Indus Waters Treaty: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी विवाद अब पाकिस्तान पर आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत द्वारा मध्यस्थता प्रक्रिया से दूरी बनाए जाने के बाद पाकिस्तान न सिर्फ अपना बल्कि भारत के हिस्से का भी आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) खर्च वहन कर रहा है। अब तक इस प्रक्रिया में पाकिस्तान 6 लाख डॉलर (600,000 डॉलर) से अधिक खर्च कर चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि मामला लंबा खिंचने पर यह राशि और बढ़ सकती है।
Highlights
- पाकिस्तान अब तक 6 लाख डॉलर से अधिक का मध्यस्थता खर्च उठा चुका है।
- भारत के प्रक्रिया से अलग रहने के कारण दोनों देशों के हिस्से का खर्च पाकिस्तान पर पड़ा।
- विवाद किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर है।
- भारत ने PCA के अधिकार क्षेत्र को मानने से इनकार किया है।
- मामले के आगे बढ़ने पर पाकिस्तान का आर्थिक बोझ और बढ़ सकता है।
क्या है सिंधु जल संधि विवाद?
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस संधि के तहत दोनों देशों के बीच सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग के नियम तय किए गए थे।
हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई। उसका आरोप है कि ये परियोजनाएं संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं। वहीं भारत का कहना है कि ये परियोजनाएं पूरी तरह संधि के अनुरूप हैं और तकनीकी विवादों का समाधान न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए होना चाहिए, न कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण के माध्यम से।
भारत ने क्यों बनाई दूरी?
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित (Abeyance) रखने का फैसला किया और मध्यस्थता प्रक्रिया में अपनी भागीदारी रोक दी।
भारत का स्पष्ट रुख है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि से जुड़ी सामान्य प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
इसके बावजूद पाकिस्तान ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) में कार्यवाही जारी रखी, जिससे अब उसे दोनों देशों के हिस्से का प्रशासनिक और मध्यस्थता खर्च उठाना पड़ रहा है।
क्यों बढ़ गया पाकिस्तान का खर्च?
सिंधु जल संधि के नियमों के मुताबिक, यदि किसी विवाद पर मध्यस्थता होती है तो उसका खर्च सामान्य तौर पर भारत और पाकिस्तान बराबर-बराबर वहन करते हैं।
लेकिन भारत के कार्यवाही में शामिल नहीं होने के कारण पाकिस्तान को:
- अपना हिस्सा भी देना पड़ रहा है।
- भारत के हिस्से की लागत भी वहन करनी पड़ रही है।
- जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ेगी, कुल खर्च में और बढ़ोतरी होने की संभावना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक पाकिस्तान इस प्रक्रिया पर 6 लाख डॉलर से अधिक खर्च कर चुका है।
PCA की वैधता पर भारत का रुख
भारत ने शुरुआत से ही परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए हैं। भारत का कहना है कि यह न्यायाधिकरण संधि के प्रावधानों के अनुरूप गठित नहीं किया गया और इसलिए इसके किसी भी निर्णय को भारत मान्यता नहीं देगा।
भारत का यह भी तर्क है कि एक ही विवाद पर न्यूट्रल एक्सपर्ट और कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की समानांतर प्रक्रिया चलाना संधि की मूल भावना के खिलाफ है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता नियमों के तहत यदि कोई पक्ष कार्यवाही में शामिल नहीं होता, तब भी ट्रिब्यूनल सुनवाई जारी रख सकता है। इसी आधार पर PCA ने पाकिस्तान की याचिका पर सुनवाई जारी रखी है।
पाकिस्तान पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान इस मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे भी जारी रखता है और भारत अपनी भागीदारी से दूर रहता है, तो पाकिस्तान को लगातार दोनों पक्षों का खर्च उठाना पड़ सकता है। इससे पहले से आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे पाकिस्तान पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ने की संभावना है।
भारत का रुख क्या है?
भारत का कहना है कि:
- किशनगंगा और रतले परियोजनाएं संधि के अनुरूप हैं।
- तकनीकी विवादों का समाधान न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए होना चाहिए।
- PCA के अधिकार क्षेत्र को भारत स्वीकार नहीं करता।
- आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना सिंधु जल संधि की सामान्य प्रक्रिया बहाल नहीं की जाएगी।
निष्कर्ष
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद अभी समाप्त होने के संकेत नहीं हैं। भारत के मध्यस्थता प्रक्रिया से अलग रहने के बाद पाकिस्तान पर कानूनी और वित्तीय बोझ बढ़ गया है। आने वाले समय में यदि यह मामला लंबा चलता है, तो पाकिस्तान को मध्यस्थता पर और अधिक खर्च करना पड़ सकता है, जबकि भारत अपने कानूनी रुख पर कायम है।


