Strait of Hormuz Deal: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच बड़ी सहमति बनने की खबर सामने आई है। ईरान ने शुक्रवार को कहा कि दोनों देशों ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के भविष्य के प्रबंधन को लेकर आम सहमति बना ली है। माना जा रहा है कि यह बातचीत अब औपचारिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस खबर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर भी दबाव देखने को मिला।
ईरान और ओमान के बीच क्या सहमति बनी?
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, ईरानी सांसद और संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रवक्ता हसन घशघवी ने बताया कि ओमान के साथ प्रस्तावित व्यवस्था का सामान्य ढांचा तय हो चुका है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते का अंतिम मसौदा और इससे जुड़े विस्तृत प्रावधान अभी घोषित किए जाने बाकी हैं।
घशघवी ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और समझौते की मुख्य बातें तय हो चुकी हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय उच्च स्तर पर लिया जाना है। इसका मतलब है कि अभी इसे पूरी तरह अंतिम समझौता नहीं माना जा सकता।
ईरान और ओमान दोनों की भौगोलिक स्थिति होर्मुज जलडमरूमध्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार के लिए इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है।
जहाजों के रास्ते पर भी बनी सहमति
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने इससे पहले कहा था कि तेहरान और मस्कट होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए प्रस्तावित भौगोलिक रास्ते को लेकर सहमत हो चुके हैं।
बक़ाई के मुताबिक, दोनों पक्षों ने जिन रूट के भौगोलिक कोऑर्डिनेट्स पर सहमति बनाई है, उन्हें लेकर अब संयुक्त बयान को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। इस बयान में प्रस्तावित मैनेजमेंट सिस्टम की रूपरेखा भी शामिल होगी।
हालांकि, ईरान की ओर से यह संकेत भी दिया गया है कि इस प्रक्रिया में किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी से बातचीत प्रभावित हो सकती है। ईरान ने इस संदर्भ में अमेरिका को सीधे तौर पर ‘थर्ड पार्टी’ के रूप में देखा है।
अमेरिका को क्यों बताया जा रहा है ‘थर्ड पार्टी’?
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। मौजूदा परिस्थितियों में तेहरान का कहना है कि क्षेत्रीय व्यवस्था और जलमार्ग के प्रबंधन से जुड़े फैसले ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच होने चाहिए।
ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसी वजह से तेहरान की ओर से तीसरे पक्ष की भूमिका को लेकर बार-बार चेतावनी दी जा रही है।
ईरान का यह भी कहना रहा है कि होर्मुज से सामान्य समुद्री आवाजाही तभी पूरी तरह बहाल हो सकती है, जब अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए अपने नौसैनिक प्रतिबंध या नाकेबंदी को समाप्त करे।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी के आसपास स्थित प्रमुख तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की वैश्विक सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
इस वजह से होर्मुज में किसी भी तरह का तनाव, जहाजों की आवाजाही में बाधा या मार्ग के बंद होने की आशंका सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकती है। तेल की कीमतों में तेजी आने पर भारत समेत कई आयातक देशों के लिए पेट्रोल-डीजल और अन्य ईंधनों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके उलट, अगर ईरान और ओमान के बीच बनी सहमति के बाद समुद्री आवाजाही को लेकर स्थिरता आती है, तो बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कम हो सकती है। यही वजह है कि समझौते से जुड़ी खबर सामने आते ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली।
क्या होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुल जाएगा?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। ईरान ने स्पष्ट किया है कि सामान्य ढांचे पर सहमति बनने के बावजूद अंतिम समझौता अभी बाकी है। अंतिम मसौदे, उच्च स्तर पर मंजूरी और संयुक्त बयान के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।
इसके अलावा, अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव भी इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अगर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ते हैं या कोई बाहरी हस्तक्षेप होता है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के लागू होने में देरी हो सकती है।
इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान और ओमान बातचीत को एक औपचारिक व्यवस्था की दिशा में आगे ले जाने पर सहमत दिखाई दे रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह खबर?
भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में मध्य-पूर्व से तेल की सप्लाई और समुद्री मार्गों की स्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता घट सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ने की संभावना रहती है।
वहीं, अगर जलडमरूमध्य को लेकर तनाव दोबारा बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिति और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
अभी आगे क्या होगा?
ईरान और ओमान के बीच सहमति का सामान्य ढांचा तैयार होने के बाद अब निगाहें अंतिम मसौदे और संयुक्त घोषणा पर हैं। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, समझौते के बाकी विवरण जल्द सामने आ सकते हैं।
हालांकि, जब तक उच्च स्तर से अंतिम मंजूरी नहीं मिलती और संयुक्त बयान जारी नहीं होता, तब तक इसे पूर्ण समझौता नहीं माना जा सकता।
निष्कर्ष: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच बनी प्रारंभिक सहमति वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यदि दोनों देश प्रस्तावित व्यवस्था को अंतिम रूप देने में सफल होते हैं और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो इससे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बनी चिंता कम हो सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका की भूमिका और ईरान-अमेरिका तनाव इस प्रक्रिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने रह सकते हैं।


