नई दिल्ली: रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) के भीतर बदलाव और मतभेदों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। अब इसी बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन विजय सिंह ने घोषणा की है कि वह 14 अगस्त को अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद सर रतन टाटा ट्रस्ट (Sir Ratan Tata Trust – SRTT) के ट्रस्टी पद से हट जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते और इसके पीछे की वजह भी खुलकर बताई।
रतन टाटा के बाद बदला माहौल
78 वर्षीय विजय सिंह ने कहा कि रतन टाटा के निधन के बाद ट्रस्ट के भीतर का माहौल पहले जैसा नहीं रहा। उनके अनुसार, वर्तमान परिस्थितियां चिंताजनक हैं और भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि उम्र को देखते हुए भी अब वह SRTT में आगे नहीं बने रहना चाहते। हालांकि, वह पूरी तरह से टाटा ट्रस्ट्स से अलग नहीं होंगे। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (Sir Dorabji Tata Trust) में वह अगले एक वर्ष तक ट्रस्टी के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।
दूसरा कार्यकाल नहीं लेने का फैसला
विजय सिंह ने साफ कर दिया कि वह न केवल सर रतन टाटा ट्रस्ट में दूसरा कार्यकाल नहीं लेंगे, बल्कि किसी अन्य टाटा ट्रस्ट में भी नई नियुक्ति की इच्छा नहीं रखते। उनका कहना है कि यह फैसला पूरी तरह सोच-समझकर लिया गया है।
टाटा ट्रस्ट्स में मतभेद आए सामने
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विजय सिंह का यह फैसला ऐसे समय आया है जब टाटा ट्रस्ट्स के भीतर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद उभरकर सामने आए हैं।
मई महीने में विजय सिंह और टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन वेनू श्रीनिवासन ने टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (TEDT) से भी इस्तीफा दिया था। बताया गया कि ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने दोनों की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया था।
उनका तर्क था कि 1923 के ट्रस्ट डीड के अनुसार ट्रस्टी बनने के लिए व्यक्ति का प्रैक्टिस करने वाला पारसी जोरास्ट्रियन और मुंबई का स्थायी निवासी होना आवश्यक है।
टाटा सन्स की लिस्टिंग पर भी रहा मतभेद
सूत्रों के मुताबिक, विजय सिंह के लिए सर रतन टाटा ट्रस्ट में दूसरा कार्यकाल हासिल करना आसान नहीं था। इसकी एक बड़ी वजह टाटा सन्स की संभावित लिस्टिंग को लेकर उनके सार्वजनिक बयान भी माने जा रहे हैं।
विजय सिंह ने टाटा सन्स की लिस्टिंग के पक्ष में राय रखी थी, जबकि नोएल टाटा के नेतृत्व वाला ट्रस्ट फिलहाल कंपनी को निजी (Private) ही बनाए रखने के पक्ष में माना जाता है। इस मुद्दे को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आई हैं।
कानूनी चुनौतियों से भी जूझ रहा ट्रस्ट
सर रतन टाटा ट्रस्ट इस समय कानूनी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने स्थायी ट्रस्टियों की नियुक्ति से जुड़े मामले पर अंतिम फैसला आने तक ट्रस्ट की बोर्ड बैठकें आयोजित करने पर रोक लगा दी है।
इसका असर कई महत्वपूर्ण फैसलों पर पड़ा है। फिलहाल टाटा सन्स के बोर्ड में ट्रस्ट के प्रतिनिधित्व और नॉमिनी डायरेक्टरों की नियुक्ति जैसे अहम निर्णय लंबित हैं।
टाटा सन्स में सबसे बड़ी हिस्सेदारी
सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट मिलकर टाटा सन्स में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में विजय सिंह का ट्रस्टी पद छोड़ने का फैसला केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे टाटा ट्रस्ट्स की भविष्य की गवर्नेंस, नेतृत्व और आंतरिक संरचना से जोड़कर देखा जा रहा है।


