Samudra Manthan Scheme: भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने और कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹84,084 करोड़ की ‘समुद्र मंथन राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना’ (Samudra Manthan National Offshore Exploration Scheme) को मंजूरी दी है। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सरकार पहली बार गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज के जोखिम को अपने बजट से साझा करेगी।
योजना के तहत सरकार हर गहरे या अत्यधिक गहरे समुद्र में खोदे जाने वाले एक्सप्लोरेशन वेल (कुएं) की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम ₹650 करोड़ (जो भी कम हो) तक की वित्तीय सहायता देगी। अगले पांच वर्षों में 60 गहरे समुद्री कुओं की ड्रिलिंग के लिए सरकारी मदद उपलब्ध कराई जाएगी।
क्यों जरूरी पड़ी समुद्र मंथन योजना?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में शामिल है, लेकिन घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले काफी कम है। पिछले कुछ वर्षों में देश की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता 77% से बढ़कर लगभग 88% तक पहुंच चुकी है। वहीं प्राकृतिक गैस की जरूरत का भी लगभग आधा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है।
ऐसे में सरकार का लक्ष्य भारतीय समुद्री क्षेत्र में छिपे तेल और गैस के नए भंडार खोजकर घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
समुद्र में एक कुआं खोदने पर सरकार क्यों देगी ₹650 करोड़?
गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज बेहद महंगी और जोखिम भरी होती है। कई बार हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद व्यावसायिक रूप से उपयोगी तेल या गैस नहीं मिलती। इसी वजह से निजी कंपनियां ऐसे प्रोजेक्ट्स में निवेश करने से बचती रही हैं।
इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने फैसला किया है कि वह खुद इस जोखिम का हिस्सा बनेगी।
योजना के प्रमुख प्रावधान
- प्रत्येक गहरे या अत्यधिक गहरे समुद्री एक्सप्लोरेशन वेल पर 50% लागत की सहायता।
- अधिकतम सरकारी सहायता ₹650 करोड़ प्रति कुआं।
- अगले पांच वर्षों में 60 एक्सप्लोरेशन कुओं को सहायता।
- पूरी योजना का बजट ₹84,084 करोड़।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यह दुनिया में अपनी तरह का पहला मॉडल हो सकता है, जहां सरकार सीधे बजट से एक्सप्लोरेशन रिस्क साझा कर रही है।
निजी कंपनियां अब तक पीछे क्यों हटती थीं?
ऑफशोर एक्सप्लोरेशन में सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि ड्रिलिंग के बाद भी तेल या गैस का ऐसा भंडार न मिले, जिसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सके। ऐसी स्थिति में पूरा निवेश डूब जाता है।
इसी कारण अधिकांश कंपनियां नए भंडार खोजने के बजाय पहले से खोजे गए क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने यानी डेवलपमेंट ड्रिलिंग पर ही निवेश करती थीं। समुद्र मंथन योजना इस स्थिति को बदलने की कोशिश है।
₹84,084 करोड़ के बजट का पूरा ब्रेकअप
सरकार ने योजना के लिए अलग-अलग मदों में बजट निर्धारित किया है।
| मद | आवंटित राशि |
|---|---|
| डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर ड्रिलिंग | ₹43,200 करोड़ |
| समुद्री भूकंपीय (Seismic) डेटा संग्रह | ₹28,534 करोड़ |
| सबसी पाइपलाइन और तटीय प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर | ₹10,000 करोड़ |
| तेल एवं गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का विकास | ₹2,000 करोड़ |
क्या है कॉमन हब इंफ्रास्ट्रक्चर (CHI) मॉडल?
सरकार केवल ड्रिलिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि साझा बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी सहायता देगी।
Common Hub Infrastructure (CHI) मॉडल के तहत—
- कई ऑपरेटर एक ही सबसी पाइपलाइन का उपयोग कर सकेंगे।
- साझा प्रोसेसिंग सुविधाओं का लाभ मिलेगा।
- परियोजनाओं की लागत कम होगी।
- छोटी खोजों को भी व्यावसायिक उत्पादन तक लाना आसान होगा।
- तेल और गैस उत्पादन जल्दी शुरू किया जा सकेगा।
किन कंपनियों को मिलेगा लाभ?
इस योजना का लाभ उन कंपनियों को मिलेगा जिन्होंने—
- Open Acreage Licensing Programme (OALP) के पिछले चरणों में ब्लॉक हासिल किए हैं।
- मौजूदा या भविष्य के OALP बोली दौर में ब्लॉक प्राप्त करेंगे।
ऐसी कंपनियां प्रत्येक योग्य कुएं पर ₹650 करोड़ तक की सरकारी सहायता प्राप्त कर सकेंगी।
कितनी घट सकती है आयात पर निर्भरता?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना सफल रहती है तो भारत हर वर्ष 10 से 15 मिलियन टन ऑयल इक्विवेलेंट (MTOE) का अतिरिक्त उत्पादन जोड़ सकता है।
इसके परिणामस्वरूप—
- तेल और गैस आयात पर निर्भरता 3% से 5% तक घट सकती है।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
- वैश्विक ऊर्जा कंपनियों का निवेश बढ़ सकता है।
- ऑफशोर तकनीक और घरेलू उद्योग को नई गति मिलेगी।
विशेषज्ञों की राय
इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि ऑफशोर एक्सप्लोरेशन की सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक लागत और जोखिम है। सरकारी सहायता मिलने से कंपनियों का जोखिम कम होगा और गहरे समुद्र में नई खोजों की संभावना बढ़ेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के पास गहरे समुद्री क्षेत्रों में सीमित अनुभव है, इसलिए यह योजना तकनीकी विशेषज्ञता और विदेशी निवेश आकर्षित करने में भी मददगार साबित हो सकती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह योजना?
भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए केवल आयात पर निर्भर रहना दीर्घकाल में महंगा साबित हो सकता है। यदि घरेलू समुद्री क्षेत्रों में नए तेल और गैस भंडार खोजे जाते हैं तो इससे ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित होगी और वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी कम पड़ेगा।
हालांकि सरकार ने यह भी माना है कि गहरे समुद्र में हर ड्रिलिंग सफल नहीं होगी और हर कुएं से व्यावसायिक उत्पादन संभव नहीं है। इसके बावजूद एक्सप्लोरेशन जोखिम को सीधे सरकारी सहायता से कम करना भारत की तेल एवं गैस नीति में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव माना जा रहा है।
निष्कर्ष
समुद्र मंथन राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना भारत के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। पहली बार सरकार गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज का जोखिम खुद साझा कर रही है। यदि यह पहल सफल होती है तो आने वाले वर्षों में भारत का घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, आयात पर निर्भरता घटेगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।


