Success Story of Sathya Shankar: ऑटो चलाने से शुरू हुआ सफर, आज 900 करोड़ के बिजनेस एम्पायर के मालिक
नई दिल्ली। भारत में कई ऐसी सफलता की कहानियां हैं जो यह साबित करती हैं कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, मजबूत इरादे और सही सोच इंसान को बुलंदियों तक पहुंचा सकती है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है कर्नाटक के बेल्लारे गांव के रहने वाले सत्य शंकर के. की, जिन्होंने गरीबी से निकलकर 900 करोड़ रुपये का कारोबार खड़ा कर दिया।
आज सत्य शंकर ‘बिंदु फिज जीरा मसाला’ जैसे लोकप्रिय ब्रांड के संस्थापक हैं। उनकी कंपनी एसजी कॉर्पोरेट्स का कारोबार 900 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। लेकिन इस सफलता के पीछे संघर्ष, धैर्य और वर्षों की मेहनत की लंबी कहानी छिपी हुई है।
12वीं के बाद छूट गई पढ़ाई
सत्य शंकर का जन्म कर्नाटक के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता गांव में पुजारी का काम करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि वे अपने बेटे की उच्च शिक्षा का खर्च उठा सकें।
1984 में जब सत्य शंकर 18 वर्ष के थे, तब उन्हें 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अधिकांश युवा इस स्थिति में निराश हो जाते, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय कमाई का रास्ता तलाशना शुरू किया।
उन्हें एहसास था कि अगर जिंदगी बदलनी है तो कुछ अलग करना होगा। इसी सोच के साथ उन्होंने ऑटो-रिक्शा चलाने का फैसला किया।
ऑटो चलाकर चुकाया लोन
सत्य शंकर ने सरकारी योजना के तहत ऋण लेकर अपना पहला ऑटो-रिक्शा खरीदा। उनके लिए यह सिर्फ एक वाहन नहीं था, बल्कि गरीबी से बाहर निकलने का जरिया था।
उन्होंने दिन-रात मेहनत की। एक साल तक लगातार ऑटो चलाया और समय से पूरा लोन चुका दिया। इसके बाद उन्होंने ऑटो बेचकर एम्बेसडर कार खरीदी और टैक्सी सर्विस शुरू कर दी।
टैक्सी चलाते समय उन्हें अलग-अलग राज्यों और शहरों में जाने का मौका मिला। इसी दौरान उनकी नजर एक ऐसे बिजनेस अवसर पर पड़ी जिसने बाद में उनकी जिंदगी बदल दी।
विदेशी पर्यटकों से मिला करोड़ों का आइडिया
टैक्सी चलाने के दौरान सत्य शंकर अक्सर विदेशी पर्यटकों को घुमाते थे। उन्होंने एक बात गौर की कि लगभग हर विदेशी यात्री सबसे पहले पैक्ड ड्रिंकिंग वॉटर खरीदता था।
यह बात उनके दिमाग में बैठ गई।
उन्होंने सोचा कि भारत में साफ और सुरक्षित पेयजल की मांग भविष्य में तेजी से बढ़ सकती है। हालांकि उस समय उनके पास इस बिजनेस में उतरने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे, लेकिन यह आइडिया उनके मन में हमेशा बना रहा।
यही विचार आगे चलकर उनके सबसे बड़े कारोबार की नींव बना।
स्पेयर पार्ट्स और टायर बिजनेस से मिली नई सीख
1988 तक सत्य शंकर ने टैक्सी कारोबार छोड़ दिया और पुत्तूर में ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट्स की छोटी दुकान शुरू की।
व्यापार करते हुए उन्होंने ग्राहकों की जरूरतों को बारीकी से समझा। उन्हें महसूस हुआ कि स्पेयर पार्ट्स खरीदने वाले अधिकांश ग्राहकों को टायर की भी जरूरत होती है। इसी कारण उन्होंने टायर का कारोबार भी शुरू कर दिया।
इस दौरान उन्हें एक और महत्वपूर्ण बात समझ आई।
ग्रामीण इलाकों के किसान और वाहन मालिक अक्सर उधार पर सामान खरीदते थे और बाद में किश्तों में भुगतान करते थे। इससे उन्हें फाइनेंस बिजनेस की संभावनाएं दिखाई देने लगीं।
1994 में शुरू की फाइनेंस कंपनी
ग्राहकों की जरूरत को समझते हुए सत्य शंकर ने 1994 में ‘प्रवीण कैपिटल’ नाम से फाइनेंस कंपनी शुरू की।
उस समय अधिकांश फाइनेंस कंपनियां पुराने वाहनों को ऋण देने से बचती थीं। लेकिन सत्य शंकर ने अलग रास्ता चुना।
उन्होंने सेकंड हैंड ऑटो, टैक्सी और छोटे वाहनों के लिए लोन देना शुरू किया। चूंकि वे खुद कभी ड्राइवर रह चुके थे, इसलिए ग्राहकों की परेशानियों को अच्छी तरह समझते थे।
उनकी यह रणनीति सफल रही और फाइनेंस बिजनेस लगातार बढ़ता गया।
गांव में लगाई फैक्ट्री, शुरू हुआ नया अध्याय
करीब 15 वर्षों तक पैक्ड पानी का विचार उनके मन में बना रहा। आखिरकार वर्ष 2000 में उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ाया।
उन्होंने कर्नाटक के नरीमोगेरू गांव में पेयजल और बेवरेज फैक्ट्री स्थापित की। यह इलाका भारी बारिश के लिए जाना जाता है, इसलिए यहां पानी की उपलब्धता अच्छी थी।
उन्होंने अपने ब्रांड का नाम ‘बिंदु’ रखा, जिसका कन्नड़ भाषा में अर्थ होता है ‘बूंद’।
लेकिन केवल पानी बेचकर बड़ा ब्रांड बनाना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने कुछ अलग करने की योजना बनाई।
ऐसे बना ‘बिंदु फिज जीरा मसाला’
एक बार उत्तर भारत की यात्रा के दौरान सत्य शंकर एक छोटी दुकान पर रुके। वहां उन्होंने देखा कि दुकानदार सोडा में जीरा पाउडर और मसाले मिलाकर ग्राहकों को दे रहा था।
लोगों को यह स्वाद बेहद पसंद आ रहा था।
यहीं से उन्हें देसी फ्लेवर वाले सॉफ्ट ड्रिंक का आइडिया मिला। उन्होंने इस कॉन्सेप्ट को और बेहतर बनाने का फैसला किया।
कर्नाटक लौटकर उन्होंने ‘बिंदु फिज जीरा मसाला’ लॉन्च किया।
हालांकि शुरुआत बिल्कुल आसान नहीं थी।
शुरुआत में बाजार ने किया नजरअंदाज
जब बिंदु फिज जीरा मसाला बाजार में आया, तब कोका-कोला और पेप्सी जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा था।
दुकानदार और वितरक नए ब्रांड पर भरोसा नहीं कर रहे थे।
स्थिति यह थी कि कंपनी 200 बॉक्स बाजार में भेजती थी तो लगभग 100 बॉक्स वापस लौट आते थे। बिक्री बेहद धीमी थी।
लेकिन सत्य शंकर ने हार नहीं मानी।
उन्हें भरोसा था कि भारतीय उपभोक्ता स्थानीय स्वाद को जरूर अपनाएंगे। उन्होंने लगातार उत्पाद की गुणवत्ता और वितरण नेटवर्क पर काम किया।
बिना बड़े विज्ञापन बजट के बनाया ब्रांड
कंपनी के पास बड़े विज्ञापन अभियान चलाने के लिए करोड़ों रुपये नहीं थे।
इसलिए सत्य शंकर ने पारंपरिक और कम लागत वाले प्रचार के तरीके अपनाए। उन्होंने हाईवे और ग्रामीण इलाकों में दीवारों पर पेंटिंग करवाकर ब्रांड की पहचान बनाई।
धीरे-धीरे लोगों को बिंदु फिज जीरा मसाला का स्वाद पसंद आने लगा।
दक्षिण भारत में मसालेदार भोजन के साथ यह ड्रिंक लोकप्रिय होती चली गई और देखते ही देखते कंपनी का कारोबार बढ़ने लगा।
आज 900 करोड़ रुपये का कारोबार
आज सत्य शंकर 61 वर्ष के हैं और उनका एसजी कॉर्पोरेट्स समूह लगभग 900 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुंच चुका है।
कंपनी का प्रमुख ब्रांड ‘हाउस ऑफ बिंदु’ ड्रिंक्स और स्नैक्स से करीब 570 करोड़ रुपये का कारोबार करता है।
वहीं उनकी फाइनेंस कंपनी ‘प्रवीण कैपिटल’ लगभग 330 करोड़ रुपये का कारोबार करती है।
समूह आज 55 से अधिक उत्पाद बेचता है, जिनमें जीरा मसाला ड्रिंक, फ्रूट जूस, स्नैक्स और अन्य पेय पदार्थ शामिल हैं।
कंपनी की फैक्ट्रियां कर्नाटक और तेलंगाना में संचालित हैं, जबकि आंध्र प्रदेश में विस्तार की योजना पर काम चल रहा है।
गांव के लोगों को दिया रोजगार
सत्य शंकर की सफलता की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अपना अधिकांश निवेश ग्रामीण इलाकों में किया।
उन्होंने देखा कि गांव के युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपनी फैक्ट्रियां ऐसे क्षेत्रों में लगाईं जहां स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सके।
आज हजारों परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनके कारोबार से जुड़े हुए हैं।
सफलता से मिलने वाली सबसे बड़ी सीख
सत्य शंकर की कहानी बताती है कि सफलता के लिए केवल बड़ी डिग्री या महानगर में रहना जरूरी नहीं है।
जरूरी है सही अवसर को पहचानना, धैर्य बनाए रखना और लगातार मेहनत करना।
ऑटो-रिक्शा चलाने वाले एक युवा ने ग्राहकों की आदतों को समझा, स्थानीय स्वाद पर भरोसा किया और एक ऐसा ब्रांड बनाया जिसने दक्षिण भारत के बेवरेज बाजार में अपनी अलग पहचान बना ली।
उनकी यात्रा यह साबित करती है कि बड़े सपने देखने वालों के लिए गरीबी कभी स्थायी बाधा नहीं बन सकती।


