नई दिल्ली: अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस विवादित नीति को अदालत ने रद्द कर दिया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 95.5 लाख रुपये) की अतिरिक्त फीस लगाई गई थी। मैसाचुसेट्स की फेडरल कोर्ट ने इस शुल्क को “अनधिकृत टैक्स” करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की मंजूरी के बिना ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।
यह फैसला भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य उच्च कौशल वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि H-1B वीजा कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ भारतीय नागरिक ही उठाते हैं।
क्या था ट्रंप प्रशासन का फैसला?
सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए कुछ नए H-1B कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर 1 लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस लगाने की घोषणा की थी। प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करेंगी और स्थानीय लोगों को अधिक रोजगार मिलेगा।
इस आदेश से पहले कंपनियां आमतौर पर H-1B आवेदन के लिए 2,000 डॉलर से 5,000 डॉलर तक की सरकारी फीस चुकाती थीं। लेकिन नए नियम के बाद यह लागत कई गुना बढ़ जाती, जिससे विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना बेहद महंगा हो जाता।
कोर्ट ने क्यों रद्द किया फैसला?
अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में कहा कि 1 लाख डॉलर की यह राशि वास्तव में एक टैक्स की तरह है। अमेरिकी संविधान के अनुसार नया टैक्स लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं।
जज ने कहा कि ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाया गया शुल्क कांग्रेस द्वारा निर्धारित इमिग्रेशन फीस से बहुत अधिक था और इसकी कानूनी वैधता साबित नहीं की जा सकी। अदालत ने माना कि इस तरह की नीति कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
राज्यों ने क्यों किया था विरोध?
करीब 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने इस नीति के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका कहना था कि इतनी भारी फीस से विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, रिसर्च संस्थानों और टेक कंपनियों को नुकसान होगा।
राज्यों ने तर्क दिया कि अमेरिका की कई प्रमुख इंडस्ट्रीज उच्च कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर हैं। यदि कंपनियों को हर कर्मचारी पर 1 लाख डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा तो वे विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करने से बचेंगी, जिससे नवाचार और आर्थिक विकास प्रभावित होगा।
भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों अहम है फैसला?
अमेरिकी नागरिकता एवं इमिग्रेशन सेवाओं (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार H-1B वीजा प्राप्त करने वालों में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। भारत की बड़ी आईटी कंपनियां और अमेरिकी टेक कंपनियां हर साल हजारों भारतीय इंजीनियरों और विशेषज्ञों को H-1B वीजा के जरिए अमेरिका भेजती हैं।
अगर 1 लाख डॉलर की फीस लागू रहती तो भारतीय कर्मचारियों की नियुक्ति में बड़ी गिरावट आ सकती थी। कई कंपनियां अतिरिक्त लागत से बचने के लिए भर्ती कम कर सकती थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले से भारतीय आईटी सेक्टर को राहत मिलेगी और अमेरिका में काम करने के अवसर पहले की तरह बने रहेंगे।
अमेरिकी टेक कंपनियों को भी मिलेगा फायदा
Google, Microsoft, Amazon, Meta और कई अन्य अमेरिकी टेक कंपनियां बड़ी संख्या में H-1B कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं। इन कंपनियों ने पहले भी कहा था कि उच्च कौशल वाले विदेशी कर्मचारी अमेरिका की तकनीकी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
यदि अतिरिक्त शुल्क लागू रहता तो कंपनियों की भर्ती लागत बढ़ जाती और वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना कठिन हो जाता। अदालत के फैसले के बाद कंपनियों को राहत मिली है।
आगे क्या हो सकता है?
हालांकि अदालत ने फिलहाल इस शुल्क को रद्द कर दिया है, लेकिन ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है। यदि मामला आगे बढ़ता है तो अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है।
फिलहाल H-1B वीजा प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेगी और कंपनियों को अतिरिक्त 1 लाख डॉलर शुल्क नहीं देना होगा।
भारतीय युवाओं के लिए क्या मतलब है?
जो छात्र अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी की योजना बना रहे हैं या आईटी सेक्टर में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह सकारात्मक संकेत है। H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में रोजगार पाने की राह फिलहाल आसान बनी हुई है और कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की तकनीकी और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी इंडस्ट्रीज को आने वाले वर्षों में भी विदेशी प्रतिभाओं की जरूरत बनी रहेगी, जिसमें भारतीय पेशेवरों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।


