Jacob Diamond Story: दुनिया में कई ऐसे हीरे हैं जिनकी चमक उनकी कीमत से ज्यादा उनकी कहानियों की वजह से मशहूर है। ऐसा ही एक अनोखा रत्न है जैकब डायमंड (Jacob Diamond)। 184.75 कैरेट का यह हीरा आकार में कोहिनूर से भी बड़ा है, लेकिन इसकी पहचान किसी शाही ताज या मुकुट की वजह से नहीं, बल्कि विवादों, अंधविश्वास, अदालतों और एक जूते में छिपे रहने की कहानी से बनी है।
कभी हैदराबाद के निजाम के खजाने का हिस्सा रहा यह हीरा आज भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सुरक्षित तिजोरी में रखा हुआ है। इसकी यात्रा एक अंतरराष्ट्रीय हीरा व्यापारी से शुरू होकर शाही दरबार, कानूनी लड़ाई और आखिरकार भारत सरकार तक पहुंची।
गोलकुंडा की धरती से निकला था जैकब डायमंड
माना जाता है कि जैकब डायमंड का संबंध भारत के प्रसिद्ध गोलकुंडा हीरा क्षेत्र से है, जहां से दुनिया के कई ऐतिहासिक हीरे निकले हैं। हालांकि, इसके शुरुआती इतिहास को लेकर कई तरह की कहानियां मिलती हैं।
कहा जाता है कि तराशने से पहले यह कच्चा हीरा 400 कैरेट से अधिक वजन का था। बाद में इसे काटकर और पॉलिश करके 58 पहलुओं वाले खूबसूरत कुशन-कट आकार में बदला गया। इसके बाद इसका वजन 184.75 कैरेट रह गया।
इसकी लंबाई करीब 40 मिलीमीटर है और यह दुनिया के सबसे बड़े पॉलिश किए गए हीरों में गिना जाता है।
अलेक्जेंडर मैल्कम जैकब के हाथों पहुंचा हीरा
1880 के दशक के अंत में यह हीरा ब्रिटिश भारत के मशहूर लेकिन विवादित जूलर अलेक्जेंडर मैल्कम जैकब के पास पहुंचा। जैकब शिमला में रहते थे और रत्नों, प्राचीन वस्तुओं तथा दुर्लभ चीजों के बड़े व्यापारी माने जाते थे।
उनकी छवि बेहद रहस्यमय थी। कुछ लोग उन्हें शानदार कारोबारी मानते थे तो कुछ उन पर शक करते थे। उनकी जिंदगी इतनी दिलचस्प थी कि प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग के उपन्यास ‘किम’ में मौजूद किरदार “लुरगन साहिब” को उनसे प्रेरित माना जाता है।
जैकब की जिंदगी पर शोध करने वाले लेखक जॉन जुब्रिज्की ने अपनी किताब The Mysterious Mr Jacob: Diamond Merchant, Magician and Spy में उनके व्यक्तित्व और विवादों का विस्तार से वर्णन किया है।
निजाम को बेचने की कोशिश और शुरू हुआ विवाद
जैकब को लगा कि हैदराबाद के छठे निजाम मीर महबूब अली खान इस हीरे के सबसे बड़े खरीदार हो सकते हैं। निजाम अपनी दौलत, शाही जीवनशैली और गहनों के शौक के लिए प्रसिद्ध थे।
1891 में जैकब ने निजाम को यह हीरा बेचने की कोशिश की। बातचीत निजाम के करीबी अधिकारी अल्बर्ट आबिद के माध्यम से हुई। सौदे के लिए बड़ी रकम एडवांस के तौर पर जमा की गई। आम तौर पर इस रकम को करीब 23 लाख रुपये बताया जाता है।
लेकिन असली विवाद तब शुरू हुआ जब निजाम के सामने हीरा पेश किया गया।
कहा जाता है कि हीरा लाल मखमल से सजी चांदी की ट्रे पर रखा गया था। निजाम ने उसे देखकर कथित तौर पर कहा— “ना पसंद”।
यहीं से दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया। जैकब का दावा था कि निजाम खरीद के लिए तैयार थे, जबकि निजाम ने पैसे वापस मांग लिए।
अदालत तक पहुंचा मामला
यह विवाद धीरे-धीरे बड़ा कानूनी मामला बन गया। ब्रिटिश अदालतों तक इसकी चर्चा पहुंची और पूरे भारत में यह मामला सुर्खियों में रहा।
निजाम जैसे शासक का अदालतों में जाना उस दौर में प्रतिष्ठा का सवाल माना जाता था। मामले की जांच के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई गई।
आखिरकार जैकब धोखाधड़ी के आरोपों से बच गए, लेकिन इस विवाद ने उनकी प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति को नुकसान पहुंचाया।
दिलचस्प बात यह है कि अंत में हीरा निजाम के पास ही चला गया, लेकिन अब यह उनके लिए गर्व की चीज नहीं बल्कि एक पुराने विवाद की याद बन चुका था।
जूते में क्यों छिपा दिया गया था जैकब डायमंड?
जैकब डायमंड की सबसे मशहूर कहानी यही है कि यह वर्षों तक एक जूते में छिपा रहा।
निजाम मीर महबूब अली खान इस हीरे को शुभ नहीं मानते थे। कहा जाता है कि उन्होंने इसे कपड़े में लपेटकर रख दिया। कुछ कहानियों के अनुसार, यह हीरा पुराने जूते के अंदर छिपाकर रखा गया था।
1911 में निजाम की मृत्यु के बाद उनके बेटे मीर उस्मान अली खान ने जब सामान की जांच की तो यह दुर्लभ हीरा फिर सामने आया।
सबसे लोकप्रिय कहानी के अनुसार, यह चौमहल्ला पैलेस में एक जूते के अगले हिस्से में मिला था।
इतने बड़े और कीमती हीरे का इस तरह गुमनाम पड़े रहना आज भी लोगों को हैरान करता है।
दुनिया का सबसे महंगा पेपरवेट
मीर उस्मान अली खान दुनिया के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते थे, लेकिन उन्होंने जैकब डायमंड को किसी मुकुट या आभूषण में नहीं लगवाया।
कहा जाता है कि उन्होंने इसे अपनी मेज पर पेपरवेट की तरह इस्तेमाल किया।
एक ऐसा हीरा जिसकी कीमत करोड़ों-अरबों में आंकी जाती थी, वह कागज दबाने के काम आ रहा था। यही बात इसे दुनिया के दूसरे प्रसिद्ध हीरों से अलग बनाती है।
जहां कोहिनूर और दूसरे हीरे युद्धों, राजाओं और सत्ता संघर्षों की कहानियां बताते हैं, वहीं जैकब डायमंड इंसानी व्यवहार और अजीब फैसलों की कहानी कहता है।
निजाम के खजाने से भारत सरकार तक का सफर
भारत की आजादी और हैदराबाद के भारत में विलय के बाद निजाम के विशाल आभूषण संग्रह को लेकर विवाद शुरू हुए।
निजाम परिवार के ट्रस्ट इन रत्नों को बेचने पर विचार कर रहे थे, लेकिन भारत सरकार ने इन्हें देश की ऐतिहासिक विरासत बताते हुए बिक्री का विरोध किया।
लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चलने के बाद 1995 में भारत सरकार ने निजाम के आभूषण संग्रह को खरीद लिया। इसी संग्रह में जैकब डायमंड भी शामिल था।
RBI की तिजोरी में सुरक्षित है जैकब डायमंड
आज जैकब डायमंड मुंबई स्थित भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सुरक्षित तिजोरी में रखा हुआ है।
कोहिनूर की तरह यह अंतरराष्ट्रीय विवादों में नहीं रहता और आम लोगों की पहुंच से दूर है। हालांकि, समय-समय पर निजाम के आभूषणों की प्रदर्शनियों में इसे प्रदर्शित किया गया है।
हर बार इसकी कहानी लोगों को आकर्षित करती है—एक ऐसा हीरा जो कभी शाही खजाने में था, फिर जूते में छिपा मिला और बाद में पेपरवेट बन गया।
क्यों खास है जैकब डायमंड की कहानी?
जैकब डायमंड की असली कीमत केवल उसके कैरेट या चमक में नहीं है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी अविश्वसनीय यात्रा है।
- एक जूलर ने इसे बेचने के लिए बड़ा दांव लगाया।
- एक निजाम इसके कारण कानूनी विवाद में फंस गया।
- इसे अशुभ मानकर छिपा दिया गया।
- यह जूते में मिला।
- इसे दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक ने पेपरवेट की तरह इस्तेमाल किया।
- आखिरकार यह भारत की सबसे सुरक्षित तिजोरियों में पहुंच गया।
यही वजह है कि जैकब डायमंड भारत के सबसे रहस्यमय और दिलचस्प रत्नों में गिना जाता है। यह केवल एक हीरा नहीं, बल्कि एक सदी से ज्यादा पुराने इतिहास, राजनीति और इंसानी फैसलों की कहानी है।


