Crude Oil Supply: भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने एक नया संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव के बीच अब रेड सी (लाल सागर) रूट पर भी अनिश्चितता बढ़ गई है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की समुद्री नाकेबंदी की धमकी ने वैश्विक तेल बाजार में नई चिंता पैदा कर दी है। यदि यह संकट गहराता है तो इसका असर सिर्फ सऊदी अरब से आने वाले कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के लिए बेहद अहम रूसी क्रूड ऑयल सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है।
भारत के सामने बढ़ी नई ऊर्जा चुनौती
मार्च 2026 से वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत को कई बार कच्चे तेल की सप्लाई और कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा है। इस दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए रूस, सऊदी अरब, इराक और अन्य देशों से तेल खरीद का संतुलित मॉडल अपनाया।
हालांकि अब हालात फिर चुनौतीपूर्ण होते दिख रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट में पहले से जारी बाधाओं के बीच रेड सी रूट पर नया खतरा भारत की तेल आपूर्ति के लिए गंभीर चिंता बन सकता है।
हूती विद्रोहियों की धमकी से क्यों बढ़ी चिंता?
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की चेतावनी दी है। हूती समूह का दावा है कि यह कदम यमन की राजधानी पर कथित घेराबंदी के जवाब में उठाया जा रहा है।
अगर यह धमकी वास्तविक कार्रवाई में बदलती है तो:
- सऊदी अरब के तेल निर्यात पर असर पड़ सकता है।
- रेड सी के जरिए होने वाली शिपिंग बाधित हो सकती है।
- वैश्विक तेल सप्लाई चेन पर नया दबाव बन सकता है।
- भारत समेत एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
फिर बढ़ सकती हैं कच्चे तेल की कीमतें
अमेरिका-ईरान तनाव के कारण पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा चुका है। हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जरूर आया है, लेकिन नए समुद्री संकट से कीमतों में फिर तेजी आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि:
- होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं बनी रहती हैं,
- और रेड सी में भी शिपिंग प्रभावित होती है,
तो वैश्विक बाजार में सप्लाई घटने की आशंका बढ़ जाएगी, जिससे तेल महंगा हो सकता है।
सऊदी अरब ने क्यों बदला था अपना एक्सपोर्ट रूट?
होर्मुज स्ट्रेट में जोखिम बढ़ने के बाद सऊदी अरब ने अपने तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा लाल सागर स्थित यानबू (Yanbu) बंदरगाह से भेजना शुरू किया।
रिपोर्टों के अनुसार पिछले महीने इस बंदरगाह से रिकॉर्ड 41.9 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की शिपमेंट हुई थी। इस बदलाव ने वैश्विक सप्लाई को काफी हद तक स्थिर बनाए रखने में मदद की।
लेकिन अब यही रास्ता भी खतरे में दिखाई दे रहा है क्योंकि रेड सी में हूती विद्रोही पहले भी कई व्यावसायिक जहाजों को निशाना बना चुके हैं।
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
रेड सी के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है।
यह जलमार्ग:
- हिंद महासागर को स्वेज नहर से जोड़ता है।
- पूर्व में यमन और पश्चिम में जिबूती तथा इरिट्रिया के बीच स्थित है।
- दुनिया के बड़े हिस्से के तेल, LNG, अनाज और उपभोक्ता सामान की आवाजाही का प्रमुख रास्ता है।
कुछ वर्षों पहले तक वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 15% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था।
2023 के बाद क्यों बढ़ गया खतरा?
साल 2023 में हूती विद्रोहियों द्वारा रेड सी में कमर्शियल जहाजों पर लगातार हमले शुरू होने के बाद कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों का रूट बदल दिया।
इसके चलते:
- जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर लगाना पड़ा।
- यात्रा का समय कई दिन बढ़ गया।
- माल ढुलाई (Freight) और बीमा लागत में तेज बढ़ोतरी हुई।
- वैश्विक सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव आया।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। रूस फिलहाल भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर है, जबकि सऊदी अरब भी शीर्ष आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है।
यदि सऊदी सप्लाई प्रभावित होती है तो:
- भारत के पास उपलब्ध सप्लाई विकल्प सीमित हो सकते हैं।
- तेल खरीद की लागत बढ़ सकती है।
- रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ेगा।
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
क्या रूसी तेल भी हो सकता है प्रभावित?
ऊर्जा बाजार विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल खतरा मुख्य रूप से सऊदी अरब से जुड़े जहाजों तक सीमित माना जा रहा है। बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही अभी सामान्य बनी हुई है।
हालांकि यदि संघर्ष बढ़ता है और पूरे रेड सी क्षेत्र में शिपिंग प्रभावित होती है तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता रूसी कच्चे तेल की सप्लाई होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट में बाधाओं के बाद भारत आने वाले रूसी तेल का बड़ा हिस्सा अब रेड सी रूट से होकर आता है। ऐसे में यदि यह मार्ग भी बाधित होता है तो:
- रूसी तेल की डिलीवरी में देरी हो सकती है।
- माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ेगी।
- रिफाइनरियों को महंगे विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है।
- घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत की रणनीति क्या हो सकती है?
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के पास फिलहाल कई विकल्प मौजूद हैं।
- रूस से दीर्घकालिक खरीद जारी रखना।
- इराक, यूएई और अमेरिका जैसे अन्य सप्लायर्स से आयात बढ़ाना।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का बेहतर उपयोग करना।
- वैकल्पिक समुद्री मार्गों और लॉजिस्टिक्स पर फोकस बढ़ाना।
इन कदमों से अल्पकालिक संकट का असर कम किया जा सकता है, लेकिन यदि रेड सी और होर्मुज दोनों क्षेत्रों में लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ी अस्थिरता देखने को मिल सकती है।


