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Trump Tariffs की धमकी भी बेअसर! रूस से रिकॉर्ड Crude Oil खरीद भारत ने रचा इतिहास, अब हमसे ही खरीद रही दुनिया

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/11 at 10:41 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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14 Min Read
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India Russian Oil Record Import: अमेरिका की चेतावनियों और रूस पर बढ़ते पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। जुलाई 2026 में रूस से भारत का क्रूड ऑयल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। खास बात यह है कि रूसी कच्चे तेल को भारत में रिफाइन करने के बाद तैयार होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद पश्चिमी देश भी कर रहे हैं।

Contents
अमेरिकी टैरिफ की धमकी का नहीं दिखा असरजुलाई में रूस से कितना तेल खरीदा भारत?रूस भारत का इतना बड़ा Oil Supplier कैसे बना?छोटे बंदरगाहों ने बढ़ाया रूसी तेल का प्रवाहRussia Oil Price Cap भी बना बेअसरभारत बना Global Refining Hubपश्चिमी देश भी खरीद रहे भारतीय Refined OilEU के प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों से पहुंचा तेलभारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रूसी तेल?अमेरिका की चुनौती अभी खत्म नहीं हुईभारत ने क्या संदेश दिया?निष्कर्ष

भारत की यह रणनीति ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क और प्रतिबंधों की चेतावनी दी जा रही है। इसके बावजूद भारतीय रिफाइनरियों ने सस्ता रूसी क्रूड खरीदकर उसे पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने का सिलसिला जारी रखा है।

अमेरिकी टैरिफ की धमकी का नहीं दिखा असर

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने मॉस्को की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए कई प्रतिबंध लगाए। इनमें रूसी तेल की कीमत सीमित करने की कोशिश भी शामिल रही। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का उद्देश्य था कि रूस को ऊर्जा निर्यात से मिलने वाली कमाई घटाई जाए।

हालांकि, भारत ने इस दौरान अपने लिए अलग रणनीति अपनाई। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी क्रूड को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर खरीदा और उसे घरेलू जरूरतों के साथ-साथ वैश्विक बाजार के लिए रिफाइंड किया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी के बावजूद जुलाई में भारत की खरीदारी में तेजी देखने को मिली।

यानी, दबाव बढ़ने के बजाय भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

जुलाई में रूस से कितना तेल खरीदा भारत?

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर यानी CREA के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में भारत ने रूस से करीब 5.5 अरब यूरो का कच्चा तेल खरीदा।

जून में यह आंकड़ा करीब 4.5 अरब यूरो था। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में भारत ने रूस से कुल करीब 6.4 अरब यूरो का जीवाश्म ईंधन खरीदा। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का रहा।

आंकड़ों को मोटे तौर पर इस तरह समझा जा सकता है:

खरीदजुलाई 2026
रूसी क्रूड ऑयलकरीब €5.5 अरब
कुल रूसी फॉसिल फ्यूलकरीब €6.4 अरब
कोयलाकरीब €512 मिलियन
तेल उत्पादकरीब €341 मिलियन

इससे साफ है कि भारत के रूस से ऊर्जा कारोबार में कच्चे तेल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है।

रूस भारत का इतना बड़ा Oil Supplier कैसे बना?

रूस से भारत की क्रूड खरीदारी में सबसे बड़ा बदलाव 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद आया। पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंध और कीमतों पर दबाव के बीच रूसी कंपनियों ने एशियाई बाजारों में भारी डिस्काउंट के साथ तेल बेचना शुरू किया।

भारत ने इस अवसर का इस्तेमाल अपनी रिफाइनिंग क्षमता और ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से किया।

2021 में रूस से भारत को मिलने वाला तेल कुल भारतीय क्रूड आयात का केवल एक छोटा हिस्सा था। युद्ध के बाद तस्वीर तेजी से बदली।

  • 2021: रूस की हिस्सेदारी करीब 2.5% थी।
  • 2022: रूसी तेल की आपूर्ति तेजी से बढ़ी और करीब 7.4 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंची।
  • 2023: रूस करीब 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति के साथ भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बन गया।
  • जुलाई 2026: रूसी तेल की आवक करीब 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का दावा किया गया है।

यदि जुलाई की यह मात्रा करीब 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के कुल भारतीय क्रूड आयात के मुकाबले देखी जाए, तो रूस की हिस्सेदारी लगभग 55% बैठती है।

यानी भारत के लिए रूसी तेल अब सिर्फ एक वैकल्पिक स्रोत नहीं, बल्कि ऊर्जा आयात की रणनीति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

छोटे बंदरगाहों ने बढ़ाया रूसी तेल का प्रवाह

जुलाई की रिकॉर्ड खरीदारी में केवल देश के सबसे बड़े रिफाइनिंग केंद्रों का योगदान नहीं रहा। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ छोटे या क्षेत्रीय टर्मिनलों के जरिए भी रूसी तेल की आवक में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

मुंद्रा टर्मिनल से जुड़े आयात में करीब 58% की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं वाडिनार में लगभग 35% और मुंबई में करीब 37% की बढ़ोतरी बताई गई।

दूसरी ओर, जामनगर में मात्रा अपेक्षाकृत स्थिर रही, जबकि पारादीप में करीब 22% की गिरावट दर्ज हुई।

इससे संकेत मिलता है कि भारतीय रिफाइनिंग नेटवर्क रूसी क्रूड की बढ़ती आपूर्ति को संभालने के लिए कई बंदरगाहों और टर्मिनलों का इस्तेमाल कर रहा है।

Russia Oil Price Cap भी बना बेअसर

रूस की तेल बिक्री पर पश्चिमी देशों ने प्राइस कैप की व्यवस्था लागू की थी। इसका उद्देश्य रूसी तेल को वैश्विक बाजार में पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि उसकी बिक्री कीमत पर सीमा लगाकर रूस की कमाई कम करना था।

लेकिन भारतीय और अन्य एशियाई खरीदारों की बढ़ती मांग ने इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं।

जुलाई में रूसी Urals क्रूड की औसत कीमत करीब 60.22 डॉलर प्रति बैरल बताई गई। यह कीमत पश्चिमी देशों द्वारा तय की गई सीमा से काफी ऊपर थी।

भारत के लिए अहम बात यह है कि रूसी क्रूड की कीमत भले ही पश्चिमी मानकों से ऊपर हो, लेकिन कई मौकों पर यह अन्य उपलब्ध सप्लाई विकल्पों की तुलना में भारतीय रिफाइनरों के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक रही है।

भारत बना Global Refining Hub

भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल क्रूड खरीदना नहीं, बल्कि उसकी विशाल रिफाइनिंग क्षमता है।

भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में शामिल है। देश में आने वाला कच्चा तेल पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है।

यहीं से इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत, तुर्की, ब्रुनेई और जॉर्जिया ने जुलाई में रूसी क्रूड को रिफाइन करके प्रतिबंध लगाने वाले देशों को करीब 633 मिलियन यूरो के पेट्रोलियम उत्पाद बेचे।

इनमें करीब 284 मिलियन यूरो के उत्पाद सीधे रूसी क्रूड से बने बताए गए।

इसका मतलब यह है कि रूसी कच्चा तेल पहले भारत जैसे देशों में पहुंचता है, वहां रिफाइन होकर तैयार पेट्रोलियम उत्पाद बनता है और फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकता है।

पश्चिमी देश भी खरीद रहे भारतीय Refined Oil

यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अगर रूस पर प्रतिबंध हैं, तो फिर रूसी क्रूड से बने पेट्रोलियम उत्पादों की मांग कहां से आ रही है?

रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई में ऐसे उत्पादों का बड़ा हिस्सा पश्चिमी बाजारों तक पहुंचा।

बताए गए आंकड़ों के मुताबिक:

  • EU को: करीब €214 मिलियन
  • ऑस्ट्रेलिया को: करीब €184 मिलियन
  • अमेरिका को: करीब €234 मिलियन

इन आंकड़ों से वैश्विक तेल कारोबार की जटिलता सामने आती है।

कच्चे तेल की उत्पत्ति रूस में होती है, लेकिन उसे दूसरे देश में रिफाइन करने के बाद तैयार उत्पाद की सप्लाई चेन अलग हो जाती है। इसी वजह से भारत की रिफाइनिंग क्षमता वैश्विक ऊर्जा बाजार में रणनीतिक महत्व हासिल कर रही है।

EU के प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों से पहुंचा तेल

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि यूरोपीय संघ द्वारा रूसी क्रूड से बने कुछ रिफाइंड उत्पादों पर प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों से कई कार्गो यूरोपीय बंदरगाहों तक पहुंचे।

बताया गया है कि जुलाई में भारतीय रिफाइनरियों से पांच कार्गो सीधे EU के बंदरगाहों पर पहुंचे।

इसी तरह अमेरिकी बाजार में भी भारतीय रिफाइंड उत्पादों की मांग बनी रही। रिपोर्ट में जामनगर रिफाइनरी से जुड़े ऐसे उत्पादों का उल्लेख है, जिनमें रूसी क्रूड का एक हिस्सा इस्तेमाल हुआ था।

हालांकि, किसी भी खास कार्गो के स्रोत, मिश्रण और कानूनी स्थिति को समझने के लिए संबंधित शिपमेंट और नियमों की अलग-अलग जांच जरूरी होती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रूसी तेल?

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में मामूली बदलाव भी देश के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर और महंगाई पर असर डाल सकता है।

रूस से मिलने वाली सप्लाई ने भारतीय रिफाइनरों को वैश्विक बाजार में कई विकल्प दिए हैं।

अगर भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी कीमत पर क्रूड मिलता है और उसे कुशलता से रिफाइन किया जाता है, तो इससे पेट्रोलियम उत्पादों की लागत और निर्यात क्षमता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

यही कारण है कि भारत रूस से तेल खरीद को सिर्फ एक विदेश नीति के मुद्दे के रूप में नहीं देखता। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रिफाइनिंग मार्जिन, आयात लागत और वैश्विक बाजार में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी जुड़ी हुई है।

अमेरिका की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत के सामने कोई जोखिम नहीं है।

अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ या अन्य आर्थिक कार्रवाई की धमकी भारतीय व्यापार के लिए चुनौती बन सकती है। खासकर तब, जब भारत और अमेरिका के बीच पहले से ही व्यापार और टैरिफ को लेकर बातचीत चल रही हो।

यदि रूस से तेल खरीद पर अतिरिक्त लागत आती है, तो भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी क्रूड का आर्थिक फायदा कम हो सकता है।

इसके अलावा यूरोपीय देशों और अमेरिका की ओर से रूसी तेल की सप्लाई चेन को लेकर नियम और सख्त होने की स्थिति में भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को अपनी खरीद, शिपिंग, इंश्योरेंस और भुगतान व्यवस्था में और अधिक सावधानी बरतनी पड़ सकती है।

भारत ने क्या संदेश दिया?

रूस से रिकॉर्ड क्रूड खरीदारी के जरिए भारत ने एक स्पष्ट आर्थिक संदेश दिया है—ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

भारत पश्चिमी देशों के साथ भी व्यापारिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है और रूस से भी ऊर्जा संबंध जारी रखता है। यही संतुलन उसकी विदेश और आर्थिक नीति को अलग बनाता है।

आज की स्थिति में भारत केवल रूसी तेल का बड़ा खरीदार नहीं है। उसकी विशाल रिफाइनिंग क्षमता उसे वैश्विक तेल बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाती है।

रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत की रिफाइनरियों में पहुंचता है, वहां उससे तैयार पेट्रोलियम उत्पाद बनते हैं और फिर यही उत्पाद दुनिया के अलग-अलग बाजारों में पहुंच सकते हैं।

यही वजह है कि रूस-भारत तेल व्यापार अब सिर्फ दो देशों के बीच का कारोबार नहीं रह गया है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजार, पश्चिमी प्रतिबंधों और भारत की बढ़ती रिफाइनिंग ताकत के बीच बदलते समीकरण की कहानी बन चुका है।

निष्कर्ष

जुलाई 2026 में रूसी क्रूड की रिकॉर्ड खरीदारी ने एक बार फिर दिखाया है कि वैश्विक तेल बाजार में प्रतिबंधों और टैरिफ के बावजूद सप्लाई चेन को पूरी तरह अलग करना कितना मुश्किल है।

भारत के लिए रूसी तेल सस्ता या महंगा होने से आगे बढ़कर ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक सप्लाई का विषय बन चुका है। वहीं भारतीय रिफाइनरियां कच्चे तेल को वैल्यू-एडेड पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर वैश्विक बाजार में अपनी भूमिका मजबूत कर रही हैं।

अमेरिकी दबाव आगे कितना बढ़ता है और भारत-रूस का तेल कारोबार किस दिशा में जाता है, यह आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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