नई दिल्ली: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर ऊर्जा क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। यूक्रेन की ओर से रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार किए जा रहे ड्रोन हमलों के कारण देश के कई हिस्सों में ईंधन संकट गहरा गया है। हालात इतने गंभीर हो गए कि रूस को अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत समेत अन्य देशों से गैसोलीन आयात करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने रूस को कम से कम 60,000 मीट्रिक टन गैसोलीन की पहली खेप भेज दी है। वहीं रूस आने वाले महीनों में हर महीने लगभग 4 लाख मीट्रिक टन गैसोलीन आयात करने की तैयारी कर रहा है।
Highlights
- यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस में ईंधन संकट गहराया।
- भारत ने रूस को 60,000 मीट्रिक टन गैसोलीन भेजा।
- रूस हर महीने 4 लाख टन गैसोलीन आयात करने की योजना बना रहा है।
- राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कुछ क्षेत्रों में ईंधन की कमी स्वीकार की।
- बेलारूस ने भी रूस को गैसोलीन आपूर्ति बढ़ाई।
यूक्रेन के हमलों से प्रभावित हुई रूस की तेल रिफाइनरियां
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई महीनों से ड्रोन हमलों का सिलसिला तेज हो गया है। यूक्रेन लगातार रूस की तेल रिफाइनरियों, फ्यूल डिपो और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहा है। इन हमलों के कारण कई रिफाइनरियों का संचालन प्रभावित हुआ है, जिससे घरेलू स्तर पर गैसोलीन और डीजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस के 11 अलग-अलग टाइम ज़ोन में ईंधन की कमी दर्ज की गई है। इससे देश के कई हिस्सों में परिवहन, कृषि और औद्योगिक गतिविधियों पर असर पड़ने लगा है।
भारत से पहुंची पहली बड़ी गैसोलीन खेप
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग से जुड़े सूत्रों ने बताया कि भारत से रूस के लिए 30,000 से 40,000 मीट्रिक टन गैसोलीन से भरे दो कार्गो रवाना किए गए हैं।
इन दोनों खेपों को मिलाकर लगभग 60,000 मीट्रिक टन गैसोलीन रूस भेजा गया है। यह पहली बार है जब युद्ध के दौरान रूस को इस स्तर पर भारत से गैसोलीन आयात करना पड़ा है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग हब में शामिल है और हाल के वर्षों में उसने अपने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यही वजह है कि संकट की स्थिति में रूस ने भारत की ओर रुख किया।
रूस को हर महीने चाहिए 4 लाख टन गैसोलीन
सूत्रों के अनुसार रूस सिर्फ भारत पर निर्भर नहीं रहेगा। वह भारत, बेलारूस और अन्य मित्र देशों से मिलाकर हर महीने करीब 4,00,000 मीट्रिक टन गैसोलीन आयात करने की योजना बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यूक्रेन के हमले जारी रहेंगे और रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएंगी, तब तक रूस को बाहरी आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
गर्मियों में बढ़ जाती है ईंधन की मांग
रूस में गर्मियों के दौरान पेट्रोल की खपत काफी बढ़ जाती है। अनुमान के मुताबिक इस मौसम में देश में प्रतिदिन करीब 1,10,000 मीट्रिक टन गैसोलीन की खपत होती है।
पर्यटन, कृषि कार्य और लंबी दूरी के परिवहन के कारण इस अवधि में ईंधन की मांग सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रहती है। ऐसे में उत्पादन प्रभावित होने से संकट और गहरा गया है।
पुतिन ने भी माना ईंधन की कमी
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के साथ हुई बैठक में स्वीकार किया कि यूक्रेन के ड्रोन हमलों के कारण कुछ क्षेत्रों में ईंधन की कमी पैदा हुई है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए लगातार कदम उठा रही है और आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।
पुतिन के इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया कि रूस सरकार भी मौजूदा संकट को गंभीरता से देख रही है।
बेलारूस ने भी बढ़ाई मदद
रूस का पड़ोसी और करीबी सहयोगी देश बेलारूस भी ईंधन आपूर्ति बढ़ाकर संकट कम करने में मदद कर रहा है।
रॉयटर्स की गणना और उद्योग सूत्रों के अनुसार जून के पहले पखवाड़े में बेलारूस ने रेल मार्ग के जरिए रूस को 70,000 टन से अधिक गैसोलीन भेजा, जो मई की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है।
इससे रूस को अल्पकालिक राहत मिली है, लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर अभी भी बना हुआ है।
टैक्स नियमों में किया गया बदलाव
ईंधन संकट को देखते हुए रूस की संसद ने हाल ही में टैक्स नियमों में संशोधन को मंजूरी दी है।
इन नए प्रावधानों के तहत सरकार आयातित ईंधन पर सब्सिडी दे सकेगी ताकि घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय गैसोलीन की डिलीवरी लागत और कीमत को ध्यान में रखते हुए भी सब्सिडी व्यवस्था तैयार की गई है।
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाहरी देशों से आने वाला ईंधन आम उपभोक्ताओं तक उचित कीमत पर पहुंचे।
भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
भारत दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग देशों में शामिल है और बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।
रूस को गैसोलीन की आपूर्ति से भारत को कई फायदे मिल सकते हैं—
- पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी।
- भारतीय रिफाइनरियों के लिए नए बाजार।
- ऊर्जा व्यापार में भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत होना।
- रूस के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी घरेलू ईंधन जरूरतों और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
आगे क्या?
यदि यूक्रेन की ओर से रूस की ऊर्जा अवसंरचना पर हमले जारी रहते हैं तो रूस को लंबे समय तक ईंधन आयात पर निर्भर रहना पड़ सकता है। वहीं भारत, बेलारूस और अन्य निर्यातक देशों के लिए यह एक बड़ा व्यापारिक अवसर भी बन सकता है।
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक पेट्रोलियम व्यापार की दिशा काफी हद तक रूस-यूक्रेन संघर्ष की स्थिति पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष
यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों ने रूस की ऊर्जा व्यवस्था पर गंभीर दबाव डाल दिया है। घरेलू उत्पादन प्रभावित होने के बाद रूस को पहली बार बड़े पैमाने पर भारत सहित अन्य देशों से गैसोलीन आयात करना पड़ रहा है। भारत द्वारा भेजी गई 60,000 मीट्रिक टन गैसोलीन की खेप इस बात का संकेत है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो भारत और रूस के बीच ऊर्जा व्यापार और बढ़ने की संभावना बनी रहेगी।


