नई दिल्ली: पिछले एक साल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी को लेकर केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय रुपये की विनिमय दर पूरी तरह बाजार आधारित (Market Determined) है और सरकार किसी निश्चित स्तर पर इसे बनाए रखने के लिए अतिरिक्त हस्तक्षेप करने की योजना नहीं बना रही है। सरकार का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, बाहरी कर्ज नियंत्रण में है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त स्तर पर बना हुआ है।
Highlights
- रुपये की कीमत बाजार की मांग और आपूर्ति से तय होती है।
- सरकार किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखने के पक्ष में नहीं।
- RBI जरूरत पड़ने पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है।
- मार्च 2026 तक भारत का बाहरी कर्ज 762.8 अरब डॉलर पहुंचा।
- विदेशी मुद्रा भंडार 671.6 अरब डॉलर के मजबूत स्तर पर।
राज्यसभा में वित्त मंत्रालय ने दिया जवाब
राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि भारतीय रुपये की कीमत किसी सरकारी आदेश से नहीं बल्कि बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तय होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार किसी विशेष विनिमय दर, बैंड या लक्ष्य को निर्धारित नहीं करती।
उन्होंने यह भी कहा कि रुपये में आने वाले उतार-चढ़ाव के पीछे कई घरेलू और वैश्विक आर्थिक कारण होते हैं। इसलिए केवल बढ़ते बाहरी कर्ज को रुपये की कमजोरी का कारण मानना सही नहीं होगा।
किन कारणों से बदलती है रुपये की कीमत?
वित्त मंत्रालय के अनुसार रुपये की विनिमय दर पर कई आर्थिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। इनमें प्रमुख हैं—
- अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में बदलाव
- वैश्विक पूंजी प्रवाह
- घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरें
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
- चालू खाता घाटा (Current Account Deficit)
- वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियां
इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की कीमत तय होती है।
2014 और 2026 के आंकड़ों से की तुलना
वित्त राज्य मंत्री ने राज्यसभा में रुपये की स्थिति का तुलनात्मक आंकड़ा भी पेश किया।
वर्ष 2014 में
- डॉलर के मुकाबले रुपया 58.34 से 63.89 रुपये के बीच रहा।
- वर्ष के अंत में विनिमय दर 63.33 रुपये प्रति डॉलर रही।
जुलाई 2026 में
- रुपया 94.97 से 96.26 रुपये प्रति डॉलर के बीच कारोबार करता रहा।
- 15 जुलाई 2026 को रुपया 96.26 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
इन आंकड़ों के जरिए सरकार ने बताया कि समय के साथ वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विनिमय दर में बदलाव स्वाभाविक प्रक्रिया है।
RBI जरूरत पड़ने पर करता है हस्तक्षेप
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) विदेशी मुद्रा बाजार पर लगातार नजर रखता है। यदि बाजार में अत्यधिक अस्थिरता या अचानक तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, तो RBI आवश्यक हस्तक्षेप करता है ताकि वित्तीय स्थिरता बनी रहे।
हालांकि, RBI का उद्देश्य किसी तय विनिमय दर को बनाए रखना नहीं बल्कि अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना होता है।
विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम
रुपये पर दबाव कम करने और विदेशी मुद्रा उपलब्धता बढ़ाने के लिए RBI और सरकार ने कई नीतिगत कदम उठाए हैं। इनमें शामिल हैं—
- कंपनियों को विदेशी बाजारों से आसानी से कर्ज लेने की सुविधा।
- विदेशी बाजारों में पूंजी जुटाने वाले वित्तीय साधनों का दायरा बढ़ाना।
- एनआरआई निवेशकों को बिना सेबी पंजीकरण वाली कुछ इक्विटी में अधिक निवेश की अनुमति।
- विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
इन उपायों का उद्देश्य विदेशी पूंजी प्रवाह को मजबूत करना और विदेशी मुद्रा बाजार में संतुलन बनाए रखना है।
भारत का बाहरी कर्ज कितना है?
वित्त मंत्रालय के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक भारत का कुल बाहरी कर्ज 762.8 अरब डॉलर रहा, जबकि मार्च 2025 में यह 736.4 अरब डॉलर था। यानी एक वर्ष में सीमित वृद्धि दर्ज की गई।
सरकार ने जोर देकर कहा कि भारत का बाहरी कर्ज पूरी तरह प्रबंधनीय है और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इसकी स्थिति मजबूत बनी हुई है।
साथ ही, डेब्ट सर्विस रेशियो 6.6 प्रतिशत से घटकर 5.8 प्रतिशत पर आ गया है, जो कर्ज भुगतान क्षमता में सुधार का संकेत माना जाता है।
विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत
सरकार ने बताया कि 12 जून 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 671.6 अरब डॉलर रहा।
यह भंडार—
- लगभग 10.3 महीने के आयात को कवर करने में सक्षम है।
- मार्च 2026 के कुल बाहरी कर्ज का लगभग 88 प्रतिशत कवर करता है।
मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार भारत को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बाहरी झटकों से निपटने में महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
क्या आम लोगों पर पड़ेगा असर?
रुपये की कमजोरी का असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। आयातित वस्तुएं, विशेषकर कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ औद्योगिक कच्चा माल महंगा हो सकता है। वहीं निर्यातकों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है क्योंकि भारतीय उत्पाद विदेशी बाजारों में अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं।
हालांकि सरकार का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है और विदेशी मुद्रा भंडार तथा बाहरी कर्ज की स्थिति को देखते हुए तत्काल किसी अतिरिक्त हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।


