भारत में जल संरक्षण और सिंचाई के क्षेत्र में एक नई तकनीकी क्रांति की शुरुआत होने जा रही है। अब तक देश में कंक्रीट और सीमेंट से बने बांधों का निर्माण होता रहा है, लेकिन पहली बार रबर ब्लैडर तकनीक का इस्तेमाल करते हुए हवा से भरने वाले (Inflatable) रबर डैम बनाए जा रहे हैं। गुजरात सरकार ने दक्षिण कोरिया की आधुनिक तकनीक के सहयोग से दो ऐसे प्रोजेक्ट शुरू किए हैं, जिनकी कुल लागत 162 करोड़ रुपये से अधिक है।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल पानी का भंडारण बढ़ाना नहीं है, बल्कि सिंचाई, भूजल रिचार्ज, बाढ़ नियंत्रण और ग्रामीण जल आपूर्ति को भी मजबूत बनाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में देश के कई राज्यों में भी इसी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
गुजरात में बन रहे हैं भारत के पहले दो रबर डैम
राज्य सरकार के अनुसार पहला रबर डैम छोटा उदयपुर जिले के बोदेली तालुका में हेरन नदी पर राजवासना रबर डैम के रूप में बनाया जा रहा है। वहीं दूसरा डैम तापी जिले के डोलवन तालुका में अंबिका नदी पर पाठकवाड़ी रबर डैम के रूप में विकसित किया जा रहा है।
दोनों परियोजनाओं में कुल मिलाकर ₹162 करोड़ से अधिक का निवेश किया गया है। इनका उद्देश्य दूरदराज़ क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘कैच द रेन’ अभियान को मजबूती देना भी है।
क्या होती है रबर डैम तकनीक?
रबर डैम पारंपरिक कंक्रीट बांधों से पूरी तरह अलग होते हैं। इनमें नदी के ऊपर एक बेहद मजबूत रबर ब्लैडर लगाया जाता है, जिसमें आवश्यकता के अनुसार हवा या पानी भरा जाता है।
जब पानी रोकना होता है तो ब्लैडर को फुलाकर ऊंचा कर दिया जाता है और नदी का पानी रुककर जलाशय का रूप ले लेता है। वहीं अधिक बारिश या बाढ़ की स्थिति में ब्लैडर की हवा निकाल दी जाती है, जिससे पूरा ढांचा नीचे बैठ जाता है और अतिरिक्त पानी बिना किसी रुकावट के बह जाता है।
यही विशेषता इसे पारंपरिक चेक डैम और वियर से कहीं अधिक लचीला और सुरक्षित बनाती है।
राजवासना रबर डैम पर खर्च होंगे ₹82.97 करोड़
राजवासना परियोजना की अनुमानित लागत ₹82.97 करोड़ रखी गई है। इसे लगभग 30 महीने में पूरा करने का लक्ष्य है और सितंबर 2027 तक इसके तैयार होने की उम्मीद है।
इस परियोजना के तहत हेरन नदी पर 180 मीटर लंबा और 3.5 मीटर ऊंचा एयर-फिल्ड रबर ब्लैडर लगाया जाएगा।
इससे बांध की जल भंडारण क्षमता बढ़कर करीब 3.5 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) तक पहुंच जाएगी।
निर्माण कार्य का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा चुका है।
25 गांवों के किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना से आसपास के 25 गांवों के किसानों को बड़ा फायदा होगा।
मुख्य लाभ इस प्रकार होंगे—
- लगभग 3,420 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा।
- भूजल स्तर में सुधार होगा।
- पेयजल उपलब्धता बढ़ेगी।
- खरीफ और रबी दोनों मौसम की फसलों के लिए पर्याप्त पानी मिलेगा।
- गांवों के तालाबों को नहर नेटवर्क से जोड़कर अतिरिक्त जल संचयन किया जाएगा।
इससे जल संकट झेल रहे क्षेत्रों में कृषि उत्पादन बढ़ने की संभावना है।
बाढ़ नियंत्रण में भी मिलेगी बड़ी मदद
रबर डैम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मौसम के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।
भारी वर्षा के दौरान इसमें भरी हवा निकाल दी जाएगी, जिससे नदी का अतिरिक्त पानी आसानी से निकल सकेगा और आसपास के गांवों में बाढ़ का खतरा काफी कम हो जाएगा।
इसके अलावा परियोजना के अंतर्गत नदी के दोनों किनारों पर कुल 1,400 मीटर लंबी बाढ़ सुरक्षा दीवार भी बनाई जा रही है।
सरकार ने निर्माण एजेंसी को अगले 10 वर्षों तक संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी सौंपी है।
गाद की समस्या से भी मिलेगा छुटकारा
पारंपरिक बांधों में समय के साथ गाद (सिल्ट) जमा होना एक बड़ी चुनौती होती है।
रबर डैम तकनीक में जब ब्लैडर को नीचे किया जाता है, तब नदी का तेज बहाव जमा हुई रेत और गाद को बहाकर ले जाता है। इससे जलाशय की क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है और रखरखाव की लागत भी कम होती है।
पाठकवाड़ी रबर डैम पर ₹79.13 करोड़ का निवेश
दूसरी परियोजना तापी जिले के अंबिका नदी पर बनाई जा रही है।
इसकी अनुमानित लागत ₹79.13 करोड़ है। इसमें दक्षिण कोरिया से आयातित विशेष रबर ब्लैडर का उपयोग किया गया है, जबकि इसका डिजाइन जापानी इंजीनियरिंग मानकों पर आधारित है।
इस परियोजना का निर्माण लगभग 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है।
इसके शुरू होने के बाद लगभग 650 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी।
पाठकवाड़ी, ढोडियावाड़, उनाई और सिंधाई गांवों के किसानों को खरीफ और गर्मी की फसलों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा।
30 साल तक चलेगा रबर डैम
सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस रबर ब्लैडर की मोटाई 18 मिमी से 32 मिमी के बीच है।
इसे 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान सहने के लिए डिजाइन किया गया है तथा इसकी अनुमानित आयु लगभग 30 वर्ष है।
इसे जापानी कोड-2000 के इंजीनियरिंग मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है।
भविष्य में समुद्री पानी को रोकने में भी होगी मदद
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इसी तकनीक का उपयोग समुद्र के किनारे स्थित क्षेत्रों में ज्वारीय रेगुलेटर (Tidal Regulator) के रूप में भी किया जा सकता है।
इससे समुद्री खारे पानी को नदियों और भूजल स्रोतों में प्रवेश करने से रोका जा सकेगा, जिससे तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी की उपलब्धता सुरक्षित रहेगी।
भारत के जल प्रबंधन में नई शुरुआत
रबर डैम तकनीक भारत के जल संसाधन प्रबंधन में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। कम समय में निर्माण, अपेक्षाकृत आसान रखरखाव, बेहतर जल भंडारण क्षमता और बाढ़ नियंत्रण जैसी खूबियां इसे पारंपरिक बांधों का प्रभावी विकल्प बनाती हैं।
यदि गुजरात की ये दोनों परियोजनाएं सफल रहती हैं तो आने वाले वर्षों में देश के अन्य राज्यों में भी इसी तकनीक से रबर डैम बनाए जा सकते हैं। इससे जल संरक्षण, सिंचाई और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुलेंगी।


