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Reading: IBC के 10 साल पूरे: अदाणी को JP Associates दिलाने वाले कानून से बैंकों को मिले ₹4.32 लाख करोड़, जानिए कैसे बदली भारत की वित्तीय व्यवस्था
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IBC के 10 साल पूरे: अदाणी को JP Associates दिलाने वाले कानून से बैंकों को मिले ₹4.32 लाख करोड़, जानिए कैसे बदली भारत की वित्तीय व्यवस्था

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 4:28 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
ibc-10-years-adani-jp-associates-bank-recovery-india-hindi-news
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भारत में जब कोई बड़ी कंपनी कर्ज के बोझ तले दबकर डूबने लगती है, तो उसका असर सिर्फ उस कंपनी तक सीमित नहीं रहता। बैंकों का पैसा फंसता है, लाखों नौकरियां खतरे में पड़ती हैं और निवेशकों का भरोसा भी कमजोर होता है। इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने साल 2016 में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता यानी Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) लागू किया था। अब इस कानून के 10 साल पूरे हो चुके हैं और सरकार इसे भारत की वित्तीय व्यवस्था में बड़ा सुधार मान रही है। हाल ही में वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने कहा कि IBC ने देश की बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने, फंसे हुए कर्ज की वसूली बढ़ाने और संकटग्रस्त कंपनियों को दोबारा पटरी पर लाने में अहम भूमिका निभाई है। यही वह कानून है जिसके जरिए Gautam Adani के समूह ने कर्ज में डूबी Jaiprakash Associates का अधिग्रहण किया।

Contents
क्या है IBC और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?बैंकों को मिली ₹4.32 लाख करोड़ की बड़ी राहतअदाणी के हाथ कैसे आई JP Associates?IBC में लगातार हुए बदलावअब तक कितनी कंपनियां आईं IBC के दायरे में?IBC को लेकर क्या हैं चुनौतियां?1. समाधान में देरी2. Haircut विवाद3. NCLT पर दबाव4. छोटे लेनदारों की चिंताभारत की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है IBC?आगे क्या?

क्या है IBC और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

IBC लागू होने से पहले भारत में किसी कंपनी के दिवालिया होने पर उसका समाधान निकालना बेहद लंबी और जटिल प्रक्रिया होती थी। कई मामलों में बैंक वर्षों तक अपने पैसे का इंतजार करते रहते थे। अदालतों में केस फंस जाते थे और कंपनियों की संपत्तियां धीरे-धीरे बेकार हो जाती थीं।

2016 में लागू किए गए IBC का मुख्य उद्देश्य था दिवालिया कंपनियों का समयबद्ध समाधान, बैंकों के फंसे कर्ज की रिकवरी बढ़ाना, कंपनियों को बंद होने से बचाना, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों का भरोसा मजबूत करन. इस कानून के तहत यदि कोई कंपनी अपना कर्ज चुकाने में असमर्थ होती है, तो उसके खिलाफ National Company Law Tribunal (NCLT) में दिवाला प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसके बाद इच्छुक कंपनियां उस कंपनी को खरीदने या उसका पुनर्गठन करने के लिए Resolution Plan जमा करती हैं।

The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016, has changed India’s approach to business distress from delay and uncertainty to resolution and revival.

Strengthening confidence among creditors, investors and enterprises, it has become a cornerstone of India’s financial reform… pic.twitter.com/QuXALoNj22

— Nirmala Sitharaman Office (@nsitharamanoffc) May 28, 2026

बैंकों को मिली ₹4.32 लाख करोड़ की बड़ी राहत

केंद्र सरकार के अनुसार, IBC के तहत मंजूर किए गए Resolution Plans के जरिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अब तक करीब ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली हो चुकी है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि IBC लागू होने से पहले बड़ी कंपनियों के डूबे हुए कर्ज की रिकवरी बेहद कम होती थी।

भारतीय बैंकिंग सेक्टर लंबे समय तक Non-Performing Assets (NPA) की समस्या से जूझता रहा। खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टील, पावर और रियल एस्टेट सेक्टर की कई कंपनियां भारी कर्ज में डूब गई थीं। IBC लागू होने के बाद इन मामलों को तेजी से निपटाने की कोशिश शुरू हुई। सरकार का दावा है कि इस कानून ने बैंकों की बैलेंस शीट को मजबूत करने में मदद की है और नए लोन देने की क्षमता बढ़ाई है।

अदाणी के हाथ कैसे आई JP Associates?

IBC की सबसे चर्चित प्रक्रियाओं में से एक Jaiprakash Associates का मामला रहा। कभी देश की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में गिनी जाने वाली यह कंपनी भारी कर्ज के बोझ तले दब गई थी। 3 जून 2024 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने कंपनी के खिलाफ Insolvency Proceedings शुरू करने की अनुमति दी थी। इसके बाद कई कंपनियों ने अपने Resolution Plans जमा किए। आखिरकार लेंडर्स ने Adani Group के प्रस्ताव को सबसे बेहतर माना। 17 मार्च 2026 को NCLT ने अदाणी समूह को JP Associates के अधिग्रहण की मंजूरी दे दी। इस डील को IBC के सबसे बड़े और हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस अधिग्रहण से कंपनी की कई परियोजनाओं को दोबारा गति मिल सकती है, बैंकों को फंसे कर्ज की रिकवरी होगी, कर्मचारियों और सप्लायर्स को राहत मिल सकती है

IBC में लगातार हुए बदलाव

IBC लागू होने के बाद सरकार ने इसमें कई संशोधन किए हैं। शुरुआत में कंपनियों के समाधान में देरी, कानूनी विवाद और Haircut को लेकर कई सवाल उठे थे। इसके बाद सरकार ने प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए लगातार बदलाव किए।

2026 में सरकार ने “Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Act, 2026” भी लागू किया है। इसका उद्देश्य Resolution Process को और तेज करना, छोटे मामलों का जल्दी निपटारा, Litigation कम करना, Creditors के हितों की बेहतर सुरक्षा. बताया जा रहा है कि नए संशोधनों से भविष्य में दिवालिया मामलों के समाधान में लगने वाला समय और कम हो सकता है।

अब तक कितनी कंपनियां आईं IBC के दायरे में?

रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, 2016 से मार्च 2026 तक कुल 8987 Corporate Debtors को IBC प्रक्रिया में शामिल किया गया। इनमें से लगभग 64 प्रतिशत मामलों का समाधान हो चुका है। इनमें सफल Resolution Plans, Settlement/Withdrawal, Liquidation जैसे रास्तों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, बड़ी संख्या में कंपनियां Liquidation तक भी पहुंची हैं, जिससे यह बहस लगातार जारी है कि क्या सभी मामलों में कंपनियों को बचाया जा सका।

IBC को लेकर क्या हैं चुनौतियां?

हालांकि IBC को भारत के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में गिना जाता है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।

1. समाधान में देरी

कई मामलों में प्रक्रिया 270 दिनों से कहीं ज्यादा लंबी चली जाती है।

2. Haircut विवाद

कुछ मामलों में बैंकों को अपने मूल कर्ज का बहुत छोटा हिस्सा ही वापस मिल पाया, जिस पर आलोचना हुई।

3. NCLT पर दबाव

बढ़ते मामलों के कारण ट्रिब्यूनल्स पर भारी बोझ है।

4. छोटे लेनदारों की चिंता

Operational Creditors को कई बार कम रिकवरी मिलने की शिकायत रहती है।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है IBC?

IBC को सिर्फ दिवालिया कानून नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक व्यवस्था में विश्वास बढ़ाने वाले सुधार के रूप में देखा जाता है। जब निवेशकों और बैंकों को यह भरोसा होता है कि डिफॉल्ट की स्थिति में कानूनी समाधान संभव है, तब निवेश बढ़ता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि:

  • IBC ने Credit Discipline मजबूत किया
  • बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्ट पर दबाव बढ़ाया
  • बैंकिंग सेक्टर को राहत दी
  • विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत किया

यही कारण है कि पिछले 10 वर्षों में IBC भारत की आर्थिक नीतियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

आगे क्या?

आने वाले वर्षों में सरकार IBC प्रक्रिया को और डिजिटल, तेज और पारदर्शी बनाने पर जोर दे सकती है। साथ ही MSME सेक्टर और छोटे कर्ज मामलों के लिए अलग तंत्र को भी मजबूत किया जा सकता है। JP Associates जैसे बड़े मामलों ने यह दिखाया है कि IBC सिर्फ कंपनियों को बंद करने का कानून नहीं, बल्कि संकटग्रस्त व्यवसायों को नया जीवन देने का भी माध्यम बन सकता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समाधान प्रक्रिया कितनी तेज, निष्पक्ष और प्रभावी रहती है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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