नई दिल्ली: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब केवल पेट्रोल-डीजल के दामों तक सीमित नहीं रह गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल में आई तेजी ने उद्योगों की लागत बढ़ा दी है, जिससे कंपनियों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) की जरूरत भी बढ़ रही है। इसका सीधा असर बैंकिंग सेक्टर पर दिखाई दे रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में बैंक क्रेडिट ग्रोथ में तेज उछाल दर्ज किया गया है जबकि डिपॉजिट में गिरावट देखने को मिली है।
बैंकिंग क्षेत्र के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 31 मई 2026 तक देश में बैंक ऋण (Credit) की वृद्धि दर 17.7 फीसदी रही, जो जून 2024 के बाद सबसे मजबूत वार्षिक वृद्धि मानी जा रही है। दूसरी ओर बैंक जमा (Deposits) में गिरावट आने से बैंकों के सामने फंडिंग का दबाव बढ़ गया है।
तेल कंपनियों की बढ़ी फंडिंग जरूरत
बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बाद ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ गई है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो तेल कंपनियों को आयात के लिए ज्यादा पूंजी की आवश्यकता पड़ती है।
ऐसी स्थिति में ये कंपनियां बैंकों से अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण लेने लगती हैं। इससे बैंकिंग सिस्टम में क्रेडिट की मांग तेजी से बढ़ती है। हाल के महीनों में यही ट्रेंड देखने को मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चा तेल ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो आने वाले महीनों में भी बैंकों पर कर्ज देने का दबाव बना रह सकता है।
दो महीने में ₹1.5 लाख करोड़ बढ़ा बैंक क्रेडिट
बैंकिंग आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 के बाद से देश में कुल बकाया बैंक क्रेडिट में लगभग ₹1.5 लाख करोड़ की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही कुल बैंक क्रेडिट बढ़कर ₹215.2 लाख करोड़ पहुंच गया है।
यह वृद्धि केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, एनबीएफसी और रिटेल सेक्टर से भी ऋण मांग मजबूत बनी हुई है। हालांकि बैंकर्स का मानना है कि तेल क्षेत्र की अतिरिक्त फंडिंग जरूरत ने क्रेडिट ग्रोथ को और गति दी है।
डिपॉजिट में आई गिरावट
जहां एक तरफ कर्ज की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ बैंक डिपॉजिट में कमी देखने को मिली है। 31 मार्च 2026 के बाद कुल बैंक डिपॉजिट में करीब ₹2.3 लाख करोड़ की गिरावट दर्ज की गई।
31 मई 2026 तक बैंकिंग सिस्टम में कुल डिपॉजिट ₹260 लाख करोड़ रहा। डिपॉजिट में यह गिरावट बैंकों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है क्योंकि ऋण वितरण की रफ्तार लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और अन्य निवेश विकल्पों की लोकप्रियता बढ़ने से भी बैंक जमा पर असर पड़ा है। निवेशक पारंपरिक बचत खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट की तुलना में ज्यादा रिटर्न वाले विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
₹3.8 लाख करोड़ तक पहुंचा फंडिंग गैप
क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच बढ़ता अंतर अब बैंकिंग सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती दो महीनों में ही दोनों के बीच का अंतर लगभग ₹3.8 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
हालांकि पिछले वित्त वर्ष में तस्वीर कुछ अलग थी। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान बैंक डिपॉजिट में ₹36.5 लाख करोड़ की वृद्धि हुई थी जबकि बैंक क्रेडिट में ₹31.1 लाख करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
इस बार क्रेडिट की रफ्तार डिपॉजिट से कहीं अधिक तेज दिखाई दे रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो
बैंकिंग सेक्टर की स्थिति को समझने के लिए क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेश्यो एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह बताता है कि बैंक जमा की गई राशि का कितना हिस्सा कर्ज के रूप में दे चुके हैं।
31 मई 2026 तक यह रेश्यो 82.8 फीसदी पर रहा। मार्च 2026 के अंत में यह 83 फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया था।
तुलना के लिए देखा जाए तो कोविड महामारी के दौरान जब बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी थी, तब नवंबर 2021 में यही रेश्यो 69.6 फीसदी तक गिर गया था।
उच्च CD रेश्यो इस बात का संकेत देता है कि बैंकों के पास अतिरिक्त लिक्विडिटी सीमित होती जा रही है।
सरकारी बॉन्ड में निवेश घटा रहे बैंक
क्रेडिट की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कई बैंक अपनी बैलेंस शीट में बदलाव कर रहे हैं। बैंक सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) में निवेश कम कर रहे हैं ताकि अतिरिक्त नकदी उपलब्ध हो सके।
जनवरी 2026 में सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश वृद्धि घटकर लगभग 2 फीसदी रह गई थी। हालांकि मई 2026 तक इसमें कुछ सुधार देखने को मिला और यह बढ़कर 4.9 फीसदी हो गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डिपॉजिट ग्रोथ में तेजी नहीं आती है तो बैंक भविष्य में और अधिक संसाधन जुटाने के लिए ब्याज दरों में बदलाव या विशेष डिपॉजिट योजनाएं ला सकते हैं।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी दबाव बढ़ता है तो इसका असर आम ग्राहकों पर भी पड़ सकता है। बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ने पर होम लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन की ब्याज दरों पर दबाव बन सकता है।
हालांकि फिलहाल बैंकिंग प्रणाली मजबूत स्थिति में है, लेकिन लगातार बढ़ती क्रेडिट मांग और कमजोर डिपॉजिट ग्रोथ आने वाले महीनों में वित्तीय क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकती है।
विशेषज्ञों की नजर अब कच्चे तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया की स्थिति और भारतीय बैंकिंग सिस्टम में जमा वृद्धि के अगले आंकड़ों पर बनी हुई है। यही तय करेगा कि क्रेडिट ग्रोथ की यह तेजी कितने समय तक जारी रहती है।


