नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आने वाले महीनों में और बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। वैश्विक वित्तीय संस्था सिटी ग्रुप (Citigroup) ने अपनी नई रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि यदि पश्चिम एशिया में मौजूदा शांति बनी रहती है और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में तेल आपूर्ति सामान्य रहती है, तो साल 2026 के अंत तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच सकती है।
यदि ऐसा होता है तो यह दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों के लिए बड़ी राहत होगी। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों को इसका सीधा फायदा मिल सकता है। हालांकि, इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत घटेंगी या नहीं, यह पूरी तरह तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और सरकारी नीति पर निर्भर करेगा।
क्यों गिर सकती हैं कच्चे तेल की कीमतें?
हाल के महीनों में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने तथा क्षेत्रीय हालात सामान्य होने के बाद तेल बाजार में स्थिरता लौटने लगी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही अब पहले की तरह सुचारू रूप से होने लगी है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर उत्पादित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। जब इस मार्ग में किसी तरह की रुकावट आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। अब हालात सामान्य होने से सप्लाई बढ़ी है और कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
सिटी ग्रुप ने रिपोर्ट में क्या कहा?
सिटी ग्रुप के विश्लेषकों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले जो व्यवधान थे, वे अब काफी हद तक समाप्त हो चुके हैं। इसके साथ ही बाजार के मूलभूत संकेतक (Fundamentals) भी कमजोर मांग और बढ़ती आपूर्ति की ओर इशारा कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार—
- होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग गतिविधियां तेजी से सामान्य हो रही हैं।
- वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति पहले की तुलना में बेहतर हो गई है।
- चीन जैसे बड़े खरीदारों की मांग अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है।
- वैश्विक तेल भंडार (Inventory) में उम्मीद से कम कमी आई है।
- फिजिकल क्रूड मार्केट में भी कमजोरी देखने को मिल रही है।
इन सभी कारणों से आने वाले महीनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर लगातार दबाव बना रह सकता है।
दूसरी तिमाही में ही 30% तक गिर चुका है ब्रेंट क्रूड
ऊर्जा बाजार में सामान्य स्थिति लौटने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत दूसरी तिमाही में लगभग 30 प्रतिशत तक गिर चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तेल की सप्लाई बढ़ती है और मांग सीमित रहती है, तब कीमतों में गिरावट आना स्वाभाविक है। यही स्थिति फिलहाल वैश्विक बाजार में दिखाई दे रही है।
हालांकि विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि शिपिंग मार्ग पूरी तरह सामान्य होने, बीमा कंपनियों के जोखिम मूल्यांकन में बदलाव और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी प्रक्रियाओं के पूरी तरह स्थिर होने तक बाजार में थोड़ी अस्थिरता बनी रह सकती है।
क्या भारत में सस्ता होगा पेट्रोल और डीजल?
यह सवाल सबसे ज्यादा लोगों के मन में है कि यदि कच्चा तेल सस्ता होगा तो क्या पेट्रोल और डीजल के दाम भी घटेंगे?
इसका सीधा जवाब है—जरूरी नहीं।
भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की कीमतों से तय नहीं होतीं। इनमें कई अन्य कारक भी शामिल होते हैं, जैसे—
- केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स
- रिफाइनिंग लागत
- परिवहन खर्च
- डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति
- तेल विपणन कंपनियों की लागत और मार्जिन
इसी वजह से कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद घरेलू कीमतों में तुरंत कमी नहीं आती।
पहले भी नहीं बढ़े थे पेट्रोल-डीजल के दाम
ईरान-अमेरिका तनाव के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल तेजी से महंगा हुआ था, तब भी भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लंबे समय तक कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया था।
उस समय तेल विपणन कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया था। ऐसे में अब यदि कच्चा तेल सस्ता होता है तो कंपनियां पहले अपने पुराने नुकसान की भरपाई करने की कोशिश भी कर सकती हैं।
भारत को होगा बड़ा आर्थिक फायदा
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट का देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
कम कीमतों से मिलने वाले संभावित लाभ—
- आयात बिल में कमी आएगी।
- चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव घटेगा।
- महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।
- रुपये पर दबाव कम हो सकता है।
- उद्योगों की उत्पादन लागत घट सकती है।
यदि यह गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका फायदा आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ उद्योग जगत को भी मिल सकता है।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में शांति बनी रहती है, ओपेक+ (OPEC+) की ओर से उत्पादन में कोई बड़ी कटौती नहीं होती और वैश्विक मांग में तेज उछाल नहीं आता, तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी जारी रह सकती है।
हालांकि किसी भी नए भू-राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक आपदा या सप्लाई में बाधा की स्थिति में बाजार का रुख अचानक बदल भी सकता है। इसलिए निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों को अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर नजर बनाए रखनी होगी।
निष्कर्ष
सिटी ग्रुप की रिपोर्ट वैश्विक तेल बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। यदि ब्रेंट क्रूड वास्तव में 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंचता है, तो भारत सहित कई तेल आयातक देशों को इसका बड़ा आर्थिक लाभ मिल सकता है। हालांकि भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल सस्ता मिलेगा या नहीं, इसका फैसला तेल विपणन कंपनियों और सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है और आने वाले महीनों में इसमें और गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


