PSU Disinvestment: केंद्र सरकार ने स्ट्रैटेजिक बिक्री के लिए चुनी गई पब्लिक सेक्टर कंपनियों की मौजूदा सूची में बड़े बदलाव से इनकार कर दिया है। कई मंत्रालयों की ओर से कंपनियों की सूची की दोबारा समीक्षा की मांग के बावजूद सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि विनिवेश की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा। सरकार का इस साल ₹80,000 करोड़ जुटाने का लक्ष्य है, जिसमें से ₹60,000 करोड़ से ज्यादा पहले ही जुटाए जा चुके हैं।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने पब्लिक सेक्टर कंपनियों यानी PSU के स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने स्ट्रैटेजिक बिक्री के लिए तय सरकारी कंपनियों की सूची में फिलहाल किसी बड़े बदलाव से इनकार किया है। भारी उद्योग, उर्वरक और आवास जैसे मंत्रालयों के अधिकारियों की ओर से समय-समय पर कुछ कंपनियों को इस सूची से बाहर करने या योजना की समीक्षा करने की मांग उठती रही है, लेकिन केंद्र की ओर से अब साफ संदेश दिया गया है कि संबंधित मंत्रालयों को मिलकर तय लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में काम करना होगा।
सरकार का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र अपने राजस्व को बढ़ाने के साथ-साथ विनिवेश कार्यक्रम को लेकर बाजार और निवेशकों को भी स्पष्ट संदेश देना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में PSU के निजीकरण और स्ट्रैटेजिक बिक्री की प्रक्रिया की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही है। ऐसे में सरकार अब इस प्रक्रिया को दोबारा व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।
PSU की लिस्ट की हुई समीक्षा
द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों के दौरान केंद्र सरकार ने उन पब्लिक सेक्टर कंपनियों की सूची की व्यापक समीक्षा की है जिन्हें भविष्य में निजीकरण, लिस्टिंग या बंद करने के लिए चिन्हित किया गया था। इस समीक्षा प्रक्रिया में प्रधानमंत्री कार्यालय की भी भूमिका रही है।
सरकार का उद्देश्य केवल कुछ कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटाना नहीं है। इसके पीछे व्यापक रणनीति भी बताई जा रही है, जिसमें गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की मौजूदगी कम करना, सरकारी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना शामिल है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों की अपनी प्राथमिकताएं हैं। यही वजह है कि कई सरकारी कंपनियों को स्ट्रैटेजिक बिक्री की सूची से बाहर करने या उनके मामले में दोबारा विचार करने की मांग सामने आती रही है।
कई मंत्रालयों ने की थी समीक्षा की मांग
सरकार के अलग-अलग विभागों के अधिकारियों ने पहले कई मौकों पर अंतर-मंत्रालयी बैठकों में स्ट्रैटेजिक बिक्री से जुड़ी कंपनियों की सूची की समीक्षा की मांग की थी। अधिकारियों का तर्क था कि कुछ कंपनियों की मौजूदा परिस्थितियां उस समय से अलग हैं जब उन्हें निजीकरण या स्ट्रैटेजिक बिक्री के लिए चुना गया था।
कुछ मामलों में कंपनियों के कारोबारी प्रदर्शन, रणनीतिक महत्व और संबंधित सेक्टर में उनकी भूमिका को देखते हुए भी पुनर्विचार की मांग की गई।
कई अधिकारियों ने नीति आयोग और अन्य संबंधित एजेंसियों के सामने भी सूची की समीक्षा का सुझाव दिया। हालांकि, अब उच्च स्तर से संकेत दिया गया है कि बार-बार समीक्षा के जरिए प्रक्रिया को रोकने या लंबा खींचने के बजाय मंत्रालयों को निर्धारित लक्ष्य हासिल करने के लिए आपसी तालमेल के साथ आगे बढ़ना होगा।
BPCL और Shipping Corporation जैसे मामलों में हुआ बदलाव
हाल के वर्षों में सरकार की स्ट्रैटेजिक बिक्री योजना में कई बड़े नाम शामिल रहे हैं। इनमें भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी BPCL और Shipping Corporation of India जैसे प्रमुख PSU भी रहे हैं।
हालांकि, मंत्रालयों के हस्तक्षेप और विभिन्न कारणों से कुछ कंपनियों को बिक्री की मौजूदा योजना से बाहर किया जा चुका है। इससे सरकार की विनिवेश रणनीति को लेकर भी सवाल उठे कि आखिर किन कंपनियों को वास्तव में निजीकरण के लिए आगे बढ़ाया जाएगा।
अब अधिकारियों के मुताबिक, मौजूदा सूची में आगे बड़े बदलाव की संभावना काफी कम है। इसका मतलब यह है कि सरकार उन कंपनियों के मामलों में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे सकती है जिन्हें पहले ही स्ट्रैटेजिक बिक्री के लिए चिन्हित किया जा चुका है।
पिछले कुछ वर्षों में धीमी हुई विनिवेश प्रक्रिया
केंद्र सरकार लंबे समय से सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाने और गैर-रणनीतिक क्षेत्रों से बाहर निकलने की नीति पर काम कर रही है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में विनिवेश कार्यक्रम की रफ्तार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
कई कंपनियों के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन अलग-अलग कारणों से वे आगे नहीं बढ़ सकीं। कुछ मामलों में खरीदारों की रुचि अपेक्षा के मुताबिक नहीं रही, जबकि कुछ मामलों में नियामकीय, प्रशासनिक या रणनीतिक मुद्दे सामने आए।
इसके अलावा, ऐसी भी स्थिति बनी जब अलग-अलग सरकारी विभागों के पास विनिवेश के लिए अलग-अलग प्राथमिकताएं थीं। इससे एक केंद्रीकृत और स्पष्ट सूची की जरूरत महसूस हुई।
अब सरकार का जोर इस प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने पर है।
अभी IDBI Bank पर सबसे ज्यादा फोकस
फिलहाल बड़े PSU निजीकरण के मामलों में IDBI Bank सबसे महत्वपूर्ण नामों में से एक है। केंद्र सरकार IDBI Bank में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है।
IDBI Bank का स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बड़ी रकम जुटाई जा सकती है। यदि यह सौदा तय योजना के मुताबिक पूरा होता है तो सरकार के मौजूदा विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने में काफी मदद मिल सकती है।
सरकार के लिए IDBI Bank की बिक्री केवल राजस्व जुटाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह उसके निजीकरण कार्यक्रम की गंभीरता का भी संकेत मानी जा सकती है।
₹80,000 करोड़ का विनिवेश लक्ष्य
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए ₹80,000 करोड़ का विनिवेश लक्ष्य रखा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सरकार पहले ही ₹60,000 करोड़ से ज्यादा जुटा चुकी है।
इससे लक्ष्य का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है। अब सरकार की नजर बाकी रकम जुटाने पर है।
अगर IDBI Bank का स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट सफल रहता है और इससे अपेक्षित रकम मिलती है, तो सरकार के लिए ₹80,000 करोड़ के लक्ष्य को हासिल करना आसान हो सकता है।
यही वजह है कि स्ट्रैटेजिक बिक्री की प्रक्रिया में अब किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश कम दिखाई जा रही है।
सरकार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है PSU Disinvestment?
PSU विनिवेश के पीछे सरकार की कई आर्थिक और रणनीतिक वजहें हैं। इसका सबसे सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर मिलने वाली रकम का इस्तेमाल सरकार अपने वित्तीय लक्ष्यों और विकास से जुड़े खर्चों के लिए कर सकती है।
इसके अलावा सरकार का मानना रहा है कि जिन क्षेत्रों में उसका रणनीतिक नियंत्रण जरूरी नहीं है, वहां निजी क्षेत्र को ज्यादा भूमिका दी जा सकती है।
निजीकरण के समर्थकों का तर्क है कि इससे कंपनियों के संचालन में कारोबारी दक्षता बढ़ सकती है और सरकार का प्रशासनिक बोझ कम हो सकता है। दूसरी ओर, PSU कर्मचारियों, यूनियनों और कुछ नीति विशेषज्ञों की ओर से यह चिंता भी जताई जाती रही है कि रणनीतिक क्षेत्रों में सरकारी कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए हर कंपनी के मामले में निजीकरण का फैसला आर्थिक और रणनीतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाता है।
प्राइवेटाइजेशन, लिस्टिंग और क्लोजर—तीनों पर अलग रणनीति
सरकार की PSU नीति सिर्फ निजीकरण तक सीमित नहीं है। सरकारी कंपनियों के लिए अलग-अलग विकल्पों पर विचार किया जाता है।
प्राइवेटाइजेशन: इसमें सरकार किसी कंपनी का नियंत्रण निजी निवेशक को सौंप सकती है।
लिस्टिंग: जिन सरकारी कंपनियों में पूरी तरह निजीकरण जरूरी नहीं है, उनमें हिस्सेदारी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करके भी पूंजी जुटाई जा सकती है।
क्लोजर: लगातार कमजोर प्रदर्शन करने वाली या गैर-व्यवहार्य सरकारी कंपनियों को बंद करने का विकल्प भी मौजूद है।
इसलिए सभी PSU के लिए एक जैसी रणनीति नहीं अपनाई जाती। कंपनी की वित्तीय स्थिति, सेक्टर में उसकी भूमिका और सरकार की रणनीतिक जरूरत के आधार पर फैसला लिया जाता है।
अब आगे क्या होगा?
सरकार के मौजूदा रुख से संकेत मिलता है कि स्ट्रैटेजिक बिक्री की सूची को बार-बार बदलने के बजाय अब चिन्हित कंपनियों पर कार्रवाई तेज करने की कोशिश की जाएगी।
मंत्रालयों को भी इस प्रक्रिया में सहयोग करने का संदेश दिया गया है। अगर सरकार IDBI Bank जैसे बड़े सौदों को सफलतापूर्वक पूरा करने में कामयाब रहती है तो इससे न केवल मौजूदा वित्त वर्ष का विनिवेश लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में अन्य PSU के निजीकरण के लिए भी सरकार को गति मिल सकती है।
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार फिलहाल PSU के स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही है। मंत्रालयों की ओर से समीक्षा की मांग के बावजूद उच्च स्तर से मिला संदेश स्पष्ट है—विनिवेश की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है और तय लक्ष्य हासिल करना है।


