देशभर में पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। इस महीने अब तक तीन बार ईंधन के दाम बढ़ चुके हैं और इसके बावजूद सरकारी तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में अब केंद्र सरकार के बाद राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला वैट (VAT) कम करें ताकि आम जनता और तेल कंपनियों दोनों को राहत मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राज्यों ने वैट में कटौती नहीं की, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें और ज्यादा बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर महंगाई, ट्रांसपोर्टेशन और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ेगा।
पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों हो रहा है?
पिछले कुछ हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, सप्लाई को लेकर चिंता और डॉलर की मजबूती ने भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में जब वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है और डॉलर मजबूत होता है, तो उसका सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में करीब 5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियां भारी अंडर-रिकवरी झेल रही हैं। टैक्स हटाकर देखें तो कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 13 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 38 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान हो रहा है। यही वजह है कि अब राज्यों से भी टैक्स घटाने की मांग तेज हो गई है।
अब राज्यों पर क्यों बढ़ा दबाव?
केंद्र सरकार पहले ही एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर चुकी है। इससे उसे हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। दूसरी तरफ आम जनता भी लगातार महंगे ईंधन का बोझ उठा रही है।
ऐसे में अब यह तर्क दिया जा रहा है कि राज्य सरकारें भी अपने हिस्से का भार उठाएं और वैट कम करें। इससे दो बड़े फायदे हो सकते हैं: पेट्रोल–डीजल की कीमतों में कुछ राहत मिलेगी, तेल कंपनियों का घाटा कम होगा
एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि उपभोक्ता राज्यों में रहते हैं, इसलिए केवल केंद्र सरकार पर बोझ डालना सही नहीं होगा। राज्यों को भी राजस्व में कुछ समझौता करना पड़ेगा।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा महंगा है पेट्रोल-डीजल?
देश में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला VAT हर राज्य में अलग-अलग है। कुछ राज्यों में यह 20% के आसपास है, जबकि कई जगहों पर अतिरिक्त सेस और इंफ्रास्ट्रक्चर टैक्स जोड़ने के बाद यह 30% से भी ऊपर पहुंच जाता है।
मौजूदा समय में तेलंगाना, केरल, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे ज्यादा हैं। इन राज्यों में उच्च वैट के कारण आम उपभोक्ताओं को ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है।
हालांकि, अतीत में कुछ NDA शासित राज्यों ने वैट घटाकर राहत देने की कोशिश की थी, लेकिन कई राज्यों में टैक्स अब भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बना हुआ है।
पेट्रोल-डीजल पर टैक्स का पूरा गणित क्या है?
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल से तय नहीं होतीं। इसमें कई तरह के टैक्स शामिल होते हैं। एक लीटर पेट्रोल की कीमत में शामिल होते हैं कच्चे तेल की लागत, रिफाइनिंग खर्च, ट्रांसपोर्टेशन, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकार का VAT, डीलर कमीशन दिलचस्प बात यह है कि कई राज्यों में VAT प्रतिशत के आधार पर लगाया जाता है। यानी अगर बेस प्राइस बढ़ती है तो राज्य सरकार का टैक्स कलेक्शन भी अपने आप बढ़ जाता है।
इसी वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो राज्यों की कमाई भी बढ़ जाती है।
क्या पेट्रोल-डीजल GST के दायरे में आ सकते हैं?
पेट्रोल और डीजल को GST के तहत लाने की चर्चा कई सालों से हो रही है। अगर ऐसा होता है तो कीमतों में बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन राज्य सरकारें इसका लगातार विरोध करती रही हैं।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह राजस्व है। राज्यों के लिए शराब पर एक्साइज ड्यूटी, पेट्रोल-डीजल पर VAT कमाई के सबसे बड़े स्वतंत्र स्रोत हैं। अगर ईंधन GST में चला जाता है तो राज्यों की टैक्स लगाने की स्वतंत्रता काफी हद तक खत्म हो जाएगी। यही कारण है कि अलग-अलग राजनीतिक दलों की राज्य सरकारें भी इस मुद्दे पर लगभग एक जैसी राय रखती हैं।
केंद्र और राज्यों के बीच क्यों बढ़ती रहती है खींचतान?
राज्यों का कहना है कि उन्हें जीएसटी कलेक्शन में हिस्सेदारी जरूर मिलती है, लेकिन केंद्र सरकार सेस और सरचार्ज के जरिए बड़ी रकम अपने पास रखती है। राज्यों को केंद्रीय करों में लगभग 41% हिस्सा मिलता है, लेकिन रोड सेस, इंफ्रास्ट्रक्चर सेस, विशेष सरचार्ज जैसी रकम राज्यों के साथ साझा नहीं की जाती।
इसी वजह से कई राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर VAT कम करने से बचती हैं, क्योंकि उन्हें अपने खर्च चलाने के लिए स्थायी आय की जरूरत होती है।
आम जनता पर कितना असर पड़ रहा है?
पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर सिर्फ वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ता है, फल-सब्जियों के दाम बढ़ते हैं, ऑनलाइन डिलीवरी महंगी होती है, बस और टैक्सी किराया बढ़ता है, निर्माण सामग्री महंगी होती है, महंगाई दर पर दबाव बढ़ता है यानी ईंधन कीमतें बढ़ने का असर हर घर तक पहुंचता है।
क्या आने वाले दिनों में राहत मिल सकती है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट नहीं आती, तो केवल केंद्र सरकार के भरोसे राहत संभव नहीं होगी। ऐसे में तीन विकल्प सामने हैं:
- राज्य सरकारें VAT कम करें
- केंद्र फिर एक्साइज ड्यूटी घटाए
- तेल कंपनियां कुछ नुकसान खुद सहें
हालांकि तीनों विकल्पों का असर सरकारी वित्तीय स्थिति पर पड़ेगा। फिलहाल सबसे ज्यादा नजर राज्यों के फैसलों पर है। अगर कुछ बड़े राज्य VAT में कटौती करते हैं तो आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में थोड़ी राहत देखने को मिल सकती है।
Also Read:


