चीनी रिटेल कंपनी की ‘अनहैप्पी लीव’ पॉलिसी ने खड़ा किया नया सवाल, क्या भारतीय कॉर्पोरेट कल्चर में भी कर्मचारियों को ऐसी छुट्टी मिलनी चाहिए?
Unhappy Leave: ऑफिस में काम का दबाव, लगातार बढ़ते टारगेट और लंबे वर्किंग ऑवर्स के बीच कर्मचारियों की मानसिक सेहत को लेकर चर्चा लगातार बढ़ रही है। इसी बीच RPG एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने एक ऐसी छुट्टी की पॉलिसी का जिक्र किया है, जिसने कॉर्पोरेट वर्ल्ड में नई बहस छेड़ दी है। यह पॉलिसी चीन की रिटेल कंपनी ‘पैंग डोंग लाई’ से जुड़ी है, जहां कर्मचारियों को साल में 10 दिन की पेड ‘अनहैप्पी लीव’ लेने की सुविधा दी जाती है।
क्या है ‘अनहैप्पी लीव’?
Chinese retailer Pang Dong Lai gives employees 10 days of paid “unhappy leave.” Founder Yu Donglai’s philosophy is simple “If you’re not happy, don’t come to work.” Managers are reportedly not allowed to refuse the request.
Extreme? Perhaps.
We do need a broader conversation if…
— Harsh Goenka (@hvgoenka) August 7, 2026 इस पॉलिसी का मूल सिद्धांत काफी सरल है- अगर कर्मचारी खुश नहीं है, तो वह ऑफिस न आए। यानी अगर किसी दिन कर्मचारी मानसिक रूप से काम करने की स्थिति में नहीं है या उसे ब्रेक की जरूरत महसूस हो रही है, तो वह ‘अनहैप्पी लीव’ ले सकता है।
बताया जाता है कि इस तरह की छुट्टी के लिए मैनेजर कर्मचारी की रिक्वेस्ट को खारिज नहीं कर सकते। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को अपनी मानसिक स्थिति के हिसाब से आराम करने और काम से कुछ समय दूर रहने की आजादी देना है।
हर्ष गोयनका ने क्या कहा?
हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए चीन की इस पॉलिसी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पैंग डोंग लाई अपने कर्मचारियों को 10 दिन की पेड ‘अनहैप्पी लीव’ देती है। कंपनी के फाउंडर यू डोंग लाई की सोच है कि अगर कोई कर्मचारी खुश नहीं है, तो उसे काम पर आने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
गोयनका ने इस पॉलिसी को भारतीय संदर्भ में देखने की जरूरत पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या भारत में भी ऐसी ‘अनहैप्पी लीव’ की जरूरत है या फिर बर्नआउट को रोकने और ऐसा वर्कप्लेस तैयार करने के लिए कोई बेहतर तरीका अपनाया जा सकता है, जहां कर्मचारी खुद काम पर आना चाहें।
क्या भारतीय कंपनियों में भी हो सकती है ऐसी पॉलिसी?
हर्ष गोयनका के इस पोस्ट के बाद प्रोफेशनल्स के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आई। कुछ लोगों ने माना कि कर्मचारियों को अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार ब्रेक लेने की आजादी देना सकारात्मक कदम हो सकता है। उनका तर्क है कि लगातार तनाव में काम करने से कर्मचारी की प्रोडक्टिविटी और क्रिएटिविटी दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
वहीं, कुछ लोगों ने इस पॉलिसी को लेकर व्यावहारिक चिंताएं भी जताईं। उनका कहना है कि अगर किसी कंपनी में पूरी टीम टारगेट पूरा नहीं होने या महीने के आखिरी दिनों जैसे महत्वपूर्ण समय में एक साथ ‘अनहैप्पी लीव’ लेने लगे, तो इसका सीधा असर कंपनी के कामकाज पर पड़ सकता है।
सिर्फ छुट्टी से खत्म नहीं होगा बर्नआउट
कुछ प्रोफेशनल्स का मानना है कि कर्मचारियों को अतिरिक्त छुट्टी देना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन इससे वर्कप्लेस की मूल समस्याएं खत्म नहीं होंगी। अगर कर्मचारियों पर लगातार जरूरत से ज्यादा काम का दबाव, अवास्तविक टारगेट या खराब मैनेजमेंट बना रहता है, तो केवल छुट्टी की सुविधा से बर्नआउट को पूरी तरह रोकना मुश्किल होगा।
ऐसे में कंपनियों को केवल अटेंडेंस और छुट्टियों को मैनेज करने के बजाय कर्मचारियों के मोटिवेशन, वर्क-लाइफ बैलेंस और मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
बेहतर वर्कप्लेस बनाने पर जोर
‘अनहैप्पी लीव’ की बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कर्मचारियों को खुश रखने के लिए ज्यादा छुट्टियां जरूरी हैं या फिर ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करने की जरूरत है, जहां तनाव कम हो और कर्मचारी खुद को सम्मानित महसूस करें।
भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में इस तरह की पॉलिसी लागू होती है या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन हर्ष गोयनका की पोस्ट ने निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखा है- क्या कर्मचारी को ऑफिस से छुट्टी देने से ज्यादा जरूरी ऐसा ऑफिस बनाना है, जहां उसे छुट्टी लेने की जरूरत ही कम महसूस हो?


