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Reading: कभी Tata Docomo सिम का चलता था भारत में सिक्का, फिर कैसे हर घर से गायब हुआ रतन टाटा का ‘युगांतरकारी’ ब्रांड
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कभी Tata Docomo सिम का चलता था भारत में सिक्का, फिर कैसे हर घर से गायब हुआ रतन टाटा का ‘युगांतरकारी’ ब्रांड

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 6:34 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
tata-docomo-failure-story-india-ratan-tata-brand-disappeared
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नई दिल्ली। एक समय था जब मोबाइल पर बात करते समय लोग घड़ी देखते थे। अगर कॉल 1 मिनट 3 सेकंड की हुई तो पूरा 2 मिनट का चार्ज देना पड़ता था। टेलीकॉम कंपनियों की प्रति मिनट बिलिंग व्यवस्था आम उपभोक्ताओं के लिए बड़ी परेशानी थी। ऐसे दौर में टाटा समूह और जापान की कंपनी एनटीटी डोकोमो ने मिलकर भारतीय टेलीकॉम बाजार में एक ऐसा बदलाव किया जिसने पूरे उद्योग की दिशा बदल दी।

Contents
टाटा डोकोमो की शुरुआत कैसे हुई3G सेवा शुरू करने वालों में सबसे आगे थी कंपनीकरोड़ों ग्राहकों तक पहुंचा ब्रांडफिर कहां से शुरू हुई मुश्किलेंNTT Docomo और Tata Group के बीच विवाद4G क्रांति में पिछड़ गई Tata Docomoजियो की एंट्री बनी निर्णायक झटकाअगर Tata Docomo समय पर 4G में उतरती तो क्या होता?आखिर Tata Docomo का क्या हुआ?आज भी याद किया जाता है Tata Docomo

टाटा डोकोमो ने भारत में “प्रति सेकंड बिलिंग” की शुरुआत करके करोड़ों ग्राहकों का दिल जीत लिया। कंपनी ने कम समय में तेजी से लोकप्रियता हासिल की और लाखों लोग इसके ग्राहक बने। लेकिन जिस ब्रांड ने कभी एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियों को चुनौती दी थी, वह कुछ ही वर्षों में बाजार से पूरी तरह गायब हो गया। सवाल यह है कि आखिर टाटा डोकोमो की असफलता के पीछे क्या कारण थे और रतन टाटा का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट क्यों नहीं टिक सका?

टाटा डोकोमो की शुरुआत कैसे हुई

दिसंबर 2008 में जापान की टेलीकॉम दिग्गज एनटीटी डोकोमो ने टाटा टेलीसर्विसेज में लगभग 26.5 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी। इस निवेश का मूल्य करीब 12,740 करोड़ रुपये था। इसके बाद भारत में Tata Docomo ब्रांड लॉन्च किया गया।

कंपनी के लॉन्च के समय भारतीय टेलीकॉम बाजार में प्रति मिनट बिलिंग का चलन था। ग्राहक चाहे कुछ सेकंड ही बात करें, उन्हें पूरा मिनट का शुल्क देना पड़ता था। टाटा डोकोमो ने इस व्यवस्था को बदलते हुए प्रति सेकंड बिलिंग शुरू की।

यह कदम इतना लोकप्रिय हुआ कि कुछ ही महीनों में अन्य कंपनियों को भी अपने प्लान बदलने पड़े। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में यह सबसे बड़े उपभोक्ता हित वाले बदलावों में से एक था।

3G सेवा शुरू करने वालों में सबसे आगे थी कंपनी

सिर्फ कॉलिंग प्लान ही नहीं, बल्कि डेटा सेवाओं में भी टाटा डोकोमो ने शुरुआती बढ़त हासिल की। कंपनी भारत में 3G सेवाएं शुरू करने वाली पहली निजी टेलीकॉम कंपनियों में शामिल रही।

टाटा टेलीसर्विसेज ने 3G स्पेक्ट्रम हासिल करने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए भी भारी निवेश किया गया। उस समय 21.1 Mbps तक की इंटरनेट स्पीड को बड़ी उपलब्धि माना जाता था।

तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन बाजार में कंपनी ने युवा ग्राहकों को आकर्षित किया। बेहतर विज्ञापन अभियानों और प्रतिस्पर्धी प्लान्स की वजह से टाटा डोकोमो का नाम देश के प्रमुख मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटरों में शामिल हो गया।

करोड़ों ग्राहकों तक पहुंचा ब्रांड

टेलीकॉम नियामक संस्था TRAI के आंकड़ों और कंपनी रिपोर्ट्स के अनुसार मार्च 2017 तक टाटा डोकोमो और टाटा टेलीसर्विसेज के पास करीब 4.9 करोड़ मोबाइल ग्राहक थे।

उस समय भारतीय टेलीकॉम बाजार दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी बाजारों में शामिल था। एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया, बीएसएनएल, एयरसेल और रिलायंस कम्युनिकेशंस जैसी कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लगातार कीमतों में कटौती कर रही थीं।

इसके बावजूद टाटा डोकोमो अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा।

फिर कहां से शुरू हुई मुश्किलें

टाटा डोकोमो का पतन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे।

सबसे पहली समस्या थी नेटवर्क विस्तार की धीमी गति। जबकि एयरटेल और वोडाफोन लगातार अपने नेटवर्क में निवेश कर रहे थे, टाटा डोकोमो कई क्षेत्रों में मजबूत कवरेज देने में पीछे रह गया।

दूसरी बड़ी चुनौती थी स्पेक्ट्रम और लाइसेंसिंग से जुड़ी लागत। भारतीय टेलीकॉम उद्योग में स्पेक्ट्रम खरीदना बेहद महंगा होता जा रहा था। कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये निवेश करने पड़ रहे थे।

इसके अलावा 2G स्पेक्ट्रम विवाद और बदलते नियामकीय माहौल ने भी कई कंपनियों के बिजनेस मॉडल को प्रभावित किया।

NTT Docomo और Tata Group के बीच विवाद

कंपनी की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब जापानी साझेदार NTT Docomo ने भारत में अपेक्षित प्रदर्शन न मिलने के कारण बाहर निकलने का फैसला किया।

NTT Docomo ने टाटा समूह के साथ हुए समझौते के तहत अपने निवेश की सुरक्षा की मांग की। मामला अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुंच गया। बाद में टाटा समूह को जापानी कंपनी को लगभग 1.27 बिलियन डॉलर का भुगतान करना पड़ा।

इस कानूनी विवाद ने कंपनी की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया। जिस पूंजी का उपयोग नेटवर्क विस्तार और नई तकनीक में निवेश के लिए किया जा सकता था, उसका बड़ा हिस्सा विवाद निपटाने में खर्च हो गया।

4G क्रांति में पिछड़ गई Tata Docomo

विशेषज्ञ मानते हैं कि टाटा डोकोमो की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती 4G तकनीक में समय पर आक्रामक निवेश नहीं करना थी।

जब दुनिया 4G नेटवर्क की ओर बढ़ रही थी, तब कंपनी अभी भी 3G नेटवर्क को मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे रही थी। दूसरी ओर एयरटेल और वोडाफोन तेजी से अपने डेटा नेटवर्क का विस्तार कर रहे थे।

भारत में इंटरनेट उपयोग तेजी से बढ़ रहा था और ग्राहकों की प्राथमिकता कॉलिंग से हटकर डेटा पर आ चुकी थी। ऐसे समय में 4G नेटवर्क की कमी कंपनी के लिए बड़ी कमजोरी साबित हुई।

जियो की एंट्री बनी निर्णायक झटका

सितंबर 2016 में रिलायंस जियो की एंट्री ने पूरे भारतीय टेलीकॉम उद्योग को बदल दिया।

जियो ने मुफ्त कॉलिंग, बेहद सस्ता डेटा और हाई-स्पीड 4G नेटवर्क के साथ बाजार में प्रवेश किया। शुरुआत में कंपनी ने मुफ्त सेवाएं देकर करोड़ों ग्राहकों को आकर्षित किया।

टेलीकॉम उद्योग के विश्लेषकों के अनुसार जियो के आने के बाद औसत प्रति ग्राहक राजस्व (ARPU) में भारी गिरावट आई। कई कंपनियों की आय प्रभावित हुई और पूरे सेक्टर में कीमतों की जंग शुरू हो गई।

टाटा डोकोमो पहले से ही वित्तीय दबाव, कमजोर नेटवर्क विस्तार और साझेदार विवाद जैसी समस्याओं से जूझ रही थी। ऐसे में जियो की आक्रामक रणनीति का सामना करना उसके लिए लगभग असंभव साबित हुआ।

अगर Tata Docomo समय पर 4G में उतरती तो क्या होता?

यह सवाल आज भी टेलीकॉम विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि टाटा डोकोमो 2013-14 के दौरान बड़े पैमाने पर 4G नेटवर्क में निवेश करती और डेटा कारोबार पर फोकस बढ़ाती, तो वह बाजार में अपनी स्थिति मजबूत रख सकती थी।

कंपनी के पास मजबूत ब्रांड पहचान, टाटा समूह का भरोसा और करोड़ों ग्राहकों का आधार मौजूद था। लेकिन तकनीकी बदलाव की रफ्तार को समय पर नहीं पहचान पाने का नुकसान उसे उठाना पड़ा।

आखिर Tata Docomo का क्या हुआ?

भारी कर्ज और लगातार बढ़ते घाटे के बीच टाटा समूह ने उपभोक्ता मोबाइल सेवाओं के कारोबार से बाहर निकलने का फैसला किया।

अक्टूबर 2017 में भारती एयरटेल ने टाटा टेलीसर्विसेज के उपभोक्ता मोबाइल कारोबार के अधिग्रहण की घोषणा की। इसके बाद धीरे-धीरे टाटा डोकोमो के ग्राहकों को एयरटेल नेटवर्क पर स्थानांतरित किया गया।

1 जुलाई 2019 को Tata Docomo ब्रांड का एयरटेल में पूर्ण विलय हो गया। इसके साथ ही भारतीय टेलीकॉम बाजार से एक ऐसा नाम हमेशा के लिए गायब हो गया जिसने कभी उद्योग की दिशा बदल दी थी।

आज भी याद किया जाता है Tata Docomo

हालांकि Tata Docomo अब भारतीय बाजार में मौजूद नहीं है, लेकिन प्रति सेकंड बिलिंग जैसी उसकी पहल आज भी भारतीय टेलीकॉम इतिहास की सबसे बड़ी उपभोक्ता क्रांतियों में गिनी जाती है।

कंपनी कारोबार की दौड़ में भले पीछे रह गई, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि एक सही आइडिया पूरे उद्योग को बदल सकता है। आज ग्राहकों को जो पारदर्शी कॉलिंग प्लान और बेहतर प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है, उसमें Tata Docomo की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता।

यही कारण है कि वर्षों बाद भी जब लोग पुराने मोबाइल नेटवर्क की बात करते हैं तो Tata Docomo का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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