Saudi-Turkey-Pakistan Mecca Alliance: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए नए संयुक्त रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक सुरक्षा समीकरणों पर बहस छेड़ दी है। समझौते में किसी एक देश पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला मानने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह NATO जैसा सैन्य गठबंधन है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
Saudi Arabia-Turkey-Pakistan Mecca Alliance: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ नया रक्षा समझौता अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। मक्का में हुए इस समझौते में तीनों देशों ने सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों पर हमला माना जाएगा।
यही प्रावधान इस समझौते की तुलना NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से किए जाने की सबसे बड़ी वजह है। हालांकि, इसे सीधे NATO का विकल्प मानना अभी सही नहीं होगा। NATO एक दशकों पुराना, संस्थागत और व्यापक सैन्य गठबंधन है, जबकि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये का समझौता फिलहाल तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग पर केंद्रित है।
मक्का में हुआ महत्वपूर्ण रक्षा समझौता
संयुक्त बयान के अनुसार, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने मक्का के अल-सफा पैलेस में हुई बैठक के दौरान ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए।
इस समझौते का घोषित उद्देश्य तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना, रक्षा सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय बढ़ाना और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देना है।
समझौते के मुताबिक, अगर तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होता है तो उसे सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा। इसका मतलब यह है कि सुरक्षा संकट की स्थिति में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच सैन्य एवं रणनीतिक सहयोग का दायरा बढ़ सकता है।
हालांकि, किसी हमले की स्थिति में वास्तव में किस तरह की सैन्य प्रतिक्रिया दी जाएगी, उसकी परिस्थितियां और निर्णय प्रक्रिया इस समझौते की व्यावहारिक अहमियत तय करेंगी।
क्या यह सच में ‘इस्लामिक NATO’ है?
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस समझौते को ‘Islamic NATO’ की संज्ञा दी है। लेकिन रणनीतिक दृष्टि से दोनों संगठनों के बीच काफी अंतर है।
NATO का सामूहिक रक्षा सिद्धांत Article 5 पर आधारित है। इसके तहत एक सदस्य पर सशस्त्र हमला गठबंधन के सभी सदस्यों के खिलाफ हमला माना जाता है। लेकिन NATO के पास दशकों से विकसित सैन्य कमांड स्ट्रक्चर, संयुक्त संस्थान, व्यापक सदस्यता और स्थायी सैन्य सहयोग की व्यवस्था है।
इसके मुकाबले मक्का समझौता तीन देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग का ढांचा है। इसलिए इसे फिलहाल NATO के समान पूर्ण सैन्य संगठन की बजाय एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय रक्षा साझेदारी के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये की ताकत अलग-अलग है
इस समझौते की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि तीनों देशों की रणनीतिक क्षमताएं अलग-अलग हैं।
पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला देश है और उसके पास एक बड़ी सैन्य शक्ति है। सऊदी अरब पश्चिम एशिया की प्रमुख आर्थिक और ऊर्जा शक्तियों में शामिल है तथा इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहरों की वजह से उसका धार्मिक महत्व भी बेहद बड़ा है।
दूसरी ओर, तुर्किये NATO का सदस्य है और उसके पास क्षेत्र की महत्वपूर्ण सैन्य क्षमताओं में से एक है। तुर्किये की भौगोलिक स्थिति भी उसे यूरोप, पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।
इन तीनों की क्षमताओं का संयोजन इस समझौते को केवल एक सामान्य द्विपक्षीय रक्षा समझौते से अलग बनाता है।
तुर्किये और इजरायल के बीच तनाव भी अहम
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति पहले से ही संवेदनशील है। तुर्किये और इजरायल के संबंधों में भी हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है।
वहीं, खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर अमेरिका की भूमिका पर भी रणनीतिक बहस चलती रही है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए दूसरे देशों के साथ भी रक्षा साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे माहौल में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये का एक साथ आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पाकिस्तान और सऊदी अरब पहले भी कर चुके हैं रक्षा समझौता
मक्का समझौता पूरी तरह से अचानक हुआ घटनाक्रम नहीं है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पहले से ही मजबूत रक्षा संबंध रहे हैं।
दोनों देशों के बीच पिछले वर्ष सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए थे। पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग में शामिल रहा है।
नए त्रिपक्षीय समझौते से यह सहयोग अब तुर्किये तक भी विस्तारित होता दिखाई देता है।
पाकिस्तान ने भारत और इजरायल का मुद्दा क्यों उठाया?
समझौते के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयानों ने भारत के लिए इस घटनाक्रम की संवेदनशीलता बढ़ा दी है।
उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवाद से प्रभावित देश के तौर पर पेश करते हुए ‘Islamic NATO’ से उन चुनौतियों से निपटने की बात कही, जिन्हें उन्होंने भारत और इजरायल से जोड़कर देखा।
यही वजह है कि भारत में इस समझौते को केवल पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था के नजरिए से नहीं देखा जा रहा है। पाकिस्तान और भारत के बीच पहले से मौजूद सुरक्षा तनाव को देखते हुए इस तरह के बयान नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
हालांकि, किसी आधिकारिक दस्तावेज के आधार पर यह कहना कि यह समझौता भारत के खिलाफ बनाया गया है, फिलहाल उचित नहीं होगा। समझौते का घोषित उद्देश्य तीनों हस्ताक्षरकर्ता देशों की सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना है।
अगर पाकिस्तान पर हमला हुआ तो क्या सऊदी और तुर्किये युद्ध करेंगे?
यही इस समझौते से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल है।
समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला मानने की बात कही गई है। लेकिन इसका मतलब यह जरूरी नहीं है कि हर परिस्थिति में दोनों सहयोगी देश स्वतः और तुरंत पूर्ण पैमाने पर युद्ध में उतर जाएंगे।
किसी भी सामूहिक रक्षा समझौते में वास्तविक प्रतिक्रिया हमले की प्रकृति, परिस्थितियों, राजनीतिक निर्णय और सैन्य समन्वय पर निर्भर करती है।
इसलिए यह कहना कि ‘पाकिस्तान पर हमला होते ही सऊदी अरब और तुर्किये भारत के खिलाफ युद्ध शुरू कर देंगे’, इस समय एक अतिरंजित निष्कर्ष होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?
भारत के लिए इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब और तुर्किये के बढ़ते रणनीतिक संबंध हैं।
सऊदी अरब भारत का एक महत्वपूर्ण आर्थिक और ऊर्जा साझेदार है। भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, प्रवासी भारतीय समुदाय और रणनीतिक सहयोग के व्यापक संबंध हैं।
दूसरी तरफ, भारत और तुर्किये के संबंधों में पाकिस्तान के मुद्दे को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। तुर्किये ने अतीत में कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान के पक्ष में टिप्पणियां की हैं, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया।
ऐसे में पाकिस्तान के साथ तुर्किये और सऊदी अरब का एक संयुक्त रक्षा ढांचा भारत की रणनीतिक निगरानी के लिए महत्वपूर्ण जरूर है।
क्या भारत के खिलाफ बनेगा कोई सैन्य मोर्चा?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
समझौते के घोषित प्रावधानों में सामूहिक रक्षा, सुरक्षा सहयोग और तीनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय की बात है। भारत को लक्ष्य बनाने की कोई स्पष्ट घोषणा इस समझौते का घोषित हिस्सा नहीं है।
हालांकि, पाकिस्तान के नेताओं की ओर से भारत का नाम लेकर सुरक्षा चुनौतियों की चर्चा किए जाने से यह विषय नई दिल्ली के लिए अधिक संवेदनशील जरूर हो गया है।
भारत की रणनीति संभवतः इस बात पर केंद्रित रहेगी कि यह समझौता आगे किस दिशा में बढ़ता है। अगर इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, साझा कमांड, खुफिया सहयोग, हथियार प्रणालियों का एकीकरण या स्थायी सैन्य तंत्र जैसी व्यवस्थाएं जुड़ती हैं, तो इसकी रणनीतिक अहमियत काफी बढ़ सकती है।
अमेरिका के लिए भी क्यों महत्वपूर्ण है यह गठजोड़?
इस समझौते का असर केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में अमेरिका की लंबे समय से महत्वपूर्ण सुरक्षा भूमिका रही है।
सऊदी अरब अमेरिका का प्रमुख साझेदार रहा है, जबकि तुर्किये NATO का सदस्य है। ऐसे में सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ तुर्किये का नया रक्षा सहयोग पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना में एक नया आयाम जोड़ सकता है।
हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगा कि सऊदी अरब या तुर्किये अमेरिका से दूरी बनाकर किसी नए सैन्य ब्लॉक में पूरी तरह शामिल हो गए हैं। दोनों देशों के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने महत्वपूर्ण रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध हैं।
चीन और ईरान के लिए भी क्या मायने?
इस नए गठजोड़ को चीन और ईरान के नजरिए से भी देखा जा सकता है।
पाकिस्तान चीन का बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। वहीं, सऊदी अरब और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में संबंध सुधारने की कोशिशें हुई हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया में कोई नया सुरक्षा ढांचा बनता है तो उसका असर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर, तुर्किये की अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय रणनीति है। वह NATO का सदस्य होने के बावजूद पश्चिम एशिया में कई मुद्दों पर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता रहा है।
इसलिए मक्का समझौते को केवल धार्मिक एकजुटता के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सुरक्षा, ऊर्जा, क्षेत्रीय राजनीति और रणनीतिक हित भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ा संदेश क्या है?
भारत के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रही है।
भारत के सऊदी अरब के साथ मजबूत आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं। तुर्किये के साथ राजनीतिक मतभेद हैं, जबकि पाकिस्तान के साथ सुरक्षा संबंधी तनाव लंबे समय से बना हुआ है।
ऐसे में नई दिल्ली के लिए चुनौती यह होगी कि वह सऊदी अरब के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखते हुए पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बदलते सुरक्षा समीकरण पर भी नजर रखे।
भारत की बड़ी ताकत यह है कि उसके खाड़ी देशों के साथ व्यापक आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक संबंध हैं। इसलिए किसी नए क्षेत्रीय सैन्य समीकरण को केवल पाकिस्तान के नजरिए से देखना भारत की पूरी रणनीतिक स्थिति को नहीं दर्शाएगा।
निष्कर्ष: ‘इस्लामिक NATO’ कहना अभी जल्दबाजी
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये का मक्का संयुक्त रक्षा समझौता निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम है। किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माने जाने वाला प्रावधान इसे सामान्य रक्षा समझौते से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है।
लेकिन इसे अभी NATO का सीधा विकल्प या भारत के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी।
भारत के लिए असली महत्व इस बात का होगा कि आने वाले समय में यह समझौता किस तरह विकसित होता है। यदि तीनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास, साझा सुरक्षा तंत्र, खुफिया सहयोग और स्थायी सैन्य समन्वय बढ़ाते हैं, तो इसका प्रभाव पश्चिम एशिया के साथ-साथ दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरण पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल नई दिल्ली के लिए सबसे अहम बात यही है कि वह इस गठजोड़ को लेकर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के बजाय इसके वास्तविक सैन्य और राजनीतिक स्वरूप पर नजर रखे।


