Highlights
- नितिन गडकरी ने इथेनॉल आधारित स्वदेशी कुकिंग स्टोव तकनीक पेश की
- पानी में 7% इथेनॉल मिलाकर तैयार होगी खाना पकाने की लौ
- कमर्शियल LPG से सस्ता बताया जा रहा नया विकल्प
- भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम
- युवाओं में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए ₹40 करोड़ की परियोजना
नई दिल्ली। भारत में स्वच्छ ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari ने इथेनॉल आधारित स्वदेशी कुकिंग स्टोव तकनीक का अनावरण किया है। इस नई तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इसमें पानी और इथेनॉल के मिश्रण से ऐसी लौ तैयार की जा सकती है, जिससे खाना पकाया जा सके। गडकरी का दावा है कि यह तकनीक कमर्शियल एलपीजी गैस की तुलना में सस्ती पड़ सकती है और भविष्य में घरेलू रसोई व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है।
नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा विकसित यह तकनीक देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है। उन्होंने बताया कि केवल 7 प्रतिशत इथेनॉल को पानी में मिलाकर ऐसी ज्वाला तैयार की जा सकती है जो खाना पकाने के लिए पर्याप्त होगी। यह तकनीक न केवल सस्ती है बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी अधिक टिकाऊ मानी जा रही है।
क्या है इथेनॉल आधारित स्टोव तकनीक?
इथेनॉल एक बायोफ्यूल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। भारत पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रहा है। अब इसी दिशा में इसे घरेलू रसोई तक पहुंचाने की तैयारी हो रही है।
नई तकनीक में पानी और इथेनॉल के मिश्रण से नियंत्रित लौ तैयार की जाती है। आमतौर पर लोग इथेनॉल को वाहनों के ईंधन के रूप में जानते हैं, लेकिन अब इसका इस्तेमाल खाना पकाने के लिए भी संभव बनाने की कोशिश की जा रही है। यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो घरेलू और व्यावसायिक रसोई दोनों में LPG पर निर्भरता कम हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे देश में जहां हर साल बड़ी मात्रा में एलपीजी आयात करनी पड़ती है, वहां इस तरह की तकनीक ऊर्जा खर्च को कम करने में मदद कर सकती है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव भी घट सकता है।
भारत की तेल निर्भरता कम करने की कोशिश
भारत वर्तमान में अपनी जरूरत का लगभग 87 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार पिछले कई वर्षों से वैकल्पिक ईंधनों पर जोर दे रही है।
सरकार ने 2014 में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत बेहद छोटे स्तर से की थी। उस समय मिश्रण का स्तर लगभग 1.5 प्रतिशत था। अब इसे तेजी से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। गडकरी लगातार इस नीति के बड़े समर्थक रहे हैं और कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कह चुके हैं कि इथेनॉल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।
उनका मानना है कि यदि देश में बड़े स्तर पर इथेनॉल का उत्पादन बढ़ता है तो किसानों को भी फायदा होगा। गन्ना और मक्का उत्पादक किसानों की आय बढ़ सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
कमर्शियल LPG से कितना सस्ता हो सकता है विकल्प?
हाल के वर्षों में घरेलू और कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी देखी गई है। होटल, ढाबे और छोटे व्यवसाय चलाने वाले लोग लगातार बढ़ती गैस कीमतों से प्रभावित हुए हैं। ऐसे में इथेनॉल आधारित स्टोव को एक संभावित सस्ते विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि सरकार या मंत्रालय की तरफ से अभी इसकी सटीक लागत सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन गडकरी ने दावा किया कि यह कमर्शियल LPG की तुलना में सस्ता साबित हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो छोटे कारोबारियों, स्ट्रीट फूड विक्रेताओं और मध्यम वर्गीय परिवारों को राहत मिल सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी सफलता काफी हद तक इथेनॉल की उपलब्धता, वितरण व्यवस्था और उपकरण की सुरक्षा पर निर्भर करेगी। यदि सरकार इसे बड़े पैमाने पर लागू करती है तो आने वाले वर्षों में यह ग्रामीण भारत के लिए भी उपयोगी विकल्प बन सकता है।
पर्यावरण को भी होगा फायदा
इथेनॉल को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है क्योंकि इससे पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन होता है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है और ऐसे में वैकल्पिक ईंधनों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि रसोई गैस के विकल्प के रूप में इथेनॉल आधारित तकनीक सफल होती है तो इससे कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा यह स्वदेशी तकनीक होने के कारण “मेक इन इंडिया” अभियान को भी मजबूती दे सकती है।
युवाओं में विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए ₹40 करोड़ की योजना
कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने यह भी घोषणा की कि सरकार युवाओं और बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए 40 करोड़ रुपये की परियोजना पर काम कर रही है। उनका कहना था कि भारत को भविष्य में तकनीकी महाशक्ति बनाने के लिए नई पीढ़ी को विज्ञान और नवाचार से जोड़ना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि देश में कई युवा वैज्ञानिक और इंजीनियर नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं और सरकार उन्हें प्रोत्साहित करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। इथेनॉल आधारित स्टोव तकनीक भी इसी सोच का हिस्सा है, जिसमें स्वदेशी नवाचार को प्राथमिकता दी गई है।
क्या भविष्य में LPG की जगह ले पाएगी यह तकनीक?
फिलहाल यह तकनीक शुरुआती चरण में है और इसे बड़े पैमाने पर अपनाने में समय लग सकता है। सुरक्षा मानक, लागत, सप्लाई चेन और उपभोक्ता स्वीकार्यता जैसे कई पहलुओं पर काम करना बाकी है। हालांकि जिस तरह से भारत इलेक्ट्रिक वाहनों और इथेनॉल मिश्रण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह संभावना मजबूत होती दिख रही है कि आने वाले वर्षों में घरेलू ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
यदि यह तकनीक सफल होती है तो भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो सकता है जो घरेलू खाना पकाने के लिए वैकल्पिक और स्वच्छ ईंधन का व्यापक इस्तेमाल करेंगे। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि आयात बिल कम करने और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल सकती है।
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