नई दिल्ली। दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) फिर से वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने चेतावनी दी है कि मौजूदा हालात 1970 के दशक के तेल संकट के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा सुरक्षा संकट पैदा कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते जोखिम और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव ने दुनिया भर की सरकारों और कंपनियों को अपनी ऊर्जा रणनीतियों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल का कहना है कि दुनिया अब तक के सबसे बड़े ऊर्जा सुरक्षा संकट से गुजर रही है। उनका मानना है कि यह संकट केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में वैश्विक निवेश, व्यापार मार्गों और ऊर्जा स्रोतों की प्राथमिकताओं को भी बदल सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?
वैश्विक ऊर्जा बाजार में होर्मुज स्ट्रेट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां किसी प्रकार की रुकावट आती है तो इसका असर केवल तेल बाजार पर नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों और सरकारों की चिंता बढ़ी है। कई देशों ने वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और ऊर्जा स्रोतों की तलाश तेज कर दी है ताकि किसी संभावित संकट की स्थिति में उनकी अर्थव्यवस्था प्रभावित न हो।
3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है ऊर्जा निवेश
आईईए की ‘वर्ल्ड एनर्जी इन्वेस्टमेंट 2026’ रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष वैश्विक ऊर्जा निवेश बढ़कर लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह अब तक का रिकॉर्ड स्तर माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 2.2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश निम्न क्षेत्रों में होने की उम्मीद है: बिजली ग्रिड, बैटरी स्टोरेज, नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता परियोजनाएं, कम उत्सर्जन वाले ईंधन. यह दर्शाता है कि दुनिया अब केवल तेल और गैस पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा के विविध स्रोतों की ओर बढ़ रही है।
बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर पर सबसे बड़ा दांव
इस वर्ष बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 1.6 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने का अनुमान है। यदि बिजली से जुड़े अन्य निवेशों को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश लगभग 20 प्रतिशत बढ़कर 550 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। वहीं बैटरी स्टोरेज सेक्टर पहली बार 100 अरब डॉलर के निवेश का आंकड़ा पार कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई, डेटा सेंटर और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के कारण बिजली की खपत लगातार बढ़ेगी। यही कारण है कि ऊर्जा कंपनियां अब बिजली नेटवर्क को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
तेल में निवेश घट रहा है
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक तेल निवेश लगातार तीसरे वर्ष घटने की ओर बढ़ रहा है। आईईए का अनुमान है कि 2026 में तेल क्षेत्र में निवेश 500 अरब डॉलर से नीचे आ सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं पहला, निवेशक अब दीर्घकालिक ऊर्जा बदलाव को देखते हुए नवीकरणीय परियोजनाओं में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। दूसरा, सप्लाई चेन की समस्याएं और ऑफशोर ड्रिलिंग उपकरणों की सीमित उपलब्धता नए प्रोजेक्ट्स को प्रभावित कर रही हैं। तीसरा, भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण तेल कंपनियां बड़े निवेश फैसलों में सावधानी बरत रही हैं।
प्राकृतिक गैस की बढ़ती अहमियत
तेल के मुकाबले प्राकृतिक गैस क्षेत्र में निवेश बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2026 में यह निवेश 330 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जो पिछले एक दशक का सबसे ऊंचा स्तर होगा। अमेरिका और कतर में चल रही एलएनजी (LNG) परियोजनाएं इस वृद्धि की प्रमुख वजह हैं। कई देश प्राकृतिक गैस को कोयले और तेल के मुकाबले अपेक्षाकृत स्वच्छ विकल्प मानते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज कदम
दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश लगातार बढ़ रहा है। आईईए के अनुसार 2026 तक यह निवेश 665 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। सौर ऊर्जा अकेले 365 अरब डॉलर के निवेश के साथ सबसे बड़ा क्षेत्र बनी हुई है। चीन, भारत, अमेरिका और यूरोप में बड़े पैमाने पर सोलर परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आयातित तेल और गैस पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
परमाणु ऊर्जा की वापसी
कुछ वर्षों पहले तक परमाणु ऊर्जा को लेकर दुनिया में मिश्रित राय थी, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा संकट ने इसे फिर से केंद्र में ला दिया है। आईईए के अनुसार परमाणु ऊर्जा में वार्षिक निवेश 80 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दुनिया भर में लगभग 80 गीगावाट नई परमाणु क्षमता पर काम चल रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने और स्थिर बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए परमाणु ऊर्जा की भूमिका बढ़ सकती है।
कोयला भी फिर बना विकल्प
हालांकि दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा की चिंता के कारण कई एशियाई देशों ने कोयले पर भी निवेश बढ़ाया है। चीन सहित कई देशों ने ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं को जारी रखा है। आईईए के अनुसार कोयले में निवेश 2012 के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का तनाव भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है। यदि होर्मुज स्ट्रेट में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, हवाई किराए, परिवहन लागत और महंगाई पर दिखाई दे सकता है। इसी वजह से भारत सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, परमाणु ऊर्जा और घरेलू गैस उत्पादन को बढ़ाने पर तेजी से काम कर रहा है।
आगे क्या?
आईईए की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहेगी। ऊर्जा सुरक्षा अब केवल तेल उत्पादन का विषय नहीं रह गई है। इसमें बिजली ग्रिड, बैटरी स्टोरेज, नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और सप्लाई चेन सुरक्षा जैसे कई पहलू शामिल हो चुके हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष ने दुनिया को यह याद दिला दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। आने वाले वर्षों में वही देश मजबूत स्थिति में होंगे जो ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने में सफल होंगे।
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