Middle East Oil Pipeline Projects: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर बढ़ते जोखिमों ने खाड़ी देशों को तेल निर्यात के नए रास्ते विकसित करने के लिए मजबूर कर दिया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और इराक जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश ऐसे पाइपलाइन और पोर्ट प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रहे हैं, जिनके जरिए तेल को होर्मुज से गुजरे बिना सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंचाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये परियोजनाएं तय समय पर पूरी हो जाती हैं, तो 2027 के अंत तक खाड़ी क्षेत्र के 45% से अधिक तेल निर्यात को होर्मुज से जुड़े जोखिमों से बचाया जा सकेगा। वहीं 2028 तक यह आंकड़ा 60% से भी अधिक पहुंच सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों को मिलेगा, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर हैं।
क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्ग माना जाता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर एशिया और यूरोप तक पहुंचता है।
जब भी इस क्षेत्र में युद्ध, सैन्य तनाव या समुद्री सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं होती हैं, तब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिलता है। यही वजह है कि खाड़ी देश अब ऐसे वैकल्पिक मार्ग विकसित कर रहे हैं, जिनसे तेल आपूर्ति बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
1. UAE की वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन
संयुक्त अरब अमीरात की अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) फुजैराह तक जाने वाली वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन का विस्तार कर रही है।
इस परियोजना की खास बातें
- फुजैराह बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है।
- परियोजना का लगभग आधा काम पूरा हो चुका है।
- 2027 तक इसके पूरा होने की संभावना है।
- पूरा होने के बाद फुजैराह से तेल निर्यात क्षमता लगभग दोगुनी हो जाएगी।
- यहां से तेल टैंकर सीधे अरब सागर और हिंद महासागर की ओर जा सकेंगे।
भारत के लिए यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे भारतीय रिफाइनरियों तक तेल अपेक्षाकृत सुरक्षित और तेज मार्ग से पहुंच सकेगा।
2. सऊदी अरब की East-West Petroline
सऊदी अरब की प्रसिद्ध East-West Petroline पहले से ही होर्मुज का सबसे बड़ा विकल्प मानी जाती है।
इसकी प्रमुख विशेषताएं
- लंबाई लगभग 1,200 किलोमीटर
- निर्माण 1980 के दशक में
- अबकैक ऑयल फील्ड से यानबू (Yanbu) बंदरगाह तक तेल पहुंचाती है।
- क्षमता लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन
यह पाइपलाइन लाल सागर तक सीधे तेल पहुंचाती है, जिससे सऊदी अरब को होर्मुज पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
3. UAE का नया डीप-सी पोर्ट
संयुक्त अरब अमीरात अपने पूर्वी तट पर एक नया गहरे पानी वाला बंदरगाह विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है।
इस परियोजना का उद्देश्य है—
- बड़े ऑयल टैंकरों को सीधे अरब सागर तक पहुंचाना।
- होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की जरूरत खत्म करना।
- तेल और अन्य कार्गो की सप्लाई को अधिक सुरक्षित बनाना।
यह पोर्ट भविष्य में पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा निर्यात केंद्र बन सकता है।
4. इराक की बसरा-हदीथा पाइपलाइन
इराक भी अपनी तेल आपूर्ति को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए नई पाइपलाइन विकसित कर रहा है।
परियोजना की मुख्य बातें
- लंबाई लगभग 685 किलोमीटर
- अनुमानित लागत 4.6 से 5 अरब डॉलर
- क्षमता 22.5 लाख बैरल प्रतिदिन
इस परियोजना के जरिए इराक भविष्य में अपने तेल निर्यात के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार करना चाहता है।
5. इराक-जॉर्डन अकाबा पाइपलाइन
इराक और जॉर्डन के बीच प्रस्तावित Iraq-Jordan Export Pipeline (IJEP) पर कई वर्षों से चर्चा चल रही है।
यदि यह परियोजना पूरी होती है तो—
- बसरा से सीधे जॉर्डन के अकाबा बंदरगाह तक तेल पहुंचेगा।
- प्रतिदिन लगभग 22.5 लाख बैरल तेल की ढुलाई संभव होगी।
- तेल सीधे लाल सागर के रास्ते वैश्विक बाजारों तक पहुंच सकेगा।
हालांकि इस परियोजना में कई बार देरी हो चुकी है, लेकिन इसे अब भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत को क्या होगा फायदा?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।
यदि इन वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह परियोजनाओं का नेटवर्क तैयार हो जाता है तो—
- होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम होगी।
- युद्ध या समुद्री तनाव के दौरान भी तेल आपूर्ति जारी रह सकेगी।
- सप्लाई बाधित होने का जोखिम घटेगा।
- वैश्विक तेल कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की संभावना कम होगी।
- भारतीय रिफाइनरियों को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई मिलेगी।
वैश्विक ऊर्जा बाजार का बदल सकता है भूगोल
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में तेल व्यापार का नक्शा बदल सकता है। अभी तक होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक तेल आपूर्ति की सबसे बड़ी लाइफलाइन माना जाता रहा है, लेकिन नए पाइपलाइन नेटवर्क और आधुनिक बंदरगाहों के विकसित होने से खाड़ी देशों के पास कई वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध होंगे।
यदि ये सभी परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, तेल सप्लाई अधिक स्थिर बनेगी और भारत सहित एशिया के प्रमुख आयातक देशों को इसका दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।


