Brain Chip Technology: ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस यानी BCI की दुनिया में चीन ने बड़ी उपलब्धि हासिल करने का दावा किया है। नानकाई यूनिवर्सिटी की अगुवाई वाली एक चीनी टीम ने ऐसी इंटरवेंशनल तकनीक का मानव पर परीक्षण किया है, जिसमें ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को गर्दन की रक्त वाहिका के रास्ते दिमाग तक पहुंचाया गया। यह तरीका एलन मस्क की Neuralink से अलग है, जिसमें इलेक्ट्रोड को सीधे मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया जाता है।
Highlights
- चीन ने रक्त वाहिकाओं के रास्ते दिमाग तक BCI पहुंचाने का मानव परीक्षण किया।
- 67 वर्षीय लकवाग्रस्त मरीज में इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
- मरीज ने हाथ से पकड़ने और दवा उठाने जैसी गतिविधियां करने में सुधार दिखाया।
- चीन की StairMed भी Neuralink को चुनौती देने वाली इनवेसिव BCI तकनीक पर काम कर रही है।
- ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस का लक्ष्य लकवाग्रस्त लोगों को सोच के जरिए डिजिटल डिवाइस नियंत्रित करने में सक्षम बनाना है।
नई दिल्ली। Brain Chip Technology को लेकर दुनिया में तेजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। एलन मस्क की कंपनी Neuralink ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को आम लोगों की चर्चा का विषय बना दिया है, लेकिन अब चीन इस क्षेत्र में अपनी अलग तकनीकी राह तैयार कर रहा है।
चीन में वैज्ञानिक ऐसी BCI तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिसमें पारंपरिक तरीके से खोपड़ी खोलकर मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड लगाने के बजाय रक्त वाहिकाओं के जरिए न्यूरल डिवाइस को दिमाग तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। जून 2025 में नानकाई यूनिवर्सिटी की अगुवाई वाली चीनी टीम ने एक 67 वर्षीय लकवाग्रस्त मरीज पर इंटरवेंशनल BCI का मानव परीक्षण पूरा करने की घोषणा की थी।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BCI तकनीक का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मशीन दिमाग के संकेत पढ़ सकती है या नहीं, बल्कि यह भी है कि इसे मरीज के शरीर में कितनी सुरक्षित और कम जोखिम वाली प्रक्रिया से लगाया जा सकता है।
खोपड़ी खोलने की बजाय नस के रास्ते दिमाग तक पहुंचेगी तकनीक

पारंपरिक इनवेसिव BCI में इलेक्ट्रोड को मस्तिष्क के ऊतकों के काफी करीब या सीधे उनमें लगाया जाता है। Neuralink का सिस्टम भी इसी तरह का इनवेसिव मॉडल अपनाता है। इसमें इलेक्ट्रोड को मस्तिष्क तक पहुंचाने के लिए सर्जिकल प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
इसके मुकाबले चीन की इंटरवेंशनल तकनीक में डॉक्टर गर्दन की रक्त वाहिका के जरिए कैथेटर को दिमाग की रक्त वाहिकाओं तक ले जाते हैं। इसके बाद स्टेंट जैसे इलेक्ट्रोड को निर्धारित स्थान पर तैनात किया जाता है। चीनी टीम के मुताबिक, इस तकनीक से मस्तिष्क के ऊतक को सीधे काटने की जरूरत कम हो सकती है।
यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है। इसे पूरी तरह “बिना सर्जरी” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। इसमें भी मेडिकल प्रक्रिया और विशेषज्ञ डॉक्टरों की आवश्यकता होती है। फर्क यह है कि यह पारंपरिक ओपन-ब्रेन सर्जरी के मुकाबले कम इनवेसिव यानी इंटरवेंशनल तरीका है।
यानी सोशल मीडिया या सुर्खियों में इसे भले ही “बिना सर्जरी ब्रेन चिप” कहा जाए, लेकिन वास्तव में मरीज को चिकित्सा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
67 वर्षीय लकवाग्रस्त मरीज पर हुआ मानव परीक्षण
नानकाई यूनिवर्सिटी के नेतृत्व वाली टीम ने जून 2025 में बताया था कि इस तकनीक का इस्तेमाल 67 वर्षीय ऐसे व्यक्ति पर किया गया, जिसे ब्रेन स्ट्रोक के बाद शरीर के बाईं तरफ लकवा हो गया था।
टीम के मुताबिक मरीज लगभग छह महीने से इस समस्या से जूझ रहा था। इंटरवेंशनल BCI लगाने के बाद उसके बाएं हाथ में कुछ गतिविधियां वापस देखने को मिलीं। मरीज हाथ से चीज पकड़ने और दवा उठाने जैसी गतिविधियां करने में सक्षम हुआ।
इस सिस्टम में दिमाग से निकलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल को रिकॉर्ड करने के लिए स्टेंट इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ एक वायरलेस ट्रांसमिशन और पावर सिस्टम भी लगाया गया, जो न्यूरल सिग्नल को इकट्ठा कर आगे भेजने में मदद करता है।
वैज्ञानिकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल केवल कंप्यूटर चलाने तक सीमित नहीं रह सकता। इसका उद्देश्य लकवा, स्ट्रोक और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से प्रभावित मरीजों की मोटर क्षमताओं और संचार क्षमता को बेहतर बनाना भी हो सकता है।
क्या मरीज सिर्फ सोचकर कंप्यूटर चला पाएगा?
BCI तकनीक का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है।
हमारा दिमाग जब किसी काम के बारे में सोचता है तो न्यूरॉन्स में इलेक्ट्रिकल गतिविधि होती है। BCI सिस्टम इन संकेतों को रिकॉर्ड करके उन्हें कंप्यूटर के लिए कमांड में बदलने की कोशिश करता है।
उदाहरण के लिए अगर कोई मरीज हाथ हिलाने के बारे में सोचता है, तो सिस्टम उसके दिमाग में पैदा होने वाले विशिष्ट न्यूरल पैटर्न को पहचान सकता है। इसके बाद सॉफ्टवेयर उस सिग्नल को डिजिटल कमांड में बदल सकता है।
इसी तकनीक की मदद से भविष्य में लकवाग्रस्त व्यक्ति कंप्यूटर का कर्सर, स्मार्टफोन, व्हीलचेयर या रोबोटिक आर्म नियंत्रित कर सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा चीनी तकनीक हर व्यक्ति को किसी भी डिजिटल डिवाइस को तुरंत सिर्फ सोचकर चलाने में सक्षम बना देती है। अभी यह तकनीक शुरुआती क्लिनिकल और रिसर्च चरण में है और बड़े स्तर पर इसके सुरक्षित और प्रभावी होने की पुष्टि के लिए ज्यादा परीक्षणों की जरूरत है।
चीन की StairMed भी Neuralink को दे रही चुनौती
चीन में BCI की दौड़ सिर्फ नानकाई यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं है। शंघाई की StairMed Technology भी इम्प्लांटेबल ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस पर तेजी से काम कर रही है।
StairMed की अपनी तकनीक हालांकि रक्त वाहिका के रास्ते वाली तकनीक से अलग है। कंपनी मिनिमली इनवेसिव इम्प्लांटेबल BCI, अल्ट्रा-फ्लेक्सिबल न्यूरल इलेक्ट्रोड और वायरलेस सिस्टम विकसित कर रही है। कंपनी के मुताबिक उसका लक्ष्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज और मोटर फंक्शन की बहाली के लिए इम्प्लांटेबल BCI विकसित करना है।
2025 में StairMed के एक मरीज ने ब्रेन सिग्नल की मदद से कंप्यूटर गेम खेलने की क्षमता दिखाई थी। कंपनी के मुताबिक मरीज ने अपने विचारों के जरिए कंप्यूटर को नियंत्रित किया। रिपोर्टों में बताया गया कि मरीज ने शतरंज और रेसिंग गेम जैसे कार्य किए।
इस तकनीक में बेहद पतले और लचीले इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल किया गया है। चीनी अधिकारियों और कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इन इलेक्ट्रोड का आकार मानव बाल की मोटाई का लगभग एक प्रतिशत बताया गया है।
StairMed ने जुटाई बड़ी फंडिंग
BCI को लेकर चीन में सिर्फ वैज्ञानिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि निवेश के स्तर पर भी काफी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं।
फरवरी 2025 में StairMed ने 350 मिलियन युआन यानी लगभग 48 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाने की घोषणा की थी। इस राउंड में Qiming Venture Partners, OrbiMed और Lilly Asia Ventures जैसे निवेशकों ने हिस्सा लिया। कंपनी ने बताया था कि इस पूंजी का इस्तेमाल क्लिनिकल ट्रायल, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में किया जाएगा।
इससे संकेत मिलता है कि चीन BCI को सिर्फ प्रयोगशाला की तकनीक के तौर पर नहीं देख रहा, बल्कि इसे भविष्य की मेडिकल और न्यूरोटेक इंडस्ट्री का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रहा है।
Neuralink की तकनीक से कितना अलग है चीन का मॉडल?
Neuralink और चीन की BCI कंपनियों की मंजिल काफी हद तक समान है—दिमाग के सिग्नल को पढ़कर मशीनों को नियंत्रित करना—लेकिन वहां तक पहुंचने के तरीके अलग हैं।
Neuralink का N1 सिस्टम मस्तिष्क में बेहद पतले इलेक्ट्रोड थ्रेड डालकर न्यूरल गतिविधि रिकॉर्ड करता है। कंपनी की तकनीक में सर्जिकल रोबोट की मदद से इलेक्ट्रोड को मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया जाता है।
दूसरी ओर चीन की नानकाई टीम इंटरवेंशनल, एंडोवस्कुलर रास्ते पर काम कर रही है। इसमें स्टेंट जैसे इलेक्ट्रोड को रक्त वाहिका के माध्यम से मस्तिष्क के करीब पहुंचाया जाता है। इससे भविष्य में सर्जिकल ट्रॉमा और रिकवरी टाइम कम करने की संभावना पैदा होती है।
वहीं StairMed एक अन्य दिशा में अल्ट्रा-फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रोड और मिनिमली इनवेसिव इम्प्लांट विकसित कर रही है। इसलिए चीन की चुनौती किसी एक कंपनी से नहीं, बल्कि BCI के कई अलग-अलग तकनीकी मॉडल से सामने आ रही है।
क्या यह तकनीक 10 मिनट में लग जाएगी?
सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में चीन की इस तकनीक को “10 मिनट में ब्रेन चिप” जैसे दावों के साथ पेश किया जा रहा है। लेकिन इस दावे को सावधानी से समझना चाहिए।
मौजूदा सार्वजनिक जानकारी में नानकाई यूनिवर्सिटी के मानव परीक्षण की पुष्टि तो होती है, जिसमें गर्दन की रक्त वाहिका के रास्ते स्टेंट इलेक्ट्रोड दिमाग तक पहुंचाया गया था, लेकिन सभी मरीजों में पूरी प्रक्रिया सिर्फ 10 मिनट में पूरी होने की बात को स्वतंत्र रूप से स्थापित करने वाला पर्याप्त विश्वसनीय क्लिनिकल डेटा उपलब्ध नहीं है।
इसलिए इसे अभी “10 मिनट में कोई भी व्यक्ति बिना सर्जरी ब्रेन चिप लगवा सकता है” कहना जल्दबाजी होगी।
असल उपलब्धि यह है कि चीन ने मानव में इंटरवेंशनल BCI का महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया है और ऐसी तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सबसे बड़ा फायदा किन मरीजों को हो सकता है?
BCI तकनीक का सबसे बड़ा संभावित फायदा उन लोगों को हो सकता है जिनके शरीर और मस्तिष्क के बीच मोटर कमांड का सामान्य रास्ता किसी बीमारी या चोट के कारण बाधित हो गया है।
इसमें शामिल हो सकते हैं:
- स्ट्रोक के बाद लकवाग्रस्त मरीज
- स्पाइनल कॉर्ड इंजरी वाले मरीज
- गंभीर मोटर न्यूरॉन डिजीज से प्रभावित लोग
- ऐसे मरीज जो हाथ-पैर चलाने में असमर्थ हैं
- गंभीर संचार समस्याओं से जूझ रहे मरीज
StairMed के क्लिनिकल ट्रायल का उद्देश्य भी पैरालिसिस और मोटर रिहैबिलिटेशन से जुड़ी स्थितियों में इम्प्लांटेबल वायरलेस BCI की सुरक्षा और प्रभावशीलता का अध्ययन करना है।
अभी रास्ते में हैं कई बड़ी चुनौतियां
BCI जितनी रोमांचक तकनीक है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है। सबसे पहले सवाल आता है लंबे समय तक इम्प्लांट सुरक्षित रहने का। शरीर किसी भी बाहरी डिवाइस को विदेशी वस्तु की तरह पहचान सकता है और इसके आसपास टिश्यू प्रतिक्रिया या स्कारिंग हो सकती है।
दूसरी चुनौती है सिग्नल की स्थिरता। दिमाग से मिलने वाले न्यूरल सिग्नल को लगातार और सटीक तरीके से पढ़ना आसान नहीं है।
तीसरी चुनौती सुरक्षा और रेगुलेशन की है। ब्रेन चिप सीधे मानव तंत्रिका तंत्र से जुड़ी होती है, इसलिए इसके लिए सामान्य गैजेट की तुलना में कहीं ज्यादा कठोर मेडिकल परीक्षण जरूरी होंगे।
इसके अलावा डेटा प्राइवेसी भी भविष्य में बड़ा मुद्दा बन सकती है। अगर कोई डिवाइस दिमाग से जुड़े संकेत रिकॉर्ड करता है, तो यह सवाल उठेगा कि उस डेटा का मालिक कौन होगा और उसे किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा।
चीन बनाम Neuralink की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है
चीन की हालिया प्रगति को Neuralink की तत्काल हार के रूप में देखना सही नहीं होगा। अभी दोनों तकनीकों के क्लिनिकल डेटा, मरीजों की संख्या, लंबी अवधि की सुरक्षा और वास्तविक दुनिया में उपयोगिता की तुलना के लिए पर्याप्त समान आधार उपलब्ध नहीं है।
लेकिन इतना जरूर है कि BCI की वैश्विक दौड़ अब केवल Neuralink तक सीमित नहीं रह गई है।
चीन में नानकाई यूनिवर्सिटी जैसी रिसर्च टीम इंटरवेंशनल BCI पर काम कर रही है, जबकि StairMed जैसी कंपनियां इम्प्लांटेबल और मिनिमली इनवेसिव सिस्टम को आगे बढ़ा रही हैं। दूसरी तरफ अमेरिका और अन्य देशों में भी कई कंपनियां अलग-अलग BCI मॉडल विकसित कर रही हैं।
आने वाले वर्षों में असली मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन सी तकनीक सबसे सुरक्षित, टिकाऊ, सटीक, कम इनवेसिव और बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लायक साबित होती है।
अगर ये तकनीकें सफल होती हैं तो भविष्य में कंप्यूटर चलाने के लिए कीबोर्ड या माउस की जरूरत कम हो सकती है। गंभीर रूप से लकवाग्रस्त व्यक्ति अपने विचारों के जरिए डिजिटल दुनिया से संवाद कर सकता है और कुछ मामलों में रोबोटिक उपकरणों या दूसरे सहायक सिस्टम को नियंत्रित कर सकता है।
फिलहाल चीन की उपलब्धि को BCI की दौड़ में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे “10 मिनट में बिना सर्जरी लगने वाली तैयार ब्रेन चिप” कहना अभी तकनीकी और क्लिनिकल वास्तविकता से आगे का दावा होगा।


