नई दिल्ली: खरीफ सीजन भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जाता है। जुलाई का महीना धान, दलहन, तिलहन, कपास और अन्य प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। लेकिन इस वर्ष कमजोर मानसून और कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश ने खेती की रफ्तार पर बड़ा असर डाला है। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार 10 जुलाई तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले साल की तुलना में करीब 16% कम रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका असर केवल किसानों की आय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य महंगाई, आयात-निर्यात और देश की अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है।
Highlights
- 10 जुलाई तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई में करीब 16% की गिरावट
- धान, दलहन, तिलहन और कपास के रकबे में उल्लेखनीय कमी
- कमजोर मानसून और कम बारिश बनी प्रमुख वजह
- किसानों की आय, खाद्य उत्पादन और निर्यात पर पड़ सकता है असर
- दाल और खाद्य तेलों के आयात में बढ़ोतरी की आशंका
16% घटा खरीफ फसलों का कुल रकबा
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 10 जुलाई तक खरीफ फसलों की बुवाई 531.25 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 632.69 लाख हेक्टेयर था। यानी कुल बुवाई क्षेत्र में लगभग 101 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
खरीफ सीजन भारत के कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा तय करता है। ऐसे में शुरुआती दौर में बुवाई का कम होना आने वाले महीनों में उत्पादन पर दबाव बढ़ा सकता है।
धान की बुवाई में भी आई गिरावट
देश की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल धान की बुवाई भी इस बार कमजोर रही है।
- 2025: 125.53 लाख हेक्टेयर
- 2026: 114.69 लाख हेक्टेयर
यानी धान की बुवाई में लगभग 8.6% की कमी दर्ज की गई है।
धान भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार है और देश विश्व के सबसे बड़े चावल निर्यातकों में शामिल है। ऐसे में उत्पादन घटने की स्थिति में घरेलू कीमतों और निर्यात दोनों पर असर पड़ सकता है।
गन्ने की खेती में दिखी मामूली बढ़त
जहां अधिकांश फसलों का रकबा घटा है, वहीं गन्ने की खेती में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
- पिछले वर्ष: 56.72 लाख हेक्टेयर
- इस वर्ष: 57.58 लाख हेक्टेयर
यानी गन्ने के रकबे में करीब 1.5% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दलहन और तिलहन की खेती में बड़ी गिरावट
सबसे ज्यादा चिंता दलहन और तिलहन फसलों को लेकर जताई जा रही है।
दलहन
- पिछले वर्ष: 73.85 लाख हेक्टेयर
- इस वर्ष: 56.63 लाख हेक्टेयर
तिलहन
- पिछले वर्ष: 149.18 लाख हेक्टेयर
- इस वर्ष: 117.83 लाख हेक्टेयर
भारत पहले से ही अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दाल और खाद्य तेल आयात करता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन कम होने पर आयात बिल और बढ़ सकता है।
नकदी फसलों की खेती भी घटी
कम बारिश का असर किसानों की कमाई वाली प्रमुख नकदी फसलों पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
| फसल | पिछले वर्ष | इस वर्ष |
|---|---|---|
| कपास | 94.00 लाख हेक्टेयर | 79.54 लाख हेक्टेयर |
| सोयाबीन | 107.72 लाख हेक्टेयर | 90.51 लाख हेक्टेयर |
| मूंगफली | 35.45 लाख हेक्टेयर | 23.40 लाख हेक्टेयर |
इसके अलावा अरहर, उड़द और तिल जैसी फसलों के रकबे में भी कमी दर्ज की गई है।
किसानों की आय पर कैसे पड़ेगा असर?
खरीफ सीजन की फसलें देश के करोड़ों किसानों की आय का प्रमुख स्रोत होती हैं। यदि बुवाई कम होती है तो कई किसानों को कम उत्पादन मिलेगा, जिससे उनकी आमदनी प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा यदि मौसम लंबे समय तक अनुकूल नहीं रहा तो—
- प्रति हेक्टेयर उत्पादन घट सकता है।
- कृषि लागत बढ़ सकती है।
- किसानों का मुनाफा कम हो सकता है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
अर्थव्यवस्था पर क्या हो सकता है प्रभाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र में कमजोरी का असर पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई दे सकता है।
संभावित प्रभाव:
- खाद्यान्न उत्पादन में कमी
- दाल और खाद्य तेलों के आयात में वृद्धि
- खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा
- सरकार पर आयात और खाद्य प्रबंधन का अतिरिक्त बोझ
- कृषि आधारित उद्योगों पर असर
- ग्रामीण मांग में कमजोरी
भारत पहले ही खाद्य तेलों और कई दालों के लिए आयात पर निर्भर है। यदि घरेलू उत्पादन कम रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार से अधिक खरीद करनी पड़ सकती है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भी दबाव बढ़ सकता है।
क्या आगे सुधर सकती है स्थिति?
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई के दूसरे पखवाड़े और अगस्त में अच्छी बारिश होती है तो कुछ फसलों की देर से बुवाई संभव है और नुकसान की भरपाई आंशिक रूप से हो सकती है। हालांकि लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रहने पर उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
निष्कर्ष
कमजोर मानसून ने इस साल खरीफ सीजन की शुरुआत को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। धान, दलहन, तिलहन और नकदी फसलों की बुवाई में आई गिरावट केवल कृषि क्षेत्र की चिंता नहीं है, बल्कि इसका असर खाद्य महंगाई, किसानों की आय, आयात-निर्यात और देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है। अब सभी की निगाहें आने वाले हफ्तों में मानसून की स्थिति और सरकार के कृषि प्रबंधन कदमों पर टिकी हैं।


