नई दिल्ली। भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेनों में गिनी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस के कई घंटे देरी से चलने का मामला रेलवे पर भारी पड़ गया। ट्रेन की देरी के कारण एक दंपत्ति की एयर इंडिया की फ्लाइट छूट गई, जिसके बाद उन्हें अगले दिन महंगा टिकट खरीदना पड़ा। मामला उपभोक्ता फोरम तक पहुंचा और आखिरकार अदालत ने रेलवे को 69,000 रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया। हाल ही में राज्य उपभोक्ता आयोग ने भी जिला आयोग के फैसले को बरकरार रखते हुए रेलवे की अपील खारिज कर दी।
क्या था पूरा मामला?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कोटा निवासी अनिल कुमार राना और उनकी पत्नी अनीता राना ने 17 दिसंबर 2017 को दिल्ली से तिरुवनंतपुरम जाने के लिए एयर इंडिया की फ्लाइट बुक की थी। यह टिकट उन्होंने एक महीने पहले बुक कराया था, जिसकी कीमत 33,929 रुपये थी।
दिल्ली पहुंचने के लिए उन्होंने उसी दिन राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12431) का टिकट लिया। ट्रेन को दोपहर 12:40 बजे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचना था, जबकि उनकी फ्लाइट शाम 6:05 बजे थी। यानी उनके पास एयरपोर्ट पहुंचने के लिए पर्याप्त समय था।
कैसे छूट गई फ्लाइट?
निर्धारित समय के विपरीत राजधानी एक्सप्रेस चार घंटे से अधिक देरी से चली और शाम करीब 4:50 बजे दिल्ली पहुंची। स्टेशन से एयरपोर्ट पहुंचने तक फ्लाइट रवाना हो चुकी थी।
फ्लाइट छूटने के बाद दंपत्ति को पूरी रात एयरपोर्ट पर बितानी पड़ी और अगले दिन केरल जाने के लिए नया टिकट खरीदना पड़ा। इस बार टिकट की कीमत 72,930 रुपये थी, जो पहले से कहीं अधिक थी।
रेलवे से मांगी भरपाई
यात्रा के बाद दंपत्ति ने रेलवे प्रशासन को कई बार लिखित शिकायत देकर हुए नुकसान की भरपाई की मांग की। मार्च और सितंबर 2018 में प्रतिनिधित्व देने के बावजूद कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद दिसंबर 2018 में कानूनी नोटिस भेजा गया और मामला जिला उपभोक्ता आयोग, कोटा पहुंच गया।
रेलवे ने क्या दलील दी?
रेलवे ने अदालत में कहा कि तकनीकी, परिचालन और सुरक्षा कारणों से ट्रेनों में देरी हो सकती है। रेलवे का तर्क था कि इसे सेवा में कमी नहीं माना जा सकता।
हालांकि उपभोक्ता आयोग ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने माना कि ट्रेन की असाधारण देरी के कारण यात्रियों को आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी।
कोर्ट ने कितना मुआवजा दिया?
जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को निम्न भुगतान करने का आदेश दिया:
| मद | राशि |
|---|---|
| अतिरिक्त हवाई टिकट खर्च | ₹39,001 |
| मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न | ₹20,000 |
| होटल खर्च | ₹5,000 |
| मुकदमेबाजी खर्च | ₹5,000 |
| कुल | ₹69,001 |
राज्य आयोग ने भी बरकरार रखा फैसला
पश्चिम मध्य रेलवे ने जिला आयोग के फैसले को राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में चुनौती दी। लेकिन 27 मई को राज्य आयोग ने रेलवे की अपील खारिज कर दी।
न्यायिक सदस्य निर्मल सिंह मेडवाल और सदस्य करुणा जैन की पीठ ने माना कि जिला आयोग का आदेश सही था और रेलवे को ब्याज सहित मुआवजा देने का निर्देश बरकरार रखा।
यात्रियों के लिए क्या है सबक?
यह फैसला उन यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनकी यात्रा योजनाएं ट्रेन की देरी के कारण प्रभावित होती हैं। हालांकि हर मामले में मुआवजा नहीं मिलता, लेकिन यदि ट्रेन की देरी से स्पष्ट आर्थिक नुकसान हुआ हो और उसका प्रमाण उपलब्ध हो, तो उपभोक्ता आयोग में राहत मिलने की संभावना रहती है।
निष्कर्ष
राजधानी एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेन की चार घंटे से अधिक देरी एक यात्री को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है। इस मामले में उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि रेलवे की सेवा में कमी के कारण यात्रियों को नुकसान होता है, तो उन्हें मुआवजा दिया जा सकता है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।


