नई दिल्ली: 108 दिनों तक चले अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद आखिरकार दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। 28 फरवरी को शुरू हुए इस सैन्य टकराव ने न केवल पश्चिम एशिया को अस्थिर किया बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल दिया। शुरुआती आकलनों के मुताबिक युद्ध और उससे जुड़े आर्थिक प्रभावों के कारण अमेरिका को कुल मिलाकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
युद्ध खत्म, लेकिन आर्थिक घाव गहरे
अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान में मिसाइल हमले, ड्रोन इंटरसेप्शन, नौसैनिक तैनाती और खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की मौजूदगी शामिल थी। युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसकी कीमत अमेरिकी करदाताओं और अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक चुकानी पड़ सकती है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, केवल सैन्य अभियानों पर अमेरिका ने लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। युद्ध के पहले छह दिनों में ही खर्च 11.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इसके बाद भी प्रतिदिन लगभग 1 अरब डॉलर का सैन्य व्यय जारी रहा।
शुरुआती दौर में ही अरबों डॉलर का खर्च
अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध के शुरुआती चरण में मिसाइलों, इंटरसेप्टर सिस्टम और गोला-बारूद पर करीब 25 अरब डॉलर खर्च हुए। ईरान द्वारा छोड़े गए शाहेद ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका ने बड़ी संख्या में पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिनकी एक मिसाइल की कीमत करीब 40 लाख डॉलर बताई जाती है।
इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों और हजारों सैनिकों की तैनाती ने रक्षा बजट पर अतिरिक्त दबाव डाला। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस अभियान के लिए लगभग 200 अरब डॉलर की फंडिंग की मांग भी की थी।
कुल आर्थिक नुकसान $1 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य खर्च को देखकर युद्ध की वास्तविक कीमत नहीं आंकी जा सकती। तेल कीमतों में उछाल, आपूर्ति श्रृंखला पर असर, निवेशकों की चिंता और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता को शामिल किया जाए तो अमेरिका का कुल आर्थिक नुकसान 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
युद्ध के दौरान ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर पड़ा। अनुमान है कि तेल महंगा होने के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ झेलना पड़ा।
समझौते में ईरान को मिलेगा पुनर्निर्माण पैकेज
युद्ध के दौरान ईरान की कई तेल रिफाइनरियां, बिजली ढांचा और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाएं प्रभावित हुईं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण पर लगभग 300 अरब डॉलर खर्च होंगे।
समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण पैकेज को समर्थन देने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस वित्तीय सहायता का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों के सहयोग से आएगा। इसके अलावा ईरान की कुछ फ्रीज की गई विदेशी संपत्तियों को भी रिलीज करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत
संघर्ष समाप्त होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है। पिछले कई महीनों से निवेशक इस युद्ध के कारण तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका से चिंतित थे। अंतरिम समझौते के बाद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने और वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों के सामान्य होने की संभावना बढ़ गई है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के आर्थिक प्रभाव पूरी तरह खत्म होने में अभी समय लगेगा। रक्षा खर्च, पुनर्निर्माण सहायता और ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव का असर आने वाले वर्षों तक महसूस किया जा सकता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध: प्रमुख आंकड़े
- युद्ध अवधि: 108 दिन
- शुरुआत: 28 फरवरी
- अमेरिकी सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर
- पहले 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर
- पैट्रियट मिसाइल की कीमत: 40 लाख डॉलर प्रति मिसाइल
- ईरान पुनर्निर्माण अनुमान: 300 अरब डॉलर
- तेल महंगा होने से अमेरिकी नुकसान: 40 अरब डॉलर से अधिक
- कुल संभावित आर्थिक बोझ: 630 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर
निष्कर्ष: अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम समझौते ने एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को विराम जरूर दिया है, लेकिन इस युद्ध की आर्थिक कीमत बेहद भारी रही। सैन्य खर्च, ऊर्जा संकट और पुनर्निर्माण सहायता को जोड़कर देखें तो यह हाल के वर्षों के सबसे महंगे भू-राजनीतिक संघर्षों में शामिल हो सकता है।


