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Fertilizer Crisis: ईरान-अमेरिका तनाव के बीच इंसानी पेशाब तक की बढ़ी मांग, खाद संकट ने किसानों को मजबूर किया नए प्रयोगों पर

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 12:25 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव अब केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहे हैं। ईरान-अमेरिका टकराव और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ती अनिश्चितता ने दुनिया भर में उर्वरकों (फर्टिलाइजर) की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा असर यूरिया जैसे नाइट्रोजन आधारित रासायनिक खादों पर दिखाई दे रहा है, जिनकी कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई देशों के किसान अब इंसानी पेशाब, मुर्गे की बीट, गोबर और केंचुआ खाद जैसे पारंपरिक और जैविक विकल्पों की तरफ तेजी से लौट रहे हैं।

Contents
क्यों बढ़ा वैश्विक खाद संकट?किसानों के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है?इंसानी पेशाब से खाद बनाने का प्रयोग क्यों बढ़ा?मुर्गे की बीट और केंचुआ खाद की मांग क्यों बढ़ी?अमेरिका में जैविक खाद कंपनियों को मिला बड़ा मौकाक्या जैविक खाद पूरी तरह रासायनिक खाद की जगह ले सकती है?सरकारें भी बदल रही रणनीतिभारत पर क्या असर पड़ सकता है?निष्कर्ष

यह सिर्फ खेती की लागत बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि आने वाले महीनों में वैश्विक खाद्य संकट, महंगाई और कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले असर की चेतावनी भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उर्वरकों की सप्लाई लंबे समय तक बाधित रही, तो इसका असर गेहूं, चावल, मक्का, सब्जियों और पशु आहार तक पर दिखाई देगा।

क्यों बढ़ा वैश्विक खाद संकट?

दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल यूरिया उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। ईरान के आसपास बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से उर्वरक कंपनियों की सप्लाई चेन कमजोर पड़ गई है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें अचानक उछल गईं।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक मिस्र का यूरिया युद्ध शुरू होने के बाद 90% से ज्यादा महंगा होकर करीब 940 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि इस साल वैश्विक उर्वरक कीमतों में लगभग 30% तक बढ़ोतरी हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने आशंका जताई है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो करीब 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर सकते हैं। इसका सीधा असर गरीब और विकासशील देशों पर ज्यादा पड़ेगा, जहां खेती पहले से ही महंगी डीजल, बिजली और पानी की लागत से जूझ रही है।

किसानों के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक खेती पिछले 100 सालों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रही है। यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसी खादों ने उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ऐसे में अचानक इनकी कमी या कीमतों में तेज बढ़ोतरी किसानों के लिए बड़ा झटका है।

ब्रिटेन के किसान जेम्स मिल्स का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों को पूरी तरह हटाकर उसी स्तर का उत्पादन हासिल करना फिलहाल संभव नहीं है। हालांकि संकट ने किसानों को नए विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर जरूर कर दिया है।

भारत जैसे देशों में इसका असर और ज्यादा संवेदनशील हो सकता है क्योंकि यहां करोड़ों किसान सब्सिडी वाले उर्वरकों पर निर्भर हैं। यदि वैश्विक कीमतें बढ़ती रहीं, तो सरकारों पर सब्सिडी का बोझ भी तेजी से बढ़ सकता है।

इंसानी पेशाब से खाद बनाने का प्रयोग क्यों बढ़ा?

संकट के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इंसानी पेशाब से तैयार किए जा रहे बायो-फर्टिलाइजर की हो रही है। सुनने में यह भले असामान्य लगे, लेकिन वैज्ञानिक लंबे समय से मानते रहे हैं कि इंसानी मूत्र में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे तत्व मौजूद होते हैं, जो पौधों की वृद्धि में मदद कर सकते हैं।

फ्रांस की स्टार्टअप कंपनी “टूपी ऑर्गेनिक्स” (Toopi Organics) ने इसी दिशा में बड़ा प्रयोग शुरू किया है। कंपनी स्कूलों, सार्वजनिक आयोजनों और त्योहारों से इंसानी पेशाब इकट्ठा करती है और उसे विशेष बैक्टीरिया आधारित जैविक उत्पाद में बदलती है, जिसे खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

कंपनी के प्रतिनिधि फ्रांस्वा जेरार्ड के अनुसार फरवरी के बाद से उनकी बिक्री में 25% तक की तेजी आई है। उनका कहना है कि मौजूदा युद्ध और उर्वरक संकट ने उनके कारोबार को अचानक बढ़ावा दिया है क्योंकि कच्चा माल लगभग हर जगह उपलब्ध है और इसकी लागत बेहद कम है।

मुर्गे की बीट और केंचुआ खाद की मांग क्यों बढ़ी?

सिर्फ इंसानी पेशाब ही नहीं, बल्कि मुर्गे की बीट, गोबर और वर्मीकम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद की मांग भी कई देशों में तेजी से बढ़ रही है। मलेशिया की डेयरी कंपनी “फार्म फ्रेश बीएचडी” पशुओं के मलमूत्र को केंचुओं के जरिए प्रोसेस कर जैविक खाद तैयार कर रही है। अब कंपनी इसमें मुर्गे की बीट भी मिलाने लगी है ताकि उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सके।

ब्रिटेन और यूरोप के कई हिस्सों में मुर्गे की बीट बेचने वाले किसानों के पास खरीदारों की लंबी लाइन लग रही है। वजह साफ है—यह रासायनिक खादों की तुलना में सस्ती पड़ रही है और मिट्टी की गुणवत्ता को भी नुकसान नहीं पहुंचाती।

अमेरिका में जैविक खाद कंपनियों को मिला बड़ा मौका

उर्वरक संकट ने बायो-फर्टिलाइजर कंपनियों को अचानक बड़ा बाजार दे दिया है। अमेरिका की कंपनी Pivot Bio ने अपने जैविक उत्पादों की कीमतों में करीब 15% तक कटौती की है ताकि ज्यादा किसान इन्हें अपनाएं। कंपनी का दावा है कि उसके उत्पादों से किसानों को पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में 65% तक लागत बचत हो रही है। खास बात यह है कि इस कंपनी को माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक Bill Gates का समर्थन भी प्राप्त है।

थाईलैंड की स्टार्टअप Living Roots भी कम लागत वाले जैविक उर्वरक तैयार कर रही है, जिनकी कीमत यूरिया की तुलना में काफी कम बताई जा रही है।

क्या जैविक खाद पूरी तरह रासायनिक खाद की जगह ले सकती है?

विशेषज्ञ फिलहाल इसे संभव नहीं मानते। बड़े स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन के लिए अभी भी रासायनिक उर्वरकों की जरूरत बनी हुई है। हालांकि यह संकट एक बड़ा संकेत जरूर दे रहा है कि दुनिया को अब खेती के लिए सिर्फ एक सप्लाई सिस्टम पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

जैविक और बायो-आधारित उर्वरक मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी की बचत करने और लंबे समय में खेती की लागत घटाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए अभी तकनीक, निवेश और किसानों को प्रशिक्षण देने की जरूरत होगी।

सरकारें भी बदल रही रणनीति

यूरोपीय संघ (EU) ने हाल ही में नई फर्टिलाइजर रणनीति पेश की है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की बात कही गई है। इसके तहत बायो-बेस्ड उर्वरकों और बायोगैस से निकलने वाले अपशिष्ट के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाएगा।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में कई देश कृषि क्षेत्र में “सर्कुलर इकोनॉमी” मॉडल अपनाने की कोशिश करेंगे, जिसमें जैविक कचरे को दोबारा उपयोग में लाकर खाद तैयार की जाएगी।

भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर भारतीय किसानों और सरकारी खजाने दोनों पर पड़ सकता है।

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और गैस महंगी बनी रहती है, तो:

  • खेती की लागत बढ़ सकती है
  • सब्जियों और अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं
  • खाद सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है
  • किसानों का मुनाफा घट सकता है

हालांकि भारत पिछले कुछ वर्षों से जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और गोबर आधारित उर्वरकों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा संकट इन योजनाओं को और गति दे सकता है।

निष्कर्ष

ईरान-अमेरिका तनाव ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति का असर सीधे आम लोगों की थाली तक पहुंच सकता है। खाद संकट ने किसानों को ऐसे विकल्प अपनाने पर मजबूर कर दिया है, जिन्हें कुछ साल पहले तक केवल प्रयोग माना जाता था।

इंसानी पेशाब, मुर्गे की बीट और केंचुआ खाद जैसे विकल्प अभी पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों की जगह नहीं ले सकते, लेकिन बढ़ती महंगाई और सप्लाई संकट के बीच ये खेती के भविष्य की नई दिशा जरूर बनते दिख रहे हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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