Consumer Court Order: हिमाचल प्रदेश के जिला उपभोक्ता आयोग ने इंटरनेट सेवा में लगातार बाधा आने और शिकायतों के बावजूद समाधान न मिलने के मामले में एक महिला के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने रिलायंस जियोफाइबर को सेवा में कमी (Deficiency in Service) और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) का दोषी मानते हुए 10,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इंटरनेट कनेक्शन बहाल करने का भी निर्देश दिया गया है।
इंटरनेट सेवा में लगातार दिक्कत के बाद पहुंची उपभोक्ता आयोग
शिमला निवासी महिला ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि उन्होंने 2 मार्च 2025 को जियोफाइबर का 6 महीने का प्लान रिचार्ज कराया था, जिसके लिए ₹2,824.92 का भुगतान किया गया। यह इंटरनेट कनेक्शन वह पढ़ाई, ऑनलाइन काम और दैनिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल करती थीं।
महिला के अनुसार, 9 अप्रैल 2025 को अचानक इंटरनेट सेवा बंद हो गई। उन्होंने तुरंत ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। इतना ही नहीं, कंपनी की ओर से कई शिकायतों को बिना समाधान किए ही “Resolved” यानी निस्तारित दिखा दिया गया।
टेक्नीशियन ने टूटी फाइबर केबल देखी, लेकिन नहीं लौटे
शिकायत के दौरान कंपनी का एक प्रतिनिधि महिला के घर पहुंचा। जांच में उसने पाया कि फाइबर केबल टूटी हुई थी। उसने भरोसा दिलाया कि कुछ ही मिनटों में केबल बदल दी जाएगी और इंटरनेट सेवा शुरू हो जाएगी।
हालांकि, महिला का आरोप है कि वह टेक्नीशियन दोबारा कभी नहीं आया। इसके बाद भी उन्होंने लगातार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। एक अन्य टेक्नीशियन नियुक्त किए जाने की बात भी कही गई, लेकिन वह भी मौके पर नहीं पहुंचा।
जियोफाइबर ने क्या दिया जवाब?
उपभोक्ता आयोग में कंपनी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने कुछ सर्विस रिक्वेस्ट का समाधान होने से पहले ही उन्हें स्वयं रद्द कर दिया था। कंपनी का यह भी दावा था कि बाद में समस्या पूरी तरह ठीक कर दी गई थी और महिला बिना किसी रुकावट के इंटरनेट सेवा का उपयोग कर रही थीं।
आयोग ने कंपनी की दलीलों को क्यों नहीं माना?
मामले की सुनवाई अध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की पीठ ने की।
आयोग ने कहा कि यह निर्विवाद है कि महिला ने कई बार इंटरनेट सेवा में खराबी की शिकायत दर्ज कराई थी। ऐसे में यह साबित करना कंपनी की जिम्मेदारी थी कि उसने वास्तव में तकनीकी समस्या का समाधान किया।
आयोग ने पाया कि कंपनी ने केवल अपने स्टेट फाइनेंस हेड के हलफनामे और बंद की गई शिकायतों के रिकॉर्ड पेश किए। लेकिन उसने कोई ऐसा तकनीकी साक्ष्य या उस इंजीनियर का हलफनामा प्रस्तुत नहीं किया, जिसने मौके पर जाकर समस्या का समाधान किया हो।
आयोग ने स्पष्ट कहा कि केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि इंटरनेट सेवा वास्तव में बहाल कर दी गई थी।
सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि महिला ने छह महीने की इंटरनेट सेवा का पूरा भुगतान किया था, लेकिन वह उस सेवा का लाभ नहीं उठा सकीं। यह उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है और सेवा में स्पष्ट कमी को दर्शाता है।
आयोग ने माना कि कंपनी शिकायतकर्ता की समस्या का समाधान साबित करने में पूरी तरह विफल रही। इसलिए यह मामला Deficiency in Service और Unfair Trade Practice की श्रेणी में आता है।
जियोफाइबर को क्या-क्या आदेश दिए गए?
उपभोक्ता आयोग ने रिलायंस जियोफाइबर को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं—
- शिकायतकर्ता का इंटरनेट कनेक्शन बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के बहाल किया जाए।
- इंटरनेट सेवा बिना रुकावट उपलब्ध कराई जाए।
- मानसिक उत्पीड़न, असुविधा और मुकदमे के खर्च के लिए ₹10,000 का एकमुश्त मुआवजा दिया जाए।
- यह भुगतान आयोग के आदेश की तारीख से 45 दिनों के भीतर किया जाए।
उपभोक्ताओं के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला उन लाखों इंटरनेट उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें खराब सेवा मिलने के बावजूद समय पर समाधान नहीं मिलता। यदि कोई कंपनी बार-बार शिकायत के बाद भी समस्या दूर नहीं करती और पर्याप्त तकनीकी प्रमाण भी पेश नहीं कर पाती, तो उपभोक्ता उपभोक्ता आयोग में शिकायत कर सकते हैं।
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि सेवा प्रदाता कंपनियों को केवल शिकायत बंद दिखाने के बजाय वास्तविक समाधान देना होगा। यदि भुगतान करने के बावजूद ग्राहक सेवा का लाभ नहीं ले पाता, तो उसे मुआवजा मिलने का अधिकार है।


