भारत अब ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को लेकर पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रणनीति पर काम कर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आयात पर भारी निर्भरता के बीच देश की सबसे बड़ी तेल एवं गैस कंपनी ONGC ने बड़ा कदम उठाया है।
ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन यानी ONGC ने ब्रिटिश ऊर्जा दिग्गज BP Plc की सहयोगी कंपनी BP Exploration Services India Limited के साथ समझौता किया है। इस साझेदारी का मकसद अरब सागर स्थित भारत के पश्चिमी ऑफशोर क्षेत्रों से तेल और गैस उत्पादन को तेजी से बढ़ाना है।
यह समझौता सिर्फ एक कारोबारी डील नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा समझा जा रहा है। सरकार और ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह कदम भारत की विदेशी तेल निर्भरता कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
क्यों अहम है ONGC और BP की यह साझेदारी?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। प्राकृतिक गैस के मामले में भी देश काफी हद तक आयात पर निर्भर है। ऐसे में जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई संकट पैदा होता है, उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। हाल के महीनों में ईरान-इजरायल तनाव, लाल सागर संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ाई है। भारत के लिए भी यह संकेत था कि ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाना अब मजबूरी बन चुका है।
इसी पृष्ठभूमि में ONGC ने अपने पश्चिमी अपतटीय (Western Offshore) क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के लिए BP जैसी वैश्विक तकनीकी विशेषज्ञ कंपनी का साथ लिया है।
मुंबई हाई से आगे बढ़ेगी रणनीति
ONGC ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता मुंबई हाई फील्ड को छोड़कर पश्चिमी ऑफशोर बेसिन के अन्य क्षेत्रों पर केंद्रित होगा। मुंबई हाई लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा तेल उत्पादन क्षेत्र रहा है, लेकिन अब वहां उत्पादन परिपक्व अवस्था में पहुंच चुका है। कई पुराने फील्ड्स में उत्पादन धीरे-धीरे कम हो रहा है। ऐसे में नई तकनीक, उन्नत ड्रिलिंग और बेहतर रिजर्व मैनेजमेंट की जरूरत महसूस की जा रही थी। BP इसी क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती है।
ONGC ने BP की यूनिट का चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया (ICB) के जरिए किया है। इसका उद्देश्य पश्चिमी समुद्री क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक लागू कर उत्पादन बढ़ाना है।
अगले 10 वर्षों में कितना बढ़ेगा उत्पादन?
ONGC के अनुमान के अनुसार इस साझेदारी का असर अगले दशक में बड़े स्तर पर दिखाई दे सकता है।
कच्चे तेल उत्पादन का अनुमान
- मौजूदा उत्पादन: 46.25 मिलियन मीट्रिक टन (MMT)
- संभावित उत्पादन: 51.26 MMT
- अनुमानित वृद्धि: लगभग 10.8%
प्राकृतिक गैस उत्पादन का अनुमान
- मौजूदा उत्पादन: 82.68 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM)
- संभावित उत्पादन: 108.69 BCM
- अनुमानित वृद्धि: लगभग 31.5%
अगर तेल और गैस दोनों को मिलाकर देखा जाए तो कुल उत्पादन में लगभग 24% की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है। ONGC का कहना है कि इस परियोजना का शुरुआती असर वित्त वर्ष 2027 से दिखाई देना शुरू हो सकता है, जबकि 2030 के बाद इसका बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।
भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे होगा फायदा?
ऊर्जा आयात भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो उसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ता है पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, महंगाई पर दबाव आता है, रुपये पर असर पड़ता है, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट महंगे होते हैं, उर्वरक और बिजली उत्पादन लागत बढ़ती है
अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो भारत की आयात निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सकती है। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू गैस उत्पादन बढ़ने से शहरों में PNG और CNG सप्लाई नेटवर्क को भी मजबूती मिलेगी।
अरब सागर क्यों बन रहा रणनीतिक केंद्र?
भारत का पश्चिमी ऑफशोर बेसिन देश का सबसे महत्वपूर्ण हाइड्रोकार्बन क्षेत्र माना जाता है। यहां कुल 43 ब्लॉक मौजूद हैं और कई क्षेत्रों से पिछले चार दशकों से उत्पादन जारी है। मुंबई ऑफशोर बेसिन लंबे समय से भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा आधार रहा है। हालांकि अब कई फील्ड्स परिपक्व हो चुके हैं, इसलिए उत्पादन बनाए रखने और बढ़ाने के लिए नई तकनीक जरूरी हो गई है।
BP जैसी कंपनियों के पास:
- Enhanced Oil Recovery (EOR)
- Advanced Reservoir Management
- Deepwater Technology
- Digital Oilfield Solutions
जैसी आधुनिक तकनीकों का अनुभव है। ONGC इन्हीं तकनीकी क्षमताओं का फायदा उठाना चाहती है।
जनवरी 2025 में भी हुआ था समझौता
यह पहला मौका नहीं है जब ONGC ने BP के साथ हाथ मिलाया हो। इससे पहले जनवरी 2025 में ONGC ने मुंबई हाई फील्ड के लिए BP की दूसरी यूनिट के साथ समझौता किया था। कंपनी के अनुसार वहां उत्पादन में गिरावट रोकने और स्थिरता बनाए रखने में सकारात्मक नतीजे मिले। इसी अनुभव के आधार पर अब पूरे पश्चिमी ऑफशोर क्षेत्र में इस मॉडल को लागू करने का फैसला लिया गया है।
वैश्विक ऊर्जा राजनीति में भारत की नई रणनीति
दुनिया इस समय ऊर्जा सुरक्षा के नए दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर जोर बढ़ाया। चीन लगातार अपने सामरिक तेल भंडार मजबूत कर रहा है। अमेरिका भी घरेलू उत्पादन बढ़ाने की नीति पर काम कर रहा है। भारत अब इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ता दिख रहा है। सरकार पहले ही रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने, LNG टर्मिनल विस्तार, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, और घरेलू एक्सप्लोरेशन पर जोर दे रही है। ONGC-BP समझौता इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
क्या इससे पेट्रोल-डीजल सस्ते होंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने का फायदा लंबी अवधि में जरूर मिल सकता है, लेकिन इसका सीधा असर तुरंत पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं दिखेगा।
भारत में ईंधन कीमतें कई फैक्टर्स पर निर्भर करती हैं अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल,डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत, वैश्विक सप्लाई चेन हालांकि घरेलू उत्पादन बढ़ने से भविष्य में आयात जोखिम कम हो सकता है, जिससे ऊर्जा कीमतों में स्थिरता लाने में मदद मिल सकती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
ऊर्जा किसी भी देश की आर्थिक ताकत की रीढ़ मानी जाती है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर और सस्ती ऊर्जा सप्लाई बेहद जरूरी होती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे में आने वाले वर्षों में तेल और गैस की मांग और बढ़ने वाली है।
ONGC और BP की यह साझेदारी सिर्फ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि भारत अब ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदम उठा रहा है।
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