US-China Agreement: अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुए समझौते के बावजूद चीन से अमेरिका को होने वाला रेयर-अर्थ मैग्नेट का निर्यात पहले के मुकाबले काफी कम बना हुआ है। यह स्थिति केवल दोनों देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के लिए भी बड़े रणनीतिक और आर्थिक अवसर लेकर आ सकती है।
ट्रंप-शी समझौते के बाद भी नहीं सुधरी स्थिति
अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर को कम करने के लिए दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच समझौता हुआ था। इस समझौते का सबसे अहम हिस्सा यह था कि चीन रेयर-अर्थ मैग्नेट और अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति सामान्य बनाए रखेगा।
लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि समझौते के बावजूद चीन ने अमेरिका को होने वाली सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं की है। इससे वॉशिंगटन में चिंता बढ़ गई है कि बीजिंग समझौते की भावना के अनुरूप कदम नहीं उठा रहा।
रेयर-अर्थ मैग्नेट क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
रेयर-अर्थ मैग्नेट आधुनिक उद्योगों की रीढ़ माने जाते हैं। इनका उपयोग कई हाई-टेक सेक्टर में होता है, जैसे—
- इलेक्ट्रिक वाहन (EV)
- विंड टर्बाइन
- सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स
- फैक्ट्री ऑटोमेशन
- रोबोटिक्स
- रक्षा उपकरण और मिसाइल सिस्टम
- एयरोस्पेस इंडस्ट्री
यदि इनकी सप्लाई बाधित होती है तो पूरी मैन्युफैक्चरिंग चेन प्रभावित हो सकती है।
चीन ने अमेरिका को कितना कम किया निर्यात?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कस्टम्स डेटा के हवाले से बताया गया है कि 2026 की पहली छमाही में अमेरिका को रेयर-अर्थ मैग्नेट की औसत मासिक शिपमेंट केवल 479 टन रही, जबकि 2022 से 2024 के बीच इसका औसत 586 टन प्रति माह था।
यानी मौजूदा निर्यात पहले के सामान्य स्तर की तुलना में लगभग 20% कम बना हुआ है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इन आंकड़ों में उन मैग्नेट को शामिल नहीं किया गया है जो तैयार उत्पादों के हिस्से के रूप में निर्यात किए जाते हैं।
अमेरिका क्यों है चिंतित?
व्हाइट हाउस और अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के अधिकारियों का मानना है कि चीन समझौते की अमेरिकी व्याख्या के अनुसार पूरी तरह पालन नहीं कर रहा है।
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने भी स्वीकार किया कि रेयर-अर्थ निर्यात को लेकर चीन का अनुपालन “पूरी तरह संतोषजनक नहीं” है।
हालांकि, ट्रंप प्रशासन फिलहाल इस विवाद को और ज्यादा बढ़ाने से बचता नजर आ रहा है ताकि दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया जारी रह सके।
चीन का दबदबा क्यों बना हुआ है?
दुनिया में रेयर-अर्थ मैग्नेट के उत्पादन और प्रोसेसिंग में चीन का दबदबा बेहद मजबूत है।
मुख्य कारण हैं—
- वैश्विक उत्पादन में 90% से अधिक हिस्सेदारी
- विशाल प्रोसेसिंग क्षमता
- स्थापित सप्लाई चेन
- कम उत्पादन लागत
- सरकारी समर्थन
इसी वजह से अमेरिका समेत कई विकसित देश अभी भी चीन पर काफी हद तक निर्भर हैं।
अमेरिका के सामने क्या चुनौती है?
अमेरिका लंबे समय से चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करना आसान नहीं है।
नई खदानें विकसित करने, प्रोसेसिंग प्लांट लगाने और मैग्नेट निर्माण क्षमता बढ़ाने में कई वर्षों का समय और अरबों डॉलर का निवेश लगेगा।
तब तक अमेरिकी ऑटोमोबाइल, रक्षा और हाई-टेक उद्योगों को चीन से आने वाली सप्लाई पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ेगा।
भारत के लिए क्या है बड़ा अवसर?
अमेरिका-चीन के बीच जारी तनाव भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक अवसर बन सकता है।
1. ‘चाइना+1’ रणनीति को मिलेगा बढ़ावा
दुनियाभर की कंपनियां चीन के विकल्प की तलाश कर रही हैं। भारत इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है।
2. विदेशी निवेश बढ़ सकता है
रेयर-अर्थ खनन, प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण में अमेरिका, जापान और यूरोपीय कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा सकती हैं।
3. मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का मौका
यदि भारत समय रहते इंफ्रास्ट्रक्चर और नीतिगत सुधार करता है, तो वह वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
4. रक्षा क्षेत्र को मिलेगा फायदा
रेयर-अर्थ की घरेलू उपलब्धता बढ़ने से भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता घट सकती है।
5. इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को मिलेगा समर्थन
EV, बैटरी और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए आवश्यक मैग्नेट देश में बनने लगें तो उत्पादन लागत और सप्लाई जोखिम दोनों कम हो सकते हैं।
भारत को किन क्षेत्रों पर करना होगा फोकस?
भारत इस अवसर का पूरा लाभ तभी उठा सकेगा जब वह—
- रेयर-अर्थ खनन को बढ़ावा दे।
- प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग क्षमता विकसित करे।
- मैग्नेट निर्माण उद्योग में निवेश आकर्षित करे।
- वैश्विक कंपनियों के साथ तकनीकी साझेदारी बढ़ाए।
- नीतिगत मंजूरियों और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाए।
निष्कर्ष
अमेरिका और चीन के बीच हुआ व्यापारिक समझौता अभी जमीन पर पूरी तरह सफल होता नहीं दिख रहा। चीन से अमेरिका को रेयर-अर्थ मैग्नेट की आपूर्ति अब भी पहले के स्तर से काफी कम है, जिससे दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आती है। दूसरी ओर, यह स्थिति भारत के लिए वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका मजबूत करने का सुनहरा अवसर लेकर आई है। यदि भारत रेयर-अर्थ, मैन्युफैक्चरिंग और हाई-टेक उत्पादन में तेजी से निवेश आकर्षित करता है, तो आने वाले वर्षों में वह चीन के विकल्प के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।


