नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते (Trade Deal) की चर्चाओं के बीच प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन का एक बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि बदलते वैश्विक आर्थिक हालात में भारत को केवल अमेरिका और पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बजाय चीन के साथ आर्थिक और कारोबारी रिश्तों को मजबूत करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में राकेश मोहन ने कहा कि अमेरिका की व्यापार नीतियां लगातार बदल रही हैं, जिससे वह पहले जैसा भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार नहीं रह गया है। ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक रणनीति में बदलाव करते हुए एशिया की सप्लाई चेन में मजबूत भूमिका निभानी चाहिए।
अमेरिका पर निर्भरता कम करने की सलाह
राकेश मोहन का कहना है कि अमेरिका की टैरिफ और व्यापार नीतियों में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इससे वैश्विक कंपनियों और व्यापारिक साझेदारों के लिए अनिश्चितता बढ़ी है।
उनके मुताबिक भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में प्रयास जारी रखने चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भी आर्थिक संबंध मजबूत करने होंगे। उनका मानना है कि एशियाई सप्लाई चेन का हिस्सा बनना भारत के लिए लंबे समय में अधिक लाभदायक साबित हो सकता है।
चीन के निवेश से मिल सकते हैं बड़े फायदे
राकेश मोहन ने कहा कि भारत को चीन का रास्ता रोकने के बजाय उसकी पूंजी, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से कपड़ा, जूता और फर्नीचर उद्योग का उदाहरण देते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में चीनी निवेश आने से भारत में लाखों नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और निर्यात को भी मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि नियंत्रित और संतुलित तरीके से चीनी निवेश को अनुमति दी जाए तो भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को तेजी से विस्तार दे सकता है।
चीन के साथ व्यापार में भारी असंतुलन
भारत और चीन के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह संतुलित नहीं है।
साल 2025-26 के दौरान भारत ने चीन से 130 अरब डॉलर से अधिक का सामान आयात किया, जबकि चीन को भारतीय निर्यात काफी कम रहा। इस वजह से व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है।
राकेश मोहन का कहना है कि भारत को ऐसे उत्पादों की पहचान करनी होगी जिन्हें चीन के बाजार में अधिक मात्रा में निर्यात किया जा सके। इससे व्यापार घाटा कम करने में मदद मिलेगी।
एशिया की सप्लाई चेन से जुड़ना जरूरी
पूर्व RBI डिप्टी गवर्नर का मानना है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एशिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) और CPTPP (Comprehensive and Progressive Agreement for Trans-Pacific Partnership) जैसे बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में शामिल होने की संभावनाओं पर दोबारा विचार करना चाहिए।
उनके अनुसार यदि भारत इन व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा बनता है तो भारतीय उद्योगों को नए बाजार, निवेश और निर्यात के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
गलवान के बाद बदला था भारत का रुख
साल 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई सैन्य झड़प के बाद केंद्र सरकार ने चीनी निवेश और कंपनियों पर कई सख्त कदम उठाए थे।
इसी दौरान प्रेस नोट-3 लागू किया गया, जिसके तहत भारत से भूमि सीमा साझा करने वाले देशों, विशेष रूप से चीन, से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई।
इसके अलावा कई चीनी मोबाइल एप्स पर प्रतिबंध लगाया गया और निवेश प्रस्तावों की गहन जांच शुरू हुई।
अब अपनाया जा रहा है ‘पार्टनरशिप मॉडल’
हाल के महीनों में सरकार का रुख कुछ हद तक व्यावहारिक दिखाई दे रहा है।
अब पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसे निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें तकनीक चीन की हो लेकिन स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय कंपनियों के पास रहे।
हाल ही में चीनी स्मार्टफोन कंपनी Vivo और भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता Dixon Technologies के बीच साझेदारी को मंजूरी मिलना इसी रणनीति का उदाहरण माना जा रहा है।
इसके अलावा दोनों देशों के बीच बिजनेस वीजा और सीधी उड़ानों को भी धीरे-धीरे आसान बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
भारत-चीन व्यापार के ताजा आंकड़े
साल 2026 की पहली छमाही के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—
- कुल द्विपक्षीय व्यापार: लगभग 91.72 अरब डॉलर
- चीन से भारत का आयात: 79.41 अरब डॉलर
- भारत का चीन को निर्यात: 12.31 अरब डॉलर
- व्यापार घाटा: 67.10 अरब डॉलर
- व्यापार वृद्धि: करीब 23.6%
ये आंकड़े बताते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसका अधिकांश लाभ फिलहाल चीन को मिल रहा है।
विशेषज्ञों की राय
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत अब सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की रणनीति अपना रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि चीनी निवेश को स्पष्ट नियमों और सुरक्षा मानकों के साथ अनुमति दी जाती है, तो इससे भारत में मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार, तकनीकी हस्तांतरण और निर्यात को नई गति मिल सकती है। वहीं रणनीतिक क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों का नियंत्रण बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी रहेगा।
निष्कर्ष
राकेश मोहन का बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था तेजी से बदल रही है और भारत अमेरिका सहित कई देशों के साथ नए व्यापार समझौतों पर काम कर रहा है। उनका सुझाव यह संकेत देता है कि भारत को आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने के बजाय संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनानी चाहिए। हालांकि अंतिम फैसला सरकार की आर्थिक, रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।


