Hydrogen Train India: देश में हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को लेकर रेलवे की तैयारी ने एक नई दिशा पकड़ी है। जिंद-सोनीपत रूट पर देश की पहली हाइड्रोजन पावर्ड ट्रेन के पायलट परिचालन के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में इसे देश के दूसरे रेल रूट्स पर भी चलाया जाएगा? इसको लेकर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी दी है।
रेल मंत्री के मुताबिक, फिलहाल दूसरे रेल मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने का कोई निश्चित फैसला नहीं लिया गया है। भविष्य में इसका विस्तार संसाधनों की उपलब्धता, परिचालन की व्यवहारिकता और अन्य जरूरी आवश्यकताओं का आकलन करने के बाद किया जाएगा। यानी रेलवे हाइड्रोजन तकनीक की संभावनाओं को जरूर देख रहा है, लेकिन देशभर में इसके तत्काल विस्तार की कोई घोषणा नहीं हुई है।
जिंद-सोनीपत रूट पर शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट
भारतीय रेलवे ने हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक को प्रदर्शित करने के लिए जिंद-सोनीपत सेक्शन को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चुना है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में दिए लिखित जवाब में बताया कि 17 जुलाई 2026 को जिंद-सोनीपत रूट पर हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत की गई।
17 जुलाई से 3 अगस्त 2026 के बीच इस ट्रेन ने करीब 89 किलोमीटर लंबे जिंद-सोनीपत सेक्शन पर कुल 2,492 किलोमीटर की दूरी तय की। रेलवे के लिए यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए भारत में हाइड्रोजन आधारित रेल परिवहन की तकनीकी और परिचालन क्षमता को परखा जा रहा है।
यह ट्रेन फिलहाल नियमित रूप से देशभर में चलने वाली सामान्य यात्री ट्रेन की तरह नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल हाइड्रोजन संचालित रेल तकनीक के प्रदर्शन और परीक्षण के लिए किया जा रहा है।
संसद में सांसदों ने पूछे कई सवाल
राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना को लेकर सरकार से कई सवाल पूछे। इनमें परियोजना पर होने वाले खर्च, देश में स्वीकृत और प्रस्तावित हाइड्रोजन ट्रेन परियोजनाओं, ग्रीन हाइड्रोजन की उपलब्धता तथा इसकी लागत जैसे मुद्दे शामिल थे।
इसके अलावा सांसदों ने यह भी जानना चाहा कि हाइड्रोजन ईंधन के लिए देश में किस तरह की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित की जा रही है। इन सवालों के जवाब में रेल मंत्री ने मौजूदा परियोजना की प्रगति और भविष्य में इसके विस्तार को लेकर सरकार की स्थिति स्पष्ट की।
जींद में बनाया गया डेडिकेटेड हाइड्रोजन प्लांट
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए केवल ट्रेन तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ईंधन की सप्लाई और स्टोरेज के लिए अलग इंफ्रास्ट्रक्चर की भी जरूरत होती है।
रेल मंत्री के अनुसार, इस ट्रेनसेट को हाइड्रोजन उपलब्ध कराने के लिए हरियाणा के जींद में एक डेडिकेटेड हाइड्रोजन प्लांट स्थापित किया गया है। हाइड्रोजन जैसी गैस के स्टोरेज और इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इसी को ध्यान में रखते हुए हाइड्रोजन स्टोरेज सुविधा को पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) के दिशा-निर्देशों के अनुसार तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य निर्धारित सुरक्षा मानकों और जरूरी प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना है।
हाइड्रोजन ट्रेन कैसे करती है काम?
हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन से अलग तकनीक पर काम करती है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया के जरिए बिजली तैयार की जाती है। इस बिजली का इस्तेमाल ट्रेन को चलाने वाले इलेक्ट्रिक मोटरों को पावर देने में किया जाता है।
इस तकनीक में फ्यूल सेल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका एक बड़ा फायदा यह है कि ऑपरेशन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड का सीधा उत्सर्जन नहीं होता। फ्यूल सेल प्रक्रिया का प्रमुख बाई-प्रोडक्ट जलवाष्प होता है।
हालांकि, हाइड्रोजन ट्रेन को पूरी तरह पर्यावरण-मित्र मानने से पहले यह भी देखना जरूरी है कि इस्तेमाल होने वाली हाइड्रोजन किस तरीके से तैयार की गई है। यदि हाइड्रोजन का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से किया जाता है, तो इसके पर्यावरणीय फायदे और बढ़ सकते हैं।
शोर और प्रदूषण कम करने की उम्मीद
रेल मंत्री ने हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीकी खूबियों का जिक्र करते हुए बताया कि इसमें पारंपरिक इंजन की तरह ट्रैक्शन पावर पैदा करने के लिए पारंपरिक मूविंग पार्ट्स वाली व्यवस्था नहीं है। फ्यूल सेल आधारित पावर सिस्टम की वजह से इसके संचालन में शोर को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसका मतलब यह है कि भविष्य में हाइड्रोजन आधारित ट्रेनें उन रूट्स के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती हैं, जहां कम उत्सर्जन और कम शोर वाले परिवहन विकल्पों की जरूरत है।
141 करोड़ रुपये में तैयार हुआ प्रोजेक्ट
हाइड्रोजन ट्रेन के इस पायलट प्रोजेक्ट पर करीब 141 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। रेल मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह ट्रेनसेट और इससे जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर अभी प्रायोगिक चरण में है।
इसी वजह से इस परियोजना की लागत की तुलना सीधे पारंपरिक विद्युतीकृत रेल मार्गों पर चलने वाली ट्रेनों की लागत से करना उचित नहीं होगा। हाइड्रोजन ट्रेन के लिए ट्रेनसेट के अलावा हाइड्रोजन उत्पादन, स्टोरेज, सप्लाई और सुरक्षा से जुड़ा अलग इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार करना पड़ता है।
10 डिब्बों वाली है हाइड्रोजन ट्रेन
इस हाइड्रोजन ट्रेन की डिजाइन और विकास को स्वदेशी तकनीकी क्षमता से जोड़ा गया है। रेल मंत्री के अनुसार, यह ब्रॉड-गेज प्लेटफॉर्म पर आधारित 10 डिब्बों वाला ट्रेनसेट है।
इसमें दो ड्राइविंग पावर कार शामिल हैं। प्रत्येक की क्षमता 1,200 किलोवाट है। दोनों मिलकर कुल 2,400 किलोवाट की क्षमता उपलब्ध कराते हैं। इनके साथ आठ पैसेंजर कोच लगाए गए हैं।
रेलवे के अनुसार, इस कॉन्फिगरेशन के साथ यह ट्रेनसेट अपनी श्रेणी में दुनिया के प्रमुख और सबसे लंबे हाइड्रोजन ट्रेनसेट में शामिल है।
क्या पूरे देश में चलेगी हाइड्रोजन ट्रेन?
यह सवाल फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण है। जिंद-सोनीपत रूट पर सफल पायलट परिचालन के बाद उम्मीद जरूर बढ़ी है कि भविष्य में हाइड्रोजन ट्रेन को दूसरे रूट्स तक ले जाया जा सकता है।
लेकिन रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में साफ किया है कि अन्य रेल रूट्स पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने का फैसला अभी तय नहीं है। इसके लिए संसाधनों की उपलब्धता, परिचालन संबंधी व्यवहारिकता और दूसरी आवश्यकताओं का मूल्यांकन किया जाएगा।
इसका मतलब है कि रेलवे फिलहाल तकनीक को टेस्ट और प्रदर्शित करने के चरण में है। यदि यह तकनीक लागत, सुरक्षा, ईंधन उपलब्धता और परिचालन के लिहाज से सफल रहती है, तो भविष्य में इसके विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
भारत के रेल नेटवर्क के लिए क्यों अहम है यह तकनीक?
भारतीय रेलवे का नेटवर्क बहुत बड़ा है और इसके बड़े हिस्से का विद्युतीकरण हो चुका है। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन को पूरे नेटवर्क के लिए तत्काल विकल्प मानना सही नहीं होगा। हालांकि, कुछ ऐसे रूट्स जहां विद्युतीकरण करना मुश्किल या आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, वहां भविष्य में हाइड्रोजन आधारित तकनीक एक विकल्प बन सकती है।
इसके अलावा, भारत के लिए यह परियोजना घरेलू स्तर पर फ्यूल सेल, हाइड्रोजन स्टोरेज, हाइड्रोजन उत्पादन और संबंधित रेल तकनीक विकसित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल जिंद-सोनीपत रूट इस तकनीक का परीक्षण स्थल है। आने वाले समय में इसकी परिचालन क्षमता और आर्थिक व्यवहारिकता के आधार पर ही तय होगा कि हाइड्रोजन ट्रेन भारत के कितने और रेल मार्गों तक पहुंचती है।


