नई दिल्ली: भारत में पिछले नौ वर्षों के दौरान औपचारिक (Formal) कर्ज व्यवस्था तक लोगों की पहुंच में ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बैंक, क्रेडिट यूनियन, सहकारी संस्थाओं और अन्य रेगुलेटेड वित्तीय संस्थानों से लोन लेने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्रेडिट लेने वालों की वृद्धि दर पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने वाले महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों से भी अधिक रही है।
ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) की नई रिपोर्ट ‘Unlocking Access: Journey to Credit Expansion in India’ के अनुसार देश में महिलाओं, युवाओं और नॉन-मेट्रो शहरों के लोगों ने भी पहले की तुलना में कहीं अधिक संख्या में औपचारिक कर्ज लेना शुरू किया है। डिजिटल बैंकिंग, यूपीआई, फिनटेक कंपनियों और सरकारी सुधारों ने इस बदलाव को नई गति दी है।
9 साल में 89 करोड़ हुई क्रेडिट-योग्य आबादी
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 में देश की क्रेडिट-एलिजिबल (कर्ज लेने योग्य) आबादी 79 करोड़ थी, जो वर्ष 2026 तक बढ़कर 89 करोड़ पहुंच गई।
इस दौरान सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि कम-से-कम एक बार औपचारिक कर्ज लेने वाले लोगों की हिस्सेदारी 35% से बढ़कर 74% हो गई। यह दर्शाता है कि अब पहले की तुलना में कहीं अधिक लोग बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों से जुड़ रहे हैं।
क्रेडिट-एक्टिव ग्राहकों की संख्या भी तेजी से बढ़ी
मार्च 2017 में कुल क्रेडिट-योग्य आबादी में केवल 11% लोग सक्रिय रूप से लोन का इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि मार्च 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 28% हो गया।
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि नए ग्राहकों की वृद्धि की रफ्तार अब पहले जैसी तेज नहीं रही। मार्च 2017 से मार्च 2019 के बीच क्रेडिट-एक्टिव ग्राहकों की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 14% थी, जो मार्च 2024 से मार्च 2026 के दौरान घटकर 9% रह गई।
इसी तरह पहली बार औपचारिक कर्ज लेने वाले उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी भी मार्च 2017 की तिमाही में 32% थी, जो मार्च 2026 तक घटकर 13% रह गई। इसका मतलब है कि शुरुआती वर्षों में तेज विस्तार के बाद अब बाजार धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है।
आखिर क्यों आया इतना बड़ा बदलाव?
ट्रांसयूनियन सिबिल के एमडी और सीईओ भावेश जैन के अनुसार भारत के क्रेडिट इकोसिस्टम में पिछले दशक के दौरान कई बड़े बदलाव हुए।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2016-17 के दौरान नोटबंदी, जीएसटी लागू होना और यूपीआई का तेजी से विस्तार ऐसे बड़े कदम थे, जिन्होंने देश की वित्तीय व्यवस्था को डिजिटल दिशा दी।
इसके बाद रिजर्व बैंक, बैंकों, एनबीएफसी, फिनटेक कंपनियों, क्रेडिट सूचना कंपनियों और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने मिलकर औपचारिक कर्ज तक पहुंच पहले से कहीं अधिक आसान बना दी। अब छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के लोग भी आसानी से डिजिटल माध्यम से लोन प्राप्त कर पा रहे हैं।
सबसे ज्यादा बढ़ी पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड की मांग
रिपोर्ट के अनुसार उपभोग से जुड़े कर्जों में सबसे अधिक तेजी देखने को मिली।
मार्च 2017 में 34% सक्रिय कर्जधारकों के पास पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड या कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन जैसे उत्पाद थे। मार्च 2026 तक यह हिस्सा बढ़कर 51% हो गया।
इन उत्पादों का उपयोग करने वाले ग्राहकों की संख्या नौ वर्षों में चार गुना बढ़ गई, जिससे साफ है कि लोग अब दैनिक जरूरतों, खरीदारी और उपभोग संबंधी खर्चों के लिए भी औपचारिक वित्तीय संस्थानों पर अधिक भरोसा कर रहे हैं।
कारोबार के लिए लोन लेने वालों की संख्या 10 गुना बढ़ी
रिपोर्ट में सबसे उल्लेखनीय वृद्धि बिजनेस लोन श्रेणी में दर्ज की गई।
मार्च 2017 में केवल 3% सक्रिय कर्जधारकों के पास कारोबार से जुड़े लोन थे। मार्च 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 9% हो गया।
यानी इस अवधि में बिजनेस लोन लेने वालों की संख्या 10 गुना बढ़ी, जो अध्ययन की सभी लोन श्रेणियों में सबसे तेज वृद्धि मानी गई।
वहीं गोल्ड लोन लेने वालों की हिस्सेदारी 19% से बढ़कर 22% हुई, जबकि वाहन ऋण और होम लोन (मॉर्गेज) की वृद्धि अपेक्षाकृत स्थिर रही।
यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश ने बढ़ाई हिस्सेदारी
राज्यवार आंकड़ों में सबसे बड़ा बदलाव उत्तर और मध्य भारत में देखने को मिला।
जहां पहले महाराष्ट्र और तमिलनाडु देश के सबसे बड़े क्रेडिट बाजार थे, वहीं अब उत्तर भारत के कई राज्यों ने तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है।
- उत्तर प्रदेश: 8% से बढ़कर 11%
- मध्य प्रदेश: 4% से बढ़कर 6%
- बिहार: 3% से बढ़कर 5%
- पश्चिम बंगाल: 4% से बढ़कर 5%
वहीं दूसरी ओर—
- महाराष्ट्र: 12% से घटकर 10%
- तमिलनाडु: 11% से घटकर 9%
हालांकि महाराष्ट्र और तमिलनाडु अभी भी देश के सबसे बड़े क्रेडिट बाजारों में शामिल हैं, लेकिन उनकी हिस्सेदारी में कमी आई है क्योंकि उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में तेजी से नए कर्जदार जुड़े हैं।
महिलाओं और छोटे शहरों की भागीदारी बढ़ी
रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के चलते महिलाओं, युवाओं और नॉन-मेट्रो शहरों में रहने वाले लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
डिजिटल केवाईसी, आधार आधारित सत्यापन, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स ने छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए भी लोन लेना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान बना दिया है।
आगे क्या संकेत मिलते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का औपचारिक क्रेडिट बाजार अभी भी विस्तार के दौर में है। हालांकि नए ग्राहकों की वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी हुई है, लेकिन डिजिटल बैंकिंग, फिनटेक नवाचार और सरकारी नीतियों के कारण आने वाले वर्षों में भी क्रेडिट बाजार का विस्तार जारी रहने की संभावना है। खासकर उत्तर भारत के राज्यों में बढ़ती आय, शहरीकरण और डिजिटल भुगतान प्रणाली के प्रसार से लोन की मांग में और तेजी देखने को मिल सकती है.


