Red Sea Crisis: लाल सागर (Red Sea) में यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों ने वैश्विक तेल सप्लाई चेन को फिर से झटका दिया है। सऊदी अरब से भारत और चीन के लिए रवाना हुए कई क्रूड ऑयल टैंकरों को बीच रास्ते से ही यू-टर्न लेना पड़ा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो भारत का सालाना कच्चे तेल का आयात बिल 8 से 10 अरब डॉलर (करीब ₹77,000 करोड़ से ₹97,000 करोड़) तक बढ़ सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, महंगाई और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
Highlights
- रेड सी में हूती हमलों के बाद सऊदी तेल टैंकरों ने बदला रास्ता
- भारत के क्रूड इम्पोर्ट बिल पर ₹97,000 करोड़ तक अतिरिक्त बोझ का अनुमान
- जहाज अब केप ऑफ गुड होप से होकर आएंगे, 10-15 दिन बढ़ेगा सफर
- फ्रेट, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत में भारी बढ़ोतरी
- रूस से आने वाला सस्ता तेल भी हो सकता है महंगा
- पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर पड़ सकता है असर
रेड सी में बढ़ा तनाव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर नया खतरा
यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में लगातार किए जा रहे हमलों के कारण दुनिया की सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक लाइनों में से एक प्रभावित हो गई है। इस क्षेत्र से हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल और अन्य जरूरी सामान दुनिया के कई देशों तक पहुंचता है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस समुद्री संकट के कारण सऊदी अरब से भारत आने वाले तेल टैंकरों को अपने निर्धारित मार्ग छोड़कर लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। इससे भारत के लिए तेल आयात की लागत में भारी बढ़ोतरी होने की आशंका है।
दो बड़े तेल टैंकरों ने बीच रास्ते बदला रूट
MarineTraffic के जहाज ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, सुरक्षा कारणों से दो बड़े क्रूड ऑयल टैंकरों ने अपना मार्ग बदल दिया।
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सिंगापुर फ्लैग वाला यह टैंकर 20 जुलाई को सऊदी अरब के यनबू (Yanbu) बंदरगाह से चीन के क्विनझोउ के लिए रवाना हुआ था। लेकिन लाल सागर के बीच पहुंचने के बाद जहाज को वापस लौटना पड़ा।
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लाइबेरिया फ्लैग वाला यह जहाज सऊदी अरब से भारत के न्यू मंगलोर बंदरगाह के लिए निकला था। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के बाद इसने भी अपना मार्ग बदलकर स्वेज नहर की दिशा पकड़ ली।
इन घटनाओं से साफ है कि शिपिंग कंपनियां फिलहाल रेड सी के रास्ते यात्रा करने से बच रही हैं।
बाब-अल-मंदेब मार्ग पर जहाजों की आवाजाही 34% घटी
एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के मुताबिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या करीब 34% तक कम हो गई है।
अदन की खाड़ी के पास कम से कम चार बड़े जहाजों के यू-टर्न लेने के बाद यह संकेत मिल रहा है कि समुद्री व्यापार अब सुरक्षित विकल्प तलाश रहा है। इसका असर एशियाई देशों तक तेल पहुंचने की गति पर पड़ेगा और सप्लाई में कई दिनों की देरी हो सकती है।
अब केप ऑफ गुड होप से होकर आएंगे जहाज
भारत प्रतिदिन लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। इसमें करीब 40 से 45 प्रतिशत तेल पश्चिम एशिया से आता है।
रेड सी का रास्ता असुरक्षित होने के कारण अब अधिकांश जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर स्थित केप ऑफ गुड होप से होकर आना पड़ सकता है।
इस वैकल्पिक मार्ग से यात्रा करने पर—
- सफर 10 से 15 दिन लंबा हो जाएगा।
- जहाजों की ईंधन लागत बढ़ेगी।
- समय पर डिलीवरी प्रभावित होगी।
- शिपिंग कंपनियों का परिचालन खर्च बढ़ जाएगा।
कितना बढ़ सकता है भारत का खर्च?
1. फ्रेट और लॉजिस्टिक्स लागत
YES Securities के रणनीतिकार हितेश जैन के अनुसार, 20 लाख बैरल क्षमता वाले Very Large Crude Carrier (VLCC) की परिवहन लागत पहले लगभग 0.75 डॉलर प्रति बैरल थी।
अब यह बढ़कर 2 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
यदि जहाजों की उपलब्धता और कम हुई तो यह लागत 3 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो सकती है।
2. युद्ध जोखिम बीमा
रेड सी में बढ़ते हमलों के कारण जहाजों का War Risk Insurance भी तेजी से महंगा हो गया है।
करीब 160 मिलियन डॉलर मूल्य वाले जहाज के लिए बीमा प्रीमियम एक यात्रा में 8 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो जहाज की कुल कीमत का लगभग 5 प्रतिशत है।
3. प्रति बैरल लागत में बढ़ोतरी
PwC इंडिया के विशेषज्ञ मानस मजूमदार का अनुमान है कि भारत के लिए कच्चे तेल की लैंडेड कॉस्ट में 2 से 4 डॉलर प्रति बैरल की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है।
इसका असर भारत के मासिक आयात बिल पर भी दिखाई देगा।
- मासिक अतिरिक्त खर्च: 70 करोड़ से 100 करोड़ डॉलर
- वार्षिक अतिरिक्त बोझ: 8 से 10 अरब डॉलर (₹77,000 करोड़ से ₹97,000 करोड़)
रूसी तेल भी अब पहले जितना सस्ता नहीं रहेगा
रूस से मिलने वाला डिस्काउंट वाला कच्चा तेल भी अब महंगा पड़ सकता है।
जून महीने में भारत की कुल क्रूड ऑयल खपत का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा रूस से आया था। लेकिन लंबे समुद्री मार्ग, बढ़े हुए चार्टर रेट और महंगे बीमा के कारण रूसी तेल की वास्तविक लागत भी बढ़ने लगेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2022 के बाद भारतीय रिफाइनरियों को जो बड़ा डिस्काउंट मिल रहा था, वह अब काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
क्या पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है?
यदि रेड सी का संकट लंबे समय तक जारी रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत में तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
हालांकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बदलाव का फैसला कई कारकों पर निर्भर करता है, लेकिन लगातार बढ़ती आयात लागत और शिपिंग खर्च भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
लाल सागर में बढ़ते हूती हमलों ने केवल समुद्री सुरक्षा ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारत, जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल हो सकता है। यदि जहाजों को लंबे समय तक केप ऑफ गुड होप के रास्ते आना पड़ा, तो कच्चे तेल की लागत, शिपिंग खर्च और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।


