नई दिल्ली
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) को लेकर हालात लगातार पेचीदा होते जा रहे हैं। ईरान ने अब इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को दोबारा खोलने के लिए नई शर्त रख दी है। तेहरान का कहना है कि जब तक ईरानी तेल की बिक्री के लिए प्रतिबंधों में राहत और आवश्यक छूट (Waivers) बहाल नहीं की जाती, तब तक होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने पर विचार नहीं किया जाएगा।
इस बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा करते हैं, यह स्थिति नई अनिश्चितता लेकर आई है।
संघर्ष-विराम के पालन को भी बनाया शर्त
ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने स्पष्ट किया है कि लेबनान में संघर्ष-विराम समझौते का पूर्ण पालन होना भी जरूरी है। तेहरान का आरोप है कि क्षेत्र में बार-बार समझौतों का उल्लंघन हो रहा है, जिसके चलते वह अपनी रणनीतिक स्थिति में बदलाव नहीं करेगा।
ईरान के इस रुख ने अमेरिका, क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों और पश्चिमी शक्तियों के कूटनीतिक प्रयासों को और जटिल बना दिया है। हाल के दिनों में शांति वार्ता की कोशिशें तेज हुई थीं, लेकिन होर्मुज को लेकर आई नई शर्तों ने समाधान की राह को कठिन बना दिया है।
IRGC ने जहाजों को दी चेतावनी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना ने जहाजों को होर्मुज क्षेत्र के आसपास सतर्क रहने की चेतावनी जारी की है। सैन्य सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि अगले आदेश तक जहाजों के आवागमन की अनुमति सीमित रखी जा सकती है।
ईरानी एजेंसियों ने इसे कथित “वादा तोड़ने” के खिलाफ शुरुआती प्रतिक्रिया बताया है। उनका कहना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव कम नहीं हुआ तो आगे और सख्त कदम भी उठाए जा सकते हैं।
क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, इराक तथा ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के निर्यात का मुख्य रास्ता है।
वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यही वजह है कि यहां किसी भी तरह की बाधा का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देता है।
भारत के लिए क्या है खतरा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा में बेहद अहम भूमिका निभाता है।
अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है—
1. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
वैश्विक बाजार में सप्लाई प्रभावित होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड और अन्य बेंचमार्क कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है।
2. आयात बिल बढ़ेगा
तेल महंगा होने से भारत का आयात खर्च बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव आएगा।
3. रुपये पर दबाव
ऊर्जा आयात महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपया कमजोर पड़ सकता है।
4. पेट्रोल-डीजल महंगे होने का खतरा
अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू ईंधन कीमतों पर भी पड़ सकता है।
5. रसोई गैस पर असर
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। सप्लाई बाधित होने पर घरेलू गैस बाजार भी प्रभावित हो सकता है।
क्या भारत के पास विकल्प हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से बढ़ी खरीद ने कुछ हद तक जोखिम कम किया है। इसके अलावा देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) भी मौजूद हैं।
फिर भी यदि होर्मुज स्ट्रेट में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो वैश्विक कीमतों का असर भारत पूरी तरह टाल नहीं पाएगा।
आगे क्या?
फिलहाल दुनिया की नजरें अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत पर टिकी हैं। यदि ईरानी तेल निर्यात पर किसी प्रकार की राहत और क्षेत्रीय संघर्ष-विराम को लेकर प्रगति होती है, तो होर्मुज स्ट्रेट दोबारा सामान्य रूप से खुल सकता है।
हालांकि मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता अभी कुछ समय तक बनी रह सकती है। ऐसे में भारत समेत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों को सतर्क रहना होगा।


