नई दिल्ली: भारत के आम कारोबार को इस सीजन में बड़ा झटका लगा है। जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी है। यह फैसला तब लिया गया जब जापानी प्लांट क्वारंटाइन अधिकारियों ने भारत के कुछ ट्रीटमेंट सेंटरों में फ्यूमिगेशन और फाइटोसैनिटरी मानकों से जुड़ी गंभीर कमियां पाईं। इसका असर खासतौर पर केसर, अल्फांसो, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी लोकप्रिय भारतीय किस्मों के निर्यात पर पड़ा है।
हालांकि जापान भारतीय आमों का सबसे बड़ा खरीदार नहीं है, लेकिन यह बाजार प्रीमियम क्वालिटी भारतीय आमों के लिए काफी अहम माना जाता है। ऐसे में एक्सपोर्टर्स को डर है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता है।
आखिर जापान ने क्यों रोका भारतीय आमों का आयात?
इकोनॉमिक टाइम्स (ET) की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में जापानी अधिकारियों ने भारत के कुछ अधिकृत ट्रीटमेंट सेंटरों का निरीक्षण किया था। इस दौरान फ्यूमिगेशन प्रक्रिया और उससे जुड़े सुरक्षा मानकों में कई खामियां पाई गईं।
फ्यूमिगेशन एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें जहरीली गैसों के जरिए फलों में मौजूद कीट और लार्वा खत्म किए जाते हैं ताकि दूसरे देशों में बीमारियां या कीट न फैलें। जापान इस मामले में बेहद सख्त नियम लागू करता है। जापान के सरकारी प्लांट प्रोटेक्शन स्टेशन की ओर से 31 मार्च 2026 को जारी अधिसूचना में कहा गया कि 25 मार्च 2026 या उसके बाद भारत की ओर से जारी किए गए निरीक्षण प्रमाण पत्रों वाली खेप स्वीकार नहीं की जाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत से जापान भेजे जाने वाले आम प्रभावी रूप से रुक गए।
किन भारतीय आमों पर पड़ा असर?
जापान में भारतीय आमों की कुछ विशेष किस्मों की अच्छी मांग रहती है। इनमें शामिल हैं गुजरात का केसर आम, महाराष्ट्र का अल्फांसो, उत्तर भारत का लंगड़ा, दक्षिण भारत का बंगनपल्ली.
इन किस्मों को जापान में प्रीमियम फ्रूट कैटेगरी में माना जाता है। खासतौर पर अल्फांसो और केसर आम वहां भारतीय समुदाय और हाई-एंड रिटेल मार्केट में लोकप्रिय हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत से जापान भेजे गए ताजे और प्रोसेस्ड आमों का कुल निर्यात करीब 15.4 लाख डॉलर का रहा था। इनमें अकेले केसर आम का हिस्सा लगभग 2 लाख डॉलर बताया गया है।
भारत सरकार की चुप्पी क्यों बढ़ा रही चिंता?
अब तक भारत सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है। कृषि मंत्रालय के तहत आने वाले डायरेक्टोरेट ऑफ प्लांट प्रोटेक्शन, क्वारंटीन एंड स्टोरेज और APEDA दोनों को भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला। हालांकि एक्सपोर्टर्स का कहना है कि भारतीय अधिकारी जापानी समकक्षों के साथ बातचीत कर रहे हैं ताकि फाइटोसैनिटरी मानकों को फिर से पूरा किया जा सके।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह विवाद लंबा खिंचता है तो भारतीय आमों के लिए दूसरे देशों में भी अतिरिक्त निरीक्षण और सख्ती बढ़ सकती है।
फाइटोसैनिटरी सर्टिफिकेट क्या होता है?
जब भी किसी देश में फल, सब्जियां या कृषि उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, तब यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि उनमें कोई कीट, बीमारी या जैविक खतरा न हो। इसके लिए फाइटोसैनिटरी सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। भारत में यह प्रमाण पत्र फरीदाबाद स्थित डायरेक्टोरेट ऑफ प्लांट प्रोटेक्शन, क्वारंटीन एंड स्टोरेज जारी करता है। यह एजेंसी कृषि मंत्रालय के अधीन काम करती है।
अगर आयात करने वाले देश को लगता है कि यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं हुई, तो वह खेप को रोक सकता है या पूरे आयात पर अस्थायी प्रतिबंध लगा सकता है।
जापान से ज्यादा बड़ी टेंशन अमेरिका बना
एक्सपोर्टर्स का कहना है कि जापान की रोक से नुकसान जरूर हो रहा है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता अमेरिका को भेजे जाने वाले आमों की बढ़ती एयर कार्गो लागत है।
गुजरात के एक निर्यातक के मुताबिक पिछले साल जहां हवाई माल-ढुलाई की लागत 250 से 350 रुपये प्रति किलो थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब 580-590 रुपये प्रति किलो पहुंच गई है। इस भारी बढ़ोतरी की कई वजहें हैं पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, जेट ईंधन की महंगी कीमतें, एयरलाइन रूट में बदलाव, कार्गो स्पेस की कमी.
आम से ज्यादा दवाओं को मिल रही प्राथमिकता
पुणे के एक एक्सपोर्टर ने बताया कि एयरलाइंस अब दवाओं और हाई-वैल्यू कार्गो को प्राथमिकता दे रही हैं। ऐसे में आम जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों की खेप कई बार आखिरी समय पर उतार दी जाती है। इससे एक्सपोर्टर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि आम सीमित समय तक ही ताजा रह सकता है। देरी होने पर पूरी खेप खराब होने का खतरा रहता है।
भारतीय आमों के लिए सबसे बड़े बाजार कौन से हैं?
2025-26 के दौरान भारत के आम, आम के पल्प और प्रोसेस्ड उत्पादों के सबसे बड़े बाजार ये रहे अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन, नीदरलैंड, सऊदी अरब. इन बाजारों में भारतीय आमों की मांग लगातार बढ़ रही है, खासतौर पर भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच।
क्या भारतीय किसानों पर पड़ेगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर निर्यात में लंबे समय तक रुकावट रहती है तो इसका असर किसानों की कमाई पर पड़ सकता है। खासतौर पर गुजरात और महाराष्ट्र के वे किसान प्रभावित हो सकते हैं जो निर्यात गुणवत्ता वाले आमों की खेती करते हैं।
हालांकि घरेलू बाजार में मांग मजबूत रहने से तत्काल बड़ा संकट नहीं दिख रहा, लेकिन प्रीमियम निर्यात बाजार बंद होने से कीमतों पर दबाव आ सकता है।
भारत के लिए यह मामला क्यों अहम है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। देश में हर साल करोड़ों टन आम पैदा होते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में हिस्सेदारी अभी भी सीमित है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत को कृषि निर्यात बढ़ाना है तो फाइटोसैनिटरी और क्वालिटी मानकों को और मजबूत करना होगा। विकसित देशों के बाजारों में नियम लगातार सख्त हो रहे हैं और छोटी तकनीकी कमियां भी बड़े व्यापारिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।
आगे क्या हो सकता है?
अब निगाहें भारत और जापान के बीच चल रही बातचीत पर टिकी हैं। अगर भारतीय ट्रीटमेंट सेंटरों में जरूरी सुधार कर लिए जाते हैं और जापानी अधिकारी संतुष्ट हो जाते हैं, तो आने वाले सीजन में प्रतिबंध हट सकता है। लेकिन फिलहाल आम निर्यातकों के सामने दोहरी चुनौती है जापान की सख्ती, एयर कार्गो लागत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी. इन दोनों ने मिलकर भारतीय आम कारोबार की चिंता बढ़ा दी है।
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