₹100 का यह देसी वॉटर फिल्टर क्यों बन गया चर्चा का विषय?
नई दिल्ली: भारत में सुरक्षित पेयजल की चुनौती लगातार बढ़ रही है। एक तरफ भूजल प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक्स जैसी नई समस्याएं सामने आ रही हैं तो दूसरी तरफ आधुनिक वॉटर प्यूरीफायर की ऊंची कीमतें आम परिवारों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं। ऐसे समय में नोएडा की दो जुड़वां छात्राओं ने ऐसा समाधान पेश किया है जिसने वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
कक्षा 12वीं की छात्राएं नैना सिंह और नयनतारा सिंह ने भिंडी, मेथी और चावल के छिलकों की मदद से एक कम लागत वाला वॉटर फिल्टरेशन सिस्टम विकसित किया है। Aqua Sattva नाम का यह फिल्टर महज 100 रुपये में उपलब्ध कराने की योजना है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली, प्लंबिंग या किसी विशेष तकनीकी व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ती।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल साबित होती है तो यह देश के तेजी से बढ़ते वॉटर प्यूरीफायर बाजार में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।
कैसे शुरू हुआ इस अनोखे आविष्कार का सफर?
नैना और नयनतारा को इस प्रोजेक्ट की प्रेरणा दिल्ली क्षेत्र में भूजल की स्थिति पर किए गए एक अध्ययन से मिली। अध्ययन में कई इलाकों में भूजल प्रदूषण और जलस्तर में गिरावट को लेकर गंभीर चिंता जताई गई थी। इस रिपोर्ट ने दोनों छात्राओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर ऐसा कौन सा समाधान विकसित किया जा सकता है जो कम लागत वाला होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी हो।
इसके बाद दोनों ने कक्षा 11वीं में इस विषय पर शोध शुरू किया। शुरुआत में यह एक स्कूल प्रोजेक्ट था, लेकिन समय के साथ यह एक बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट में बदल गया। लगभग एक वर्ष तक विभिन्न प्राकृतिक सामग्रियों पर अध्ययन करने और कई प्रयोगों के बाद Aqua Sattva का प्रारंभिक मॉडल तैयार हुआ।
क्या है Aqua Sattva?
दोनों बहनों ने अपने स्टूडेंट स्टार्टअप Hydra Nova के तहत Aqua Sattva नाम का प्लांट-बेस्ड वॉटर फिल्टरेशन सिस्टम विकसित किया है। इस तकनीक का आधार पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री है।
इसमें भिंडी और मेथी से प्राप्त प्राकृतिक पॉलीमर तथा चावल के छिलकों से तैयार बायोचार का उपयोग किया जाता है। इन सामग्रियों को छोटे-छोटे पाउच में पैक किया जाता है, जो देखने में टी-बैग जैसे लगते हैं।
इन पाउच को पानी के संपर्क में लाने पर वे पानी में मौजूद कुछ हानिकारक तत्वों को पकड़ने और अवशोषित करने का काम करते हैं। यही वजह है कि यह तकनीक पारंपरिक फिल्टरों से अलग मानी जा रही है।
माइक्रोप्लास्टिक्स और PFAS क्यों हैं चिंता का विषय?
पिछले कुछ वर्षों में माइक्रोप्लास्टिक्स और PFAS दुनिया भर में स्वास्थ्य और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं।
माइक्रोप्लास्टिक्स बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जो पानी, भोजन और हवा तक में पहुंच चुके हैं। कई अंतरराष्ट्रीय शोधों में इनके मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों को लेकर चेतावनी दी गई है।
वहीं PFAS यानी Per- and Polyfluoroalkyl Substances ऐसे रसायन हैं जिनका उपयोग विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है। ये पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं और आसानी से नष्ट नहीं होते। इसी कारण इन्हें “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है।
Aqua Sattva का दावा है कि यह इन दोनों प्रकार के प्रदूषकों को कम करने में प्रभावी साबित हो सकता है।
कैसे काम करता है यह फिल्टर?
इस तकनीक का वैज्ञानिक आधार काफी दिलचस्प है।
भिंडी और मेथी में पाए जाने वाले पॉलीसेकेराइड्स प्राकृतिक कोएगुलेंट की तरह काम करते हैं। ये पानी में मौजूद सूक्ष्म कणों और माइक्रोप्लास्टिक्स को अपने साथ जोड़कर अलग करने में मदद करते हैं।
दूसरी ओर चावल के छिलकों से तैयार बायोचार एक अवशोषक सामग्री की तरह काम करती है। इसकी संरचना ऐसी होती है कि यह कई प्रकार के रासायनिक प्रदूषकों को अपनी सतह पर रोक सकती है।
दोनों तकनीकों को एक साथ जोड़कर तैयार किया गया Aqua Sattva पानी को अधिक सुरक्षित बनाने का प्रयास करता है।
IIT दिल्ली में हुआ परीक्षण
इस नवाचार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इसका प्रोटोटाइप IIT दिल्ली की बायोमास लेबोरेटरी में विकसित और परीक्षण किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस परियोजना को प्रोफेसर विवेक कुमार का मार्गदर्शन मिला।
किसी भी जल शोधन तकनीक के लिए वैज्ञानिक परीक्षण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इसका सीधा संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य से होता है। यही कारण है कि इस परीक्षण को परियोजना की विश्वसनीयता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
लैब टेस्ट में क्या मिले नतीजे?
परियोजना से जुड़े परीक्षणों के अनुसार Aqua Sattva पानी में मौजूद 20 प्रकार के PFAS कंपाउंड्स को हटाने में प्रभावी पाया गया।
परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार यह तकनीक लगभग 93 प्रतिशत तक PFAS प्रदूषण को कम करने में सफल रही। साथ ही माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।
हालांकि किसी भी तकनीक के बड़े पैमाने पर उपयोग से पहले और अधिक स्वतंत्र परीक्षणों की आवश्यकता होती है, फिर भी शुरुआती नतीजे उत्साहजनक माने जा रहे हैं।
पारंपरिक RO सिस्टम से कितना अलग?
भारत में अधिकांश घरों में RO आधारित वॉटर प्यूरीफायर का उपयोग होता है। लेकिन इनके साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।
एक सामान्य RO सिस्टम की कीमत 10,000 रुपये से लेकर 30,000 रुपये तक हो सकती है। इसके अलावा नियमित सर्विसिंग, फिल्टर बदलने और बिजली खर्च का अतिरिक्त बोझ भी होता है।
RO तकनीक में बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होने की समस्या भी अक्सर उठाई जाती है। कई विशेषज्ञों के अनुसार एक लीटर शुद्ध पानी तैयार करने के लिए कई लीटर पानी नाली में चला जाता है।
इसके मुकाबले Aqua Sattva बिजली रहित, कम लागत वाला और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रस्तुत करता है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों और सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए इसे उपयोगी माना जा रहा है।
19,000 करोड़ रुपये के बाजार में नई चुनौती
भारत का वॉटर प्यूरीफायर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। उद्योग रिपोर्ट्स के अनुसार यह बाजार करीब 19,000 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है और हर वर्ष 16 से 18 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
इस बाजार में Kent, Aquaguard, Livpure, Blue Star और AO Smith जैसी बड़ी कंपनियां सक्रिय हैं। हालांकि Aqua Sattva अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसकी कम लागत और सरल उपयोगिता इसे एक अलग पहचान दिला सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कम आय वाले उपभोक्ताओं के लिए ऐसे विकल्प भविष्य में बड़ी मांग पैदा कर सकते हैं।
पेटेंट के लिए किया आवेदन
नैना और नयनतारा ने अपनी तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन भी दाखिल कर दिया है। यदि पेटेंट मंजूर हो जाता है और बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू होता है तो यह स्टूडेंट प्रोजेक्ट एक सफल स्टार्टअप में बदल सकता है।
भारत में हाल के वर्षों में शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में Hydra Nova को भी निवेशकों और उद्योग जगत से समर्थन मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
नकली फिल्टर बाजार पर भी पड़ सकता है असर
देश में नकली वॉटर फिल्टर और नकली फिल्टर कार्ट्रिज का कारोबार भी एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक फैक्ट्री पर छापा मारकर 2,900 से अधिक नकली फिल्टर बरामद किए थे, जिन्हें नामी ब्रांड्स के नाम पर बाजार में बेचा जा रहा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कम कीमत पर भरोसेमंद और प्रमाणित विकल्प उपलब्ध होते हैं तो उपभोक्ताओं की नकली उत्पादों पर निर्भरता कम हो सकती है।
आगे क्या?
Aqua Sattva फिलहाल शुरुआती चरण में है, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि नवाचार के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी समस्या को समझने और समाधान खोजने की सोच होती है। यदि आने वाले समय में यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर सफल होती है तो यह लाखों लोगों को कम लागत में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नोएडा की इन दो छात्राओं की कहानी यह भी दिखाती है कि भारत में अगली बड़ी तकनीकी सफलता किसी बड़ी कंपनी की प्रयोगशाला से ही नहीं, बल्कि स्कूल के एक प्रोजेक्ट से भी निकल सकती है।


