Grandma Mastanamma Success Story: उम्र सिर्फ एक संख्या है, यह बात आंध्र प्रदेश की कर्रे मस्तानम्मा ने पूरी दुनिया को साबित करके दिखाई। जब लोग 100 साल की उम्र के बाद आराम की जिंदगी की कल्पना करते हैं, तब मस्तानम्मा ने 106 वर्ष की आयु में YouTube पर कदम रखा और अपने पारंपरिक देसी व्यंजनों के जरिए लाखों लोगों का दिल जीत लिया। मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाना, सिल-बट्टे पर मसाले पीसना और ग्रामीण भारत के असली स्वाद को दुनिया तक पहुंचाने वाली मस्तानम्मा आज भी प्रेरणा का प्रतीक मानी जाती हैं।
कौन थीं कर्रे मस्तानम्मा?
कर्रे मस्तानम्मा का जन्म आंध्र प्रदेश के कोप्पल्ले गांव में हुआ था। उनका जीवन बेहद संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। साधारण ग्रामीण परिवेश में रहने वाली मस्तानम्मा ने अपनी सादगी, मेहनत और पारंपरिक पाक कला के दम पर अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की।
साल 2017 में उन्हें दुनिया की सबसे उम्रदराज़ YouTuber के रूप में पहचान मिली। हालांकि वर्ष 2018 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके वीडियो आज भी लाखों लोगों द्वारा देखे जाते हैं और भारतीय पारंपरिक खानपान की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
2016 में शुरू हुआ YouTube का सफर
मस्तानम्मा के YouTube सफर की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई। उनके पड़पोते के. लक्ष्मण और उनके दोस्त श्रीनाथ रेड्डी ने Country Foods नाम से YouTube चैनल शुरू किया। दोनों का उद्देश्य था कि गांवों में बनने वाले पारंपरिक व्यंजनों और पुरानी पाक विधियों को दुनिया तक पहुंचाया जाए।
शुरुआत में साधारण मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड किए गए वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगे। मस्तानम्मा का सहज अंदाज, मुस्कुराता चेहरा और बिना किसी दिखावे के खाना बनाने की शैली लोगों को बेहद पसंद आई।
देसी कुकिंग का ऐसा जादू कि दुनिया हो गई दीवानी
मस्तानम्मा के वीडियो केवल रेसिपी नहीं होते थे, बल्कि भारतीय ग्रामीण जीवन की एक खूबसूरत झलक भी दिखाते थे। उनके वीडियो की खास बातें थीं—
- मिट्टी के चूल्हे पर पारंपरिक तरीके से खाना बनाना।
- सिल-बट्टे पर ताजे मसाले पीसना।
- स्थानीय और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल।
- खुले खेतों और गांव के वातावरण में खाना तैयार करना।
- सरल भाषा और अपनापन, जिसने दुनियाभर के दर्शकों को आकर्षित किया।
इन्हीं खूबियों की वजह से उनके वीडियो भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब पसंद किए गए।
दो साल में मिले लाखों सब्सक्राइबर
Country Foods चैनल ने बहुत कम समय में बड़ी सफलता हासिल की। लॉन्च होने के करीब दो वर्षों के भीतर चैनल पर लगभग 15.7 लाख (1.57 मिलियन) सब्सक्राइबर जुड़ गए। उनके वीडियो पर लाखों व्यूज आने लगे और वे सोशल मीडिया की चर्चित हस्तियों में शामिल हो गईं।
उनकी लोकप्रियता इस बात का प्रमाण थी कि लोग आज भी पारंपरिक भारतीय भोजन और ग्रामीण संस्कृति को करीब से देखना पसंद करते हैं।
संघर्षों से भरा रहा बचपन
मस्तानम्मा का बचपन आसान नहीं था। उन्हें बचपन में एक मुस्लिम परिवार ने गोद लिया था, लेकिन कुछ समय बाद वे अपने मूल गांव लौट आईं। आर्थिक तंगी और कठिन परिस्थितियों के बीच उनका जीवन आगे बढ़ा।
कम उम्र से ही उन्होंने मेहनत-मजदूरी शुरू कर दी थी और जीवन की कई चुनौतियों का सामना किया।
11 साल की उम्र में शादी, 22 साल में विधवा
सिर्फ 11 वर्ष की उम्र में उनकी शादी भूषणम नामक व्यक्ति से हुई। लेकिन महज 22 साल की उम्र में उनके पति का निधन हो गया। इसके बाद पांच बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने धान के खेतों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया और कठिन मेहनत से अपने बच्चों का पालन-पोषण किया।
हैजा महामारी ने छीन लिए चार बच्चे
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख तब आया जब गुंटूर जिले के उनके गांव में फैली हैजा (कॉलेरा) महामारी ने उनके परिवार को झकझोर दिया। इस महामारी में उनके पांच में से चार बच्चों की मौत हो गई।
केवल उनके सबसे बड़े बेटे डेविड जीवित बचे, लेकिन बाद में उन्होंने भी अपनी आंखों की रोशनी खो दी। इसके बावजूद मस्तानम्मा ने हिम्मत नहीं हारी और 105 वर्ष की उम्र तक खेतों में मजदूरी करती रहीं। रोजाना 200 से 300 रुपये कमाकर वह अपने बेटे के साथ घर का खर्च चलाती थीं।
आज भी जीवित है उनकी विरासत
वर्ष 2018 में कर्रे मस्तानम्मा का निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनके YouTube वीडियो नई पीढ़ी को भारतीय पारंपरिक व्यंजनों, ग्रामीण संस्कृति और सादगीपूर्ण जीवनशैली से जोड़ते हैं।
उनकी कहानी यह साबित करती है कि सीखने, सिखाने और लोगों के दिलों तक पहुंचने की कोई उम्र नहीं होती। मेहनत, जुनून और सादगी के साथ कोई भी व्यक्ति दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
निष्कर्ष
कर्रे मस्तानम्मा की सफलता केवल YouTube की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय परंपरा, संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल भी है। उन्होंने यह दिखाया कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करके गांव की संस्कृति और पारंपरिक स्वाद को वैश्विक मंच तक पहुंचाया जा सकता है। 106 वर्ष की उम्र में मिली उनकी लोकप्रियता आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।


