China Export Ban India: कोरोना महामारी के बाद दुनिया ने चीन पर निर्भर सप्लाई चेन के खतरे को करीब से देखा। इसी बीच भारत ने खुद को “दुनिया की अगली मैन्युफैक्चरिंग हब” के रूप में पेश करना शुरू किया। एपल के सप्लायर्स भारत आए, सेमीकंडक्टर प्लांट्स की घोषणाएं हुईं और इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में रिकॉर्ड तेजी देखने को मिली। लेकिन अब चीन के नए निर्यात नियमों ने भारत की इस पूरी रणनीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
चीन ने हाल ही में अपने नए स्टेट काउंसिल डिक्री 834 और 835 लागू किए हैं। इन नियमों के तहत रेयर अर्थ एलिमेंट्स, हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग मशीनों, एडवांस टेक्नोलॉजी और कुछ संवेदनशील इंडस्ट्रियल उपकरणों के निर्यात पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण बढ़ाया गया है। इसका सीधा असर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, बैटरी और सेमीकंडक्टर सेक्टर पर पड़ सकता है।
भारत फिलहाल इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी अभी भी चीन पर भारी निर्भरता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चीन सप्लाई चेन को भू-राजनीतिक हथियार बनाकर भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षा को धीमा करना चाहता है?
भारत का बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स सपना, लेकिन चीन पर भारी निर्भरता
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों और उद्योग रिपोर्ट्स के अनुसार 2015 में जहां इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात करीब 8.6 अरब डॉलर था, वहीं 2025 तक यह बढ़कर लगभग 47 अरब डॉलर पहुंच गया। सरकार का लक्ष्य 2026 के अंत तक इसे 120 अरब डॉलर तक ले जाने का है। भारतीय मुद्रा में यह आंकड़ा करीब ₹11.4 लाख करोड़ बैठता है।
लेकिन इस तेजी के पीछे एक बड़ी सच्चाई छिपी है। भारत में बनने वाले कई इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए जरूरी मशीनरी, डिस्प्ले कंपोनेंट्स, चिप्स, रेयर अर्थ मैग्नेट्स, बैटरी मटेरियल, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स अब भी बड़े पैमाने पर चीन से आते हैं। यानी भारत फिलहाल “फाइनल असेंबली हब” ज्यादा है, जबकि कोर सप्लाई चेन अभी भी चीन के नियंत्रण में है।
इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि चीन के नए नियम लागू होने के बाद कई भारतीय कंपनियों ने अपने चीनी सप्लायर्स के साथ इमरजेंसी बातचीत शुरू कर दी है। कंपनियों को डर है कि अगर मशीनों और हाई-वैल्यू कंपोनेंट्स की सप्लाई धीमी हुई, तो नए निवेश और उत्पादन विस्तार योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
आखिर क्या हैं चीन के डिक्री 834 और 835?
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया है। अमेरिका और यूरोप के साथ बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच चीन अब उन टेक्नोलॉजी और कच्चे माल के निर्यात पर नियंत्रण मजबूत कर रहा है, जिन पर पूरी दुनिया निर्भर है।
नए डिक्री 834 और 835 के तहत एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी की निगरानी बढ़ेगी रेयर अर्थ मटेरियल्स के निर्यात पर सख्ती होगी, हाई-एंड इंडस्ट्रियल मशीनों के एक्सपोर्ट को नियंत्रित किया जाएगा संवेदनशील टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर सरकारी मंजूरी जरूरी हो सकती है, चीन से उत्पादन बाहर शिफ्ट करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई का प्रावधान भी जोड़ा गया है विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ व्यापारिक फैसला नहीं बल्कि रणनीतिक आर्थिक दबाव की नीति है।
रेयर अर्थ एलिमेंट्स क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
रेयर अर्थ एलिमेंट्स आधुनिक टेक्नोलॉजी की रीढ़ माने जाते हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल मोटर्स, मोबाइल फोन, सेमीकंडक्टर, मिसाइल सिस्टम, विंड टर्बाइन, बैटरी, हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट्स में होता है।
दुनिया की रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा चीन के पास है। यही वजह है कि अगर चीन सप्लाई सीमित करता है, तो इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो उद्योगों पर सीधा असर पड़ सकता है। भारत के पास भी कुछ रेयर अर्थ संसाधन मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्रोसेसिंग और बड़े स्तर पर उपयोग की क्षमता अभी सीमित है।
ऑटो सेक्टर पर सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञ मानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स से ज्यादा गंभीर असर ऑटो सेक्टर पर पड़ सकता है। भारत वित्त वर्ष 2025 में अपने लगभग 26 फीसदी ऑटो कंपोनेंट्स चीन से आयात कर रहा है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स, सेंसर, चिप्स, बैटरी पार्ट्स, डिस्प्ले मॉड्यूल जैसे हाई-वैल्यू कंपोनेंट्स शामिल हैं।
कार्स अनलिमिटेड के फाउंडर मुस्तफा सिंगापुरवाला के मुताबिक आज की आधुनिक कारों में 3000 तक चिप्स इस्तेमाल होते हैं। अगर सप्लाई बाधित हुई, तो सिर्फ गाड़ियों की कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी बल्कि नई लॉन्चिंग में देरी, लंबा वेटिंग पीरियड, फीचर्स में कटौती, उत्पादन में कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन अब सप्लाई चेन को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
भारत सरकार की नई रणनीति
केंद्र सरकार भी अब इस खतरे को गंभीरता से लेने लगी है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा कि भारत कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए सेक्टर आधारित निवेश रणनीति तैयार कर रहा है। सरकार की ₹33,660 करोड़ की “भारत औद्योगिक विकास योजना” के तहत अगले तीन वर्षों में 50 नए इंडस्ट्रियल पार्क विकसित किए जाने की तैयारी है। इसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना और आयात निर्भरता कम करना है।
इसके अलावा सरकार PLI स्कीम, सेमीकंडक्टर मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टर, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, लोकल कंपोनेंट उत्पादन पर भी तेजी से काम कर रही है।
सिर्फ असेंबली नहीं, अब टेक्नोलॉजी भी बनानी होगी
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को सिर्फ मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की असेंबली तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली ताकत तब आएगी जब देश अपने चिप्स बनाए, घरेलू कंपोनेंट उद्योग विकसित करे, रिसर्च और डिजाइन क्षमता बढ़ाए, रेयर अर्थ प्रोसेसिंग शुरू करे, मशीन टूल्स टेक्नोलॉजी विकसित करे.
NXTCELL Mobility के CEO अतुल विवेक का कहना है कि भारत के पास बड़ा अवसर जरूर है, लेकिन मजबूत घरेलू सप्लाई नेटवर्क और लॉन्ग-टर्म रणनीति के बिना यह मौका हाथ से निकल सकता है।
LEDX Technology के MD संकेत रामभिया के अनुसार दुनिया अब चीन पर पूरी तरह निर्भर रहने के खतरे को समझ चुकी है और कई वैश्विक कंपनियां वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग बेस तलाश रही हैं। भारत के पास इस बदलाव का फायदा उठाने का बड़ा मौका है।
क्या भारत के लिए यह खतरा है या अवसर?
चीन की सख्ती अल्पकाल में भारत के लिए चुनौती जरूर बन सकती है। लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि यही दबाव भारत को आत्मनिर्भर सप्लाई चेन बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने के लिए मजबूर करेगा। अगर भारत घरेलू कंपोनेंट निर्माण बढ़ाए, टेक्नोलॉजी रिसर्च में निवेश करे, रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करे, ग्लोबल कंपनियों को आकर्षित करे तो आने वाले वर्षों में वह चीन का मजबूत विकल्प बन सकता है।
हालांकि फिलहाल स्थिति यही बताती है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ जितनी तेज हो रही है, उतना ही बड़ा जोखिम चीन की सप्लाई चेन पकड़ भी बनती जा रही है। आने वाले कुछ साल तय करेंगे कि भारत इस चुनौती को संकट में बदलता है या अवसर में।
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