
आज 41 से ज्यादा देशों में फैला है आदित्य बिड़ला समूह
जिस अंतरराष्ट्रीय कारोबार की शुरुआत 1970 के दशक में थाईलैंड की एक छोटी टेक्सटाइल मिल से हुई थी, वह आज एक विशाल वैश्विक कारोबार में बदल चुका है।
आदित्य बिड़ला समूह की मौजूदगी 40 से ज्यादा देशों में है और समूह का कारोबार एशिया, यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका तक फैला हुआ है। समूह की वैश्विक कंपनियां मेटल्स और माइनिंग, सीमेंट, पल्प और फाइबर, केमिकल्स, कार्बन ब्लैक, फैशन और रिटेल, वित्तीय सेवाओं, पेंट्स तथा ज्वैलरी जैसे कई क्षेत्रों में काम करती हैं।
समूह की प्रमुख कंपनियों में Hindalco Industries, UltraTech Cement और अन्य व्यवसाय शामिल हैं। टेलीकॉम क्षेत्र में समूह की मौजूदगी Vodafone Idea के जरिए भी रही है।
आज समूह के कारोबार का 50 फीसदी से अधिक राजस्व भारत के बाहर के ऑपरेशंस से आने की बात कही जाती है, जो बताता है कि आदित्य बिड़ला की वह रणनीति कितनी सफल रही, जिसकी शुरुआत दशकों पहले एक छोटे विदेशी निवेश से हुई थी।
एक छोटी मिल से वैश्विक साम्राज्य तक
आदित्य बिड़ला की कहानी की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने विदेशों में कंपनियां स्थापित कीं। असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने उस समय वैश्विक विस्तार का रास्ता चुना, जब भारतीय कारोबारियों के लिए विदेश जाना आज की तुलना में बेहद मुश्किल था।
करीब 1 करोड़ रुपये की थाई टेक्सटाइल मिल से शुरू हुआ सफर 40 से अधिक देशों में फैले वैश्विक कारोबार तक पहुंचा। यही वजह है कि भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में आदित्य बिड़ला का नाम शुरुआती ग्लोबलाइजेशन के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में लिया जाता है।


