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Reading: IRDAI Rules: इंश्योरेंस कंपनियों के दावों की खुलेगी पोल, क्लेम सेटलमेंट के नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी
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IRDAI Rules: इंश्योरेंस कंपनियों के दावों की खुलेगी पोल, क्लेम सेटलमेंट के नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 1:31 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
irdai-insurance-claim-settlement-rules-big-change
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भारत में इंश्योरेंस लेने वालों की सबसे बड़ी शिकायत क्या होती है?
प्रीमियम समय पर भरने के बावजूद जब क्लेम का समय आता है तो कंपनियां अलग-अलग नियमों और तकनीकी कारणों का हवाला देकर भुगतान टाल देती हैं। कई बार क्लेम “सेटल” दिखा दिया जाता है, लेकिन ग्राहक को पूरा पैसा नहीं मिलता। अब इसी गड़बड़ी पर लगाम लगाने के लिए बीमा नियामक भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी IRDAI सख्त हो गया है।

Contents
आखिर अभी क्या समस्या है?‘सेटल्ड क्लेम’ का खेल कैसे चलता है?IRDAI अब क्या बदलना चाहता है?पूर्व IRDAI सदस्य ने क्या कहा?क्लेम सेटलमेंट रेशियो आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?ग्राहकों को क्या फायदा होगा?1. कंपनियों की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी2. क्लेम रिजेक्शन पर दबाव बढ़ेगा3. कानूनी विवाद कम हो सकते हैं4. सही कंपनी चुनना आसान होगाबीमा सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?आगे क्या हो सकता है?

IRDAI ने नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों से कहा है कि वे बीमा क्लेम की एक समान और स्पष्ट परिभाषा तय करें। साथ ही क्लेम सेटलमेंट रेशियो को मापने का तरीका भी सभी कंपनियों के लिए एक जैसा बनाने को कहा गया है। माना जा रहा है कि इस कदम के बाद इंश्योरेंस कंपनियों के दावों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी और ग्राहकों को भ्रमित करना आसान नहीं रहेगा।

आखिर अभी क्या समस्या है?

फिलहाल भारत में अलग-अलग बीमा कंपनियां अपनी सुविधा के हिसाब से क्लेम को रिकॉर्ड करती हैं। यही वजह है कि कई कंपनियों का क्लेम सेटलमेंट रेशियो कागजों पर बेहद शानदार दिखाई देता है, लेकिन असल में ग्राहकों को भुगतान पाने में भारी परेशानी होती है।

उदाहरण के तौर पर कुछ कंपनियां जैसे ही ग्राहक क्लेम की जानकारी देता है, उसे सिस्टम में “क्लेम” के रूप में दर्ज कर लेती हैं। वहीं कुछ कंपनियां पहले यह जांचती हैं कि पॉलिसी के तहत भुगतान बनता भी है या नहीं, उसके बाद ही उसे क्लेम मानती हैं।

यही अंतर बाद में क्लेम सेटलमेंट रेशियो को प्रभावित करता है। किसी कंपनी का रेशियो ऊंचा दिख सकता है, जबकि उसने बड़ी संख्या में मामलों को तकनीकी कारणों से बंद किया हो।

‘सेटल्ड क्लेम’ का खेल कैसे चलता है?

आम ग्राहक के लिए “क्लेम सेटल्ड” का मतलब साफ है — पैसा मिल गया। लेकिन कई बीमा कंपनियां उन मामलों को भी “सेटल्ड” दिखा देती हैं जिन्हें उन्होंने दस्तावेजों की कमी, तकनीकी खामी या पॉलिसी कवरेज के बाहर बताकर बंद कर दिया।

यानी ग्राहक को भुगतान नहीं मिला, फिर भी कंपनी के रिकॉर्ड में वह क्लेम “निपटाया हुआ” माना गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि यही सबसे बड़ी समस्या है। इससे कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर दिखता है और ग्राहक सही तुलना नहीं कर पाते। कई बार कंपनियां ग्राहकों से “फुल एंड फाइनल सेटलमेंट” के वाउचर पर हस्ताक्षर भी करा लेती हैं, जबकि ग्राहक संतुष्ट नहीं होता।

IRDAI अब क्या बदलना चाहता है?

बीमा क्षेत्र के सूत्रों के मुताबिक IRDAI चाहता है कि पूरे उद्योग में क्लेम की एक समान परिभाषा लागू हो। इससे हर कंपनी को एक ही मानक पर अपना डेटा दिखाना होगा।

अगर ऐसा होता है तो:

  • कौन सी कंपनी सबसे तेजी से भुगतान करती है
  • कौन सबसे ज्यादा क्लेम रिजेक्ट करती है
  • कितने मामलों में ग्राहक कोर्ट पहुंचे
  • कितने क्लेम तकनीकी आधार पर बंद हुए

…इन सभी चीजों की असली तस्वीर सामने आ सकेगी।

पूर्व IRDAI सदस्य ने क्या कहा?

IRDAI के पूर्व सदस्य के. के. श्रीनिवासन ने इस मुद्दे पर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि किसी क्लेम को तभी “सेटल” माना जाना चाहिए जब ग्राहक यह स्वीकार कर ले कि उसका मामला पूरी तरह निपट गया है।

उनके मुताबिक यदि कंपनी क्लेम रिजेक्ट करती है और ग्राहक अदालत में चुनौती देता है, तो कोर्ट के अंतिम फैसले और उसके पालन तक उस क्लेम को “अनसेटल्ड” माना जाना चाहिए।

यह बयान इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे कंपनियों के वर्तमान क्लेम डेटा पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

क्लेम सेटलमेंट रेशियो आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

जब भी कोई व्यक्ति हेल्थ इंश्योरेंस, मोटर इंश्योरेंस या किसी अन्य प्रकार की पॉलिसी खरीदता है, तो वह सबसे पहले कंपनी का Claim Settlement Ratio (CSR) देखता है।

यह रेशियो बताता है कि कंपनी ने कुल प्राप्त दावों में से कितने मामलों का निपटारा किया। लेकिन यदि हर कंपनी “सेटलमेंट” की अलग परिभाषा इस्तेमाल करे, तो ग्राहक सही तुलना नहीं कर पाता।

मान लीजिए:

  • कंपनी A ने 100 में से 95 क्लेम “सेटल” दिखाए
  • कंपनी B ने 100 में से 85 क्लेम “सेटल” दिखाए

लेकिन कंपनी A ने कई मामलों को तकनीकी आधार पर बंद कर दिया और कंपनी B ने वास्तव में भुगतान किया — तो असली स्थिति बिल्कुल अलग होगी।

इसी भ्रम को खत्म करने के लिए IRDAI यह कदम उठा रहा है।

ग्राहकों को क्या फायदा होगा?

यदि नया फ्रेमवर्क लागू होता है तो आम ग्राहकों को कई बड़े फायदे मिल सकते हैं।

1. कंपनियों की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी

ग्राहक जान पाएंगे कि कौन सी कंपनी वास्तव में भुगतान करती है और कौन सिर्फ रिकॉर्ड बेहतर दिखाती है।

2. क्लेम रिजेक्शन पर दबाव बढ़ेगा

कंपनियां मनमाने तरीके से क्लेम बंद करने से बचेंगी क्योंकि डेटा अधिक पारदर्शी होगा।

3. कानूनी विवाद कम हो सकते हैं

यदि प्रक्रिया साफ होगी तो ग्राहकों और कंपनियों के बीच विवाद कम होने की संभावना है।

4. सही कंपनी चुनना आसान होगा

हेल्थ और मोटर इंश्योरेंस खरीदते समय ग्राहक ज्यादा भरोसेमंद तुलना कर सकेंगे।

बीमा सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम भारतीय बीमा उद्योग में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में हेल्थ इंश्योरेंस और मोटर इंश्योरेंस से जुड़े विवाद तेजी से बढ़े हैं। सोशल मीडिया पर भी ग्राहकों की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।

IRDAI पहले भी बीमा कंपनियों को ग्राहक हितों को लेकर चेतावनी देता रहा है। अब क्लेम सेटलमेंट की परिभाषा को मानकीकृत करना इस दिशा में अगला बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा कि वे केवल आंकड़ों का खेल खेलने के बजाय वास्तविक ग्राहक संतुष्टि पर ध्यान दें।

आगे क्या हो सकता है?

सूत्रों के मुताबिक जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने अपने सुझाव IRDAI को सौंप दिए हैं। आने वाले महीनों में नियामक इस पर नया दिशानिर्देश जारी कर सकता है।

यदि नया नियम लागू होता है, तो भारत में इंश्योरेंस कंपनियों की क्लेम रिपोर्टिंग प्रणाली पूरी तरह बदल सकती है। इससे ग्राहकों को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद डेटा मिलेगा। बीमा क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह कदम कंपनियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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