India UK Trade Deal: भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) 15 जुलाई से लागू हो चुका है। इस समझौते को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। एक पक्ष इसे भारत के निर्यात, निवेश और रोजगार के लिए बड़ा अवसर मान रहा है, जबकि कई अर्थशास्त्री, इतिहासकार और व्यापार नीति विशेषज्ञ इसे भारत के औपनिवेशिक इतिहास के संदर्भ में देखने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि मुक्त व्यापार (Free Trade) हमेशा समान और न्यायसंगत परिणाम नहीं देता, इसलिए इस समझौते के दीर्घकालिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन जरूरी है।
India-UK Trade Deal पर क्यों हो रही है बहस?
दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित एक परिचर्चा “Terms of Trade: India, Britain, and the Long Shadow of Empire” में इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों और व्यापार विशेषज्ञों ने भारत-यूके व्यापार समझौते पर अपने विचार रखे।
विशेषज्ञों का कहना था कि भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंधों को केवल आर्थिक या कूटनीतिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। दोनों देशों का साझा औपनिवेशिक इतिहास आज भी आर्थिक नीतियों और व्यापारिक सोच को प्रभावित करता है।
“मुक्त व्यापार हमेशा न्यायसंगत नहीं होता”
इतिहासकार प्रभु मोहापात्रा ने कहा कि भारत का औपनिवेशिक अनुभव यह दिखाता है कि Free Trade System हर बार समान अवसर और न्यायपूर्ण परिणाम नहीं देता।
उनके अनुसार, 1833 के बाद भारत में लागू तथाकथित मुक्त व्यापार व्यवस्था में भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक शोषण हुआ। उस समय भारतीय वस्तुओं पर अपेक्षाकृत कम शुल्क लगाया जाता था, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में लगभग शून्य आयात शुल्क पर आते थे। इससे भारतीय उद्योगों और कारीगरों को भारी नुकसान हुआ।
उन्होंने कहा कि उस दौर में भारत को ब्रिटेन की आर्थिक जरूरतों के अनुसार कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले केंद्र के रूप में विकसित किया गया। इसमें नील की खेती करने वाले किसान, अफीम उत्पादक, मजदूर और गिरमिटिया श्रमिक जैसी बड़ी आबादी शामिल थी।
East India Company के आने से पहले भारत कितना मजबूत था?
इस परिचर्चा में अर्थशास्त्री चरण सिंह ने भारत की ऐतिहासिक आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि जब East India Company भारत आई थी, तब दुनिया की कुल GDP में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25% थी।
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन समाप्त होने तक यह हिस्सेदारी घटकर करीब 1% रह गई। आज भारत वैश्विक GDP में लगभग 4% की हिस्सेदारी रखता है, लेकिन यह अभी भी उस ऐतिहासिक स्थिति से काफी कम है।
उनका तर्क था कि भारत और ब्रिटेन के बीच आर्थिक क्षमता और प्रति व्यक्ति आय में बड़ा अंतर होने के कारण दोनों देशों के बीच पूरी तरह समान प्रतिस्पर्धा (Level Playing Field) संभव नहीं मानी जा सकती।
“यूके को व्यापार की शर्तें तय करने का फायदा मिल सकता है”
चरण सिंह का कहना था कि ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति आय भारत से कई गुना अधिक है। ऐसे में व्यापार वार्ता में आर्थिक रूप से मजबूत देश के पास अधिक प्रभाव रहता है।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि व्यापारिक शर्तों का संतुलन सही तरीके से नहीं बनाया गया तो भविष्य में ब्रिटेन को अधिक लाभ मिल सकता है, जबकि भारत को अपनी शर्तों पर बातचीत करने की सीमित गुंजाइश मिलेगी।
अब व्यापार केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं
इंटरनेशनल ट्रेड पॉलिसी विशेषज्ञ अभिजीत दास ने कहा कि आधुनिक व्यापार समझौते अब केवल वस्तुओं और सेवाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं।
उन्होंने कहा कि आज डेटा (Data) वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण संसाधन बन चुका है। डिजिटल अर्थव्यवस्था में डेटा को अक्सर “New Oil” कहा जाता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक है। ऐसे में किसी भी व्यापार समझौते में डेटा गवर्नेंस और डेटा एक्सेस से जुड़े प्रावधानों का भारत की आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक हितों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
समझौते की पारदर्शिता पर भी उठे सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने व्यापार समझौते की पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
उनका कहना था कि ऐसे महत्वपूर्ण समझौतों का पूरा पाठ सार्वजनिक होना चाहिए ताकि नागरिक यह जान सकें कि उनकी ओर से किन शर्तों पर सहमति दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि कई देशों में ऐसे समझौते संसद में चर्चा और अनुमोदन के बाद लागू किए जाते हैं।
सरकार और समर्थकों का क्या पक्ष है?
दूसरी ओर, सरकार और कई उद्योग संगठनों का मानना है कि भारत-यूके CETA से भारतीय निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलेगा।
समर्थकों के अनुसार इस समझौते से—
- भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी।
- टेक्सटाइल, ऑटो कंपोनेंट, जेम्स एंड ज्वेलरी, कृषि और इंजीनियरिंग सेक्टर को फायदा हो सकता है।
- दोनों देशों के बीच निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
- सेवाओं और पेशेवरों की आवाजाही भी आसान हो सकती है।
निष्कर्ष
भारत-यूके कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) को लेकर फिलहाल दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने हैं। एक पक्ष इसे भारत की वैश्विक व्यापारिक स्थिति मजबूत करने वाला समझौता मानता है, जबकि दूसरा पक्ष औपनिवेशिक इतिहास, आर्थिक असमानता, डेटा संप्रभुता और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की मांग कर रहा है।
आने वाले वर्षों में इस समझौते का वास्तविक प्रभाव भारत के निर्यात, निवेश, रोजगार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कैसा पड़ता है, यही इसकी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना होगा।


