नई दिल्ली: इस साल की शुरुआत में चीन ने भारत से भेजी गई गैर-बासमती चावल की कई खेपों को कथित तौर पर जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गनिज़्म (GMO) होने का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया था। अब हालात पलटते नजर आ रहे हैं। यूरोपीय यूनियन (EU) ने चीन से भेजे गए चावल के आटे (Rice Flour) की एक खेप में GMO तत्व मिलने के बाद उसे वापस लौटा दिया है। इस घटनाक्रम ने चीन की व्यापारिक विश्वसनीयता और उसके दोहरे मापदंडों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
Highlights
- EU ने चीन से आए चावल के आटे की खेप को लौटाया।
- जांच में जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गनिज़्म (GMO) के संकेत मिले।
- चीन पहले भारत के गैर-बासमती चावल की करीब 70 खेपों को लौटा चुका है।
- विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला वैश्विक कृषि व्यापार में गुणवत्ता मानकों की अहमियत दिखाता है।
EU ने क्यों लौटाई चीन की चावल की खेप?
यूरोपीय यूनियन के Rapid Alert System for Food and Feed (RASFF) के अनुसार, चीन से भेजे गए हाइड्रोलाइज्ड राइस फ्लोर की एक खेप में Genetically Modified Organisms (GMOs) से जुड़े संकेत पाए गए। इसके बाद EU ने सुरक्षा मानकों का हवाला देते हुए इस खेप को अस्वीकार कर वापस भेज दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह खेप नीदरलैंड्स पहुंची थी, जहां जांच के दौरान इसमें 35S Promoter और T-Nos जैसे जेनेटिक मार्कर पाए गए। इन्हें कई प्रकार की जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों की पहचान के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
क्या हैं 35S Promoter और T-Nos?
विशेषज्ञों के मुताबिक:
- 35S Promoter कॉलीफ्लावर मोजेक वायरस (Cauliflower Mosaic Virus) से प्राप्त एक जेनेटिक तत्व है, जिसका उपयोग पौधों में डाले गए जीन को लगातार सक्रिय रखने के लिए किया जाता है।
- T-Nos (Nopaline Synthase Terminator) एक जेनेटिक सीक्वेंस है, जो Agrobacterium tumefaciens नामक मिट्टी के बैक्टीरिया से लिया जाता है और GM फसलों में जीन की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होता है।
इन दोनों मार्करों की मौजूदगी कई मामलों में GMO सामग्री की जांच का आधार बनती है।
चीन ने भारत की चावल खेपों को भी किया था खारिज
यह घटनाक्रम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसी वर्ष चीन ने भारत से भेजी गई करीब 70 गैर-बासमती चावल की खेपों को GMO होने का दावा करते हुए अस्वीकार कर दिया था।
भारत का कहना रहा है कि देश में व्यावसायिक स्तर पर GM चावल की खेती की अनुमति नहीं है। भारतीय निर्यातकों का यह भी दावा था कि जिन शिपमेंट्स को चीन ने बाद में खारिज किया, उन्हें पहले चीन की ही संबंधित एजेंसियों ने निर्यात के लिए मंजूरी दी थी।
इस वजह से भारतीय निर्यातकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता भी बढ़ी।
पहले भी चीनी राइस प्रोडक्ट्स पर लग चुकी हैं रोक
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में बताया गया है कि यूरोपीय यूनियन पहले भी चीन से आने वाले राइस नूडल्स और ब्लैक राइस फ्लोर की खेपों को GMO संबंधी कारणों से अस्वीकार कर चुका है।
अध्ययन के अनुसार, 2001 से 2017 के बीच RASFF के तहत लगाए गए खाद्य सुरक्षा प्रतिबंधों का चीन के चावल आधारित उत्पादों के यूरोपीय निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। हालांकि वैश्विक स्तर पर चीन का निर्यात बढ़ा, लेकिन 2008 के बाद EU को होने वाले निर्यात में गिरावट दर्ज की गई।
वैश्विक व्यापार के लिए क्या है इसका महत्व?
यह मामला दिखाता है कि कृषि और खाद्य उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण है। अलग-अलग देशों द्वारा लागू किए जाने वाले सख्त परीक्षण और नियम निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
साथ ही, यह घटनाक्रम इस बात की भी याद दिलाता है कि जब कोई देश दूसरे देशों के उत्पादों पर सख्त मानक लागू करता है, तो उसे अपने निर्यात के लिए भी उन्हीं मानकों का पालन करना पड़ता है।


